संयुक्त राष्ट्र,28 सितंबर (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में इस बार युद्ध,जलवायु परिवर्तन और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बच्चों की डिजिटल सुरक्षा भी प्रमुख चर्चा के विषयों में शामिल रही। दुनिया के अलग-अलग देशों के नेताओं ने सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेजी से बढ़ते प्रभाव को लेकर अपने-अपने विचार रखे। खासतौर पर बच्चों और किशोरों को ऑनलाइन नुकसान,हानिकारक सामग्री, लत लगाने वाली डिजिटल सुविधाओं, गलत सूचना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों के संभावित प्रभावों से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नियमों की जरूरत पर जोर दिया गया। हालाँकि,इस बात पर देशों के बीच मतभेद भी सामने आए कि इन तकनीकों को नियंत्रित करने के लिए सरकारों को कितनी भूमिका निभानी चाहिए और नवाचार की गति को बनाए रखते हुए सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने महासभा को संबोधित करते हुए कहा कि 20 से अधिक देश सोशल मीडिया पर उम्र से जुड़ी पाबंदियाँ लागू कर रहे हैं या इस तरह के कदमों पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के उस फैसले का उल्लेख किया, जिसके तहत 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खाते रखने से रोका गया है। ऑस्ट्रेलिया में यह व्यवस्था 10 दिसंबर 2025 से लागू हुई थी। इसके तहत संबंधित सोशल मीडिया मंचों को 16 वर्ष से कम उम्र के ऑस्ट्रेलियाई उपयोगकर्ताओं को खाते बनाने या बनाए रखने से रोकने के लिए उचित कदम उठाने की जिम्मेदारी दी गई है।
ऑस्ट्रेलिया का यह कानून सीधे तौर पर बच्चों को इंटरनेट पर उपलब्ध हर तरह की सामग्री से दूर नहीं करता। 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ऐसी सार्वजनिक सामग्री देख सकते हैं, जिसके लिए किसी खाते से प्रवेश जरूरी नहीं है। वहीं संदेश भेजने,ऑनलाइन गेमिंग, शिक्षा और स्वास्थ्य सहायता जैसे कुछ प्रकार के मंचों को मौजूदा व्यवस्था से बाहर रखा गया है। इस कानून के तहत कार्रवाई की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सोशल मीडिया कंपनियों पर है,न कि बच्चों या उनके माता-पिता पर।
अल्बानीज ने महासभा में कहा कि ऑस्ट्रेलिया का अनुभव अन्य देशों के लिए भी चर्चा का आधार बना है। उनके मुताबिक,तकनीक की तेज रफ्तार के बीच सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि समाज और खासकर बच्चों की सुरक्षा केवल बड़ी तकनीकी कंपनियों के फैसलों पर निर्भर न रहे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के व्यावसायिक हितों के अनुरूप तय नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार,डिजिटल तकनीक से जुड़े बड़े फैसलों में लोकतांत्रिक सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका बनी रहनी चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया की न्यूनतम उम्र तय करने के फैसले के पीछे बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण रहे हैं। सरकार का कहना है कि कुछ डिजिटल डिजाइन सुविधाएँ बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन पर बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं और उन्हें ऐसी सामग्री के संपर्क में ला सकती हैं,जो उनके स्वास्थ्य और कल्याण के लिए नुकसानदेह हो सकती है। सरकार ने यह भी कहा है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को वास्तविक दुनिया में सामाजिक और भावनात्मक कौशल विकसित करने के लिए अतिरिक्त समय देना है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी महासभा में बच्चों और किशोरों की डिजिटल सुरक्षा का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि समाज को सोशल मीडिया के प्रभावों से बच्चों की सुरक्षा में देर नहीं करनी चाहिए और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मामले में वही गलतियाँ दोहराने से बचना चाहिए। मैक्रों ने बच्चों की सीखने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर डिजिटल तकनीकों के संभावित प्रभाव का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियाँ पहले से ही बच्चों के जीवन का हिस्सा बन रही हैं और इसलिए उनके इस्तेमाल के संभावित जोखिमों का मूल्यांकन पहले से किया जाना चाहिए।
फ्रांस ने इस मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से जोड़ते हुए बच्चों के अधिकारों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में उनकी सुरक्षा के लिए एक गठबंधन की पहल भी की है। फ्रांस, स्पेन, केन्या और ऑस्ट्रेलिया की सह-अध्यक्षता वाली इस पहल को कई देशों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाओं का समर्थन मिला है। इसका उद्देश्य बच्चों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता को सुरक्षित बनाने के लिए वैज्ञानिक आधार पर नीतियाँ और साझा मूल्यांकन व्यवस्था विकसित करना है। प्रस्तावित ढाँचे में बच्चों के लिए बनाए गए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उत्पादों की बाजार में उपलब्धता से पहले सुरक्षा और प्रभाव का मूल्यांकन करने जैसी अवधारणाओं पर भी जोर दिया गया है।
मैक्रों का तर्क है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मामले में सरकारों और समाज को संभावित नुकसान सामने आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से तैयारी करनी चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से उन चैटबॉट और एआई प्रणालियों का उल्लेख किया, जो बच्चों से बातचीत कर सकती हैं,दोस्त जैसी भूमिका निभा सकती हैं या उनकी चिंताओं और सवालों का जवाब दे सकती हैं। उनके अनुसार, ऐसी प्रणालियों के बच्चों के विकास पर प्रभाव को समझना और उनके लिए सुरक्षा मानक तैयार करना जरूरी है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने भी महासभा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सूचना के बदलते माहौल को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एआई गलत सूचना और दुष्प्रचार के खतरे को और बढ़ा सकता है। उनके मुताबिक, बॉट, नकली वेबसाइट और कृत्रिम रूप से तैयार की गई सामग्री का इस्तेमाल समाज में भ्रम और विभाजन बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। ब्रिटेन ने इस चुनौती से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय सूचना रक्षा केंद्र स्थापित करने की घोषणा की है,जिसका उद्देश्य विदेशी सूचना हमलों का पता लगाना,उनके स्रोत की पहचान करना और उन्हें बाधित करने की क्षमता विकसित करना है।
बर्नहम ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े मूलभूत फैसले केवल तकनीकी कंपनियों या बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़े जाने चाहिए। उनका कहना था कि इन फैसलों में चुनी हुई सरकारों की भूमिका होनी चाहिए, क्योंकि एआई का प्रभाव रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य,सुरक्षा और समाज के व्यापक ढांचे पर पड़ने वाला है। उन्होंने ब्रिटेन की आगामी जी20 अध्यक्षता के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता को प्रमुख मुद्दा बनाने की बात भी कही। ब्रिटेन वैश्विक स्तर पर एआई के लिए पारदर्शिता,तैयारी और सुरक्षा से जुड़े साझा सिद्धांत और मानक विकसित करने की दिशा में काम करने की बात कर रहा है।
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता को आर्थिक और सामाजिक बदलाव से जोड़ते हुए इसके लाभों को साझा करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने एआई, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा जैसी चुनौतियों को अपनी व्यापक अंतर्राष्ट्रीय पहल से जोड़ा। दक्षिण कोरिया की ओर से तकनीकी क्षमता और अनुभव को वैश्विक सहयोग के लिए इस्तेमाल करने की बात कही गई।
दक्षिण कोरिया के रुख में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल सुरक्षा या नियमन के मुद्दे के तौर पर नहीं देखा गया,बल्कि इसे आर्थिक विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से भी जोड़ा गया। एआई के विकास से उत्पादकता, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में बदलाव की संभावनाएँ हैं,लेकिन इसके साथ आर्थिक असमानता बढ़ने और तकनीकी लाभों के असमान वितरण का सवाल भी जुड़ा हुआ है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी व्यवस्था बनाने की चर्चा हो रही है,जिसमें तकनीकी प्रगति के लाभ व्यापक रूप से साझा किए जा सकें।
इटली के उपप्रधानमंत्री एंटोनियो ताजानी ने एआई के लिए नियमों की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए अत्यधिक नौकरशाही नियंत्रण के खिलाफ भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण नई असमानताएँ,निर्भरता और सत्ता के केंद्रीकरण के खतरे पैदा हो सकते हैं। उनके मुताबिक,ऐसी तकनीक को बिना किसी नियम के नहीं छोड़ा जा सकता,लेकिन ऐसे नियम भी नहीं होने चाहिए जिनका पालन केवल कुछ कंपनियाँ या देश ही करें।
ताजानी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर पारदर्शिता,निगरानी, सुरक्षा और बौद्धिक संपदा के संरक्षण के बीच संतुलन की आवश्यकता बताई। उनका कहना था कि तकनीकी नवाचार को रोकना समाधान नहीं है। एआई चिकित्सा, शोध, शिक्षा, उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा कर सकता है। इसलिए चुनौती यह है कि इसके लाभों को हासिल करते हुए संभावित जोखिमों को नियंत्रित करने के लिए साझा अंतर्राष्ट्रीय नियम बनाए जाएँ।
अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली ने इस बहस में अपेक्षाकृत अलग दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि पिछली बड़ी तकनीकी क्रांतियों की तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर भी रोजगार और सामाजिक बदलाव के संबंध में आशंकाएँ जताई जा रही हैं। उनके अनुसार, तकनीकी प्रगति ने अतीत में नई उत्पादकता और नए अवसर भी पैदा किए हैं। उन्होंने एआई को अर्थव्यवस्था, चिकित्सा, शिक्षा और शासन को बदलने वाली तकनीक बताया और कहा कि सावधानी जरूरी है,लेकिन डर को स्वतः नियंत्रण या आज्ञाकारिता का आधार नहीं बनना चाहिए।
माइली ने अर्जेंटीना के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास को आर्थिक अवसर के रूप में पेश किया। उन्होंने देश के महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा, प्रतिभा और तकनीकी क्षमता का उल्लेख करते हुए कहा कि अर्जेंटीना एआई की पूरी मूल्य शृंखला में प्रतिस्पर्धी भूमिका निभाना चाहता है। उन्होंने पहले से व्यापक नियमन लागू करने के बजाय नवाचार को प्रोत्साहित करने वाले कानूनी ढाँचे,एआई एजेंट विकसित करने वाली कंपनियों के लिए सीमित दायित्व और कर प्रोत्साहन जैसी नीतियों की वकालत की।
इस तरह संयुक्त राष्ट्र महासभा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर दो व्यापक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई दिए। एक तरफ ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने बच्चों की सुरक्षा, गलत सूचना, पारदर्शिता और एआई के जोखिमों से निपटने के लिए मजबूत नियमन तथा अंतर्राष्ट्रीय मानकों की जरूरत पर जोर दिया। दूसरी तरफ इटली ने नियमों के साथ नवाचार और बौद्धिक संपदा के बीच संतुलन की बात कही,जबकि अर्जेंटीना ने नियमन में सावधानी बरतने और तकनीकी विकास को प्रोत्साहित करने पर ज्यादा जोर दिया। इन सभी रुखों के बीच एक साझा सवाल यह रहा कि तेजी से विकसित होती तकनीक पर नियंत्रण और उसके लाभों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
बच्चों की सोशल मीडिया पहुँच को लेकर भी यही बहस दिखाई देती है। एक विकल्प उम्र की सीमा तय करना है,जैसा ऑस्ट्रेलिया ने किया है। दूसरा रास्ता प्लेटफॉर्म कंपनियों को अपनी डिजाइन और सुरक्षा व्यवस्था बदलने के लिए बाध्य करना है,ताकि बच्चों को हानिकारक सामग्री,अत्यधिक स्क्रीन समय और ऑनलाइन शोषण से बेहतर सुरक्षा मिल सके। तीसरा मुद्दा उम्र की पुष्टि से जुड़ा है, क्योंकि उम्र की सीमा लागू करने के लिए ऐसी तकनीक की जरूरत पड़ सकती है,जिससे उपयोगकर्ता की उम्र का अनुमान या सत्यापन किया जा सके। इससे बच्चों की निजता और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा के सवाल भी पैदा होते हैं। ऑस्ट्रेलिया की व्यवस्था में इसी कारण उम्र सत्यापन और निजता से जुड़े प्रावधानों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मामले में चुनौती और व्यापक है। एआई केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। यह स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, वित्तीय प्रणालियों, सरकारी सेवाओं, उद्योग, सुरक्षा और सूचना व्यवस्था में तेजी से इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए इससे जुड़े नियमों का प्रभाव भी बहुत बड़े दायरे में पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र में उठी बहस इसी वजह से केवल तकनीकी कंपनियों को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं रही,बल्कि यह सवाल भी सामने आया कि भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था के नियम कौन बनाएगा और इन नियमों को लागू करने की जिम्मेदारी किसकी होगी।
इस बहस में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय समन्वय का है। अलग-अलग देशों में अलग-अलग नियम होने से तकनीकी कंपनियों के लिए कई तरह के अनुपालन मानक पैदा हो सकते हैं। वहीं,पूरी दुनिया के लिए एक समान नियम बनाना भी आसान नहीं है, क्योंकि देशों की अर्थव्यवस्था, कानूनी व्यवस्था, डिजिटल ढाँचा और तकनीकी क्षमता अलग-अलग है। ब्रिटेन साझा वैश्विक सिद्धांत और मानक विकसित करने की बात कर रहा है,जबकि फ्रांस बच्चों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के जरिए साझा वैज्ञानिक और सुरक्षा आधारित ढाँचे पर काम कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में हुई यह बहस इस बात का संकेत देती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया अब केवल तकनीकी क्षेत्र के विषय नहीं रह गए हैं। इनके प्रभाव शिक्षा, बच्चों के विकास, रोजगार, लोकतंत्र, सूचना व्यवस्था, आर्थिक असमानता और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पहुंच चुके हैं। इसी कारण अलग-अलग देशों के नेता अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार नीतियां और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के रास्ते तलाश रहे हैं।
आने वाले समय में बच्चों के लिए सोशल मीडिया की उम्र सीमा, एआई प्रणालियों की सुरक्षा जांच, गलत सूचना से निपटने की व्यवस्था, कंपनियों की जवाबदेही और नवाचार की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे वैश्विक नीति बहस के केंद्र में बने रह सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में सामने आए अलग-अलग विचारों से यह स्पष्ट है कि दुनिया एआई और डिजिटल तकनीक के भविष्य को लेकर एक ही मॉडल पर सहमत नहीं है,लेकिन बच्चों की सुरक्षा,तकनीकी पारदर्शिता और जिम्मेदार नवाचार जैसे विषयों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की जरूरत लगातार चर्चा में बनी हुई है।
