प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तस्वीर क्रेडिट@PKVarmaRanchi)

वैश्विक व्यवस्था बदलती दुनिया के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम,प्रधानमंत्री मोदी ने उठाए सुधार के सवाल

नई दिल्ली,23 अक्टूबर (युआईटीवी)- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था और उसके संस्थान तेजी से बदलती दुनिया की वास्तविकताओं के अनुरूप खुद को ढालने में विफल रहे हैं। इसके कारण आज की जरूरतों और पुराने निर्णय लेने के तंत्र के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है और मौजूदा परिस्थितियों को एक ऐसी स्थिति के रूप में देखा जा सकता है,जहाँ पुरानी व्यवस्था कमजोर पड़ रही है,लेकिन नई व्यवस्था अभी पूरी तरह आकार नहीं ले पाई है। ऐसे समय में वैश्विक संस्थानों की भूमिका, उनकी प्रासंगिकता और भविष्य की दिशा पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।

नई दिल्ली में आयोजित एनडीटीवी वर्ल्ड समिट को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बदलावों और उसमें भारत की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि दुनिया के सामने दो बुनियादी प्रश्न हैं। पहला,वैश्विक व्यवस्था में बदलाव क्यों हो रहा है और पुरानी व्यवस्था आज की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना क्यों नहीं कर पा रही है? दूसरा,तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को किस तरह अपनी भूमिका निभानी चाहिए? प्रधानमंत्री के मुताबिक,इन सवालों के जवाब तलाशना इसलिए जरूरी है,क्योंकि दुनिया की आर्थिक,राजनीतिक और तकनीकी परिस्थितियाँ पहले की तुलना में काफी बदल चुकी हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था में बदलाव कोई असामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह स्वाभाविक और अपरिहार्य प्रक्रिया है। समय के साथ देशों की आर्थिक ताकत, राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक प्राथमिकताएँ और अंतर्राष्ट्रीय संबंध बदलते हैं। ऐसे में वैश्विक संस्थानों और उनके काम करने के तरीकों में भी बदलाव होना चाहिए। यदि दुनिया की वास्तविकताएँ बदलती रहें,लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रियाएँ पुरानी बनी रहें,तो व्यवस्था और मौजूदा परिस्थितियों के बीच असंतुलन पैदा होना तय है।

उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि इतिहास से यह सबक मिलता है कि केवल ताकत और स्वार्थ पर आधारित व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती। अंतर्राष्ट्रीय शांति और स्थिरता के लिए संवाद,सहयोग और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान आवश्यक है। इन्हीं विचारों को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी,ताकि देशों के बीच सहयोग बढ़ाया जा सके और संघर्षों को रोकने के लिए साझा मंच उपलब्ध हो।

हालाँकि,प्रधानमंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से दुनिया में व्यापक बदलाव हुए हैं। उस समय की परिस्थितियाँ और आज की चुनौतियाँ एक जैसी नहीं हैं। दुनिया की आबादी,अर्थव्यवस्थाओं की संरचना,तकनीकी क्षमताओं और देशों की आकांक्षाओं में बड़ा परिवर्तन आया है। इसलिए वैश्विक संस्थानों के कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं की समीक्षा करना आवश्यक हो गया है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्तमान समय में कई नई आर्थिक और राजनीतिक शक्तियाँ उभरकर सामने आई हैं। जिन देशों को शुरुआती वैश्विक व्यवस्था तैयार करते समय पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला था,वे अब अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी उचित भागीदारी की माँग कर रहे हैं। उनका कहना था कि वैश्विक संस्थानों को बदलती परिस्थितियों को स्वीकार करना होगा और नई आवाजों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित स्थान देना होगा।

मोदी ने सवाल उठाया कि क्या वैश्विक व्यवस्था इन बदलावों के साथ तालमेल बिठा पाई है? उन्होंने इसका जवाब नकारात्मक देते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों ने अपने समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है,लेकिन वर्तमान चुनौतियों से निपटने में उनकी सीमाएं भी स्पष्ट होती जा रही हैं। उनके अनुसार,दुनिया की जरूरतें बदलने के बावजूद यदि संस्थानों की कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार नहीं होते,तो उनकी प्रभावशीलता प्रभावित होना स्वाभाविक है।

प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी में वैश्विक संस्थानों में सुधार की भारत की लंबे समय से चली आ रही माँग भी दिखाई दी। भारत लगातार यह पक्ष रखता रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और समावेशी बनाया जाना चाहिए। भारत का मानना है कि दुनिया की मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखे बिना वैश्विक स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों को सभी देशों की जरूरतों का प्रतिनिधि नहीं बनाया जा सकता।

प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक बदलावों में तकनीक की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीकी विकास ने समाज,अर्थव्यवस्था और शक्ति की प्रकृति को व्यापक रूप से बदल दिया है। आज तकनीक केवल संचार या उत्पादन तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका प्रभाव व्यापार,सुरक्षा,शासन और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा तक पहुँच चुका है। डिजिटल तकनीक,कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नए वैज्ञानिक आविष्कारों ने देशों की क्षमताओं तथा उनके बीच संबंधों को प्रभावित किया है।

ऐसे दौर में वैश्विक संस्थानों के लिए नई चुनौतियों के अनुरूप समाधान तलाशना जरूरी है। पुरानी समस्याओं से निपटने के लिए बनाए गए नियम और प्रक्रियाएँ कई बार नई परिस्थितियों के लिए पर्याप्त नहीं होते। इसलिए संस्थानों को बदलती तकनीकी और आर्थिक वास्तविकताओं के अनुसार अपने दृष्टिकोण में सुधार करना होगा। प्रधानमंत्री की बातों से स्पष्ट था कि वैश्विक व्यवस्था को प्रभावी बनाए रखने के लिए केवल पुराने ढाँचे पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि दुनिया में नई शक्तियाँ उभर रही हैं और कई देश अंतर्राष्ट्रीय फैसलों में अपनी भागीदारी बढ़ाना चाहते हैं। साथ ही,जलवायु परिवर्तन, आर्थिक अस्थिरता,सुरक्षा संबंधी चुनौतियों और तकनीकी बदलावों जैसी समस्याओं के लिए नए प्रकार के सहयोग की आवश्यकता है। यदि इन मुद्दों पर फैसले लेने वाली संस्थाएँ समय के साथ नहीं बदलतीं,तो वैश्विक जरूरतों और उनके समाधानों के बीच दूरी बढ़ सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भारत की भूमिका से जुड़ा सवाल भी उठाया। उनके अनुसार,जब दुनिया बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही हो,तब भारत के लिए यह विचार करना जरूरी है कि वह वैश्विक व्यवस्था को अधिक प्रभावी और समावेशी बनाने में किस तरह योगदान दे सकता है। भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता,अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक मंचों पर उसकी भागीदारी के संदर्भ में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की माँग करता रहा है। विशेष रूप से,भारत का जोर इस बात पर रहा है कि वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अधिक देशों को उचित प्रतिनिधित्व मिले और संस्थान 21वीं सदी की जरूरतों के अनुसार काम करें। भारत के दृष्टिकोण में सुधार का उद्देश्य केवल नए देशों को जगह देना नहीं,बल्कि वैश्विक संस्थानों की जवाबदेही और निर्णय लेने की क्षमता को भी मजबूत करना है।

प्रधानमंत्री के संबोधन का व्यापक संदेश यह था कि बदलती दुनिया में वैश्विक संस्थानों की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए सुधार आवश्यक हैं। नई आर्थिक शक्तियों,बदलती जन आकांक्षाओं और तकनीकी प्रगति ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति को बदल दिया है। ऐसे में पुराने निर्णय तंत्र और वर्तमान वास्तविकताओं के बीच बढ़ती दूरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मोदी की टिप्पणियों ने वैश्विक शासन व्यवस्था के सामने मौजूद एक बुनियादी चुनौती को रेखांकित किया। अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना जिन परिस्थितियों में हुई थी,वे आज काफी बदल चुकी हैं। इसलिए उनके ढाँचे,प्रतिनिधित्व और कार्यप्रणाली को मौजूदा जरूरतों के अनुरूप बनाने पर विचार करना जरूरी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक संस्थान बदलती परिस्थितियों के साथ किस तरह तालमेल बिठाते हैं और भारत सहित उभरती शक्तियों की मांगों को कितनी जगह मिलती है।