गुटेनबर्ग,18 मई (युआईटीवी)- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वीडन यात्रा ने भारत और स्वीडन के रिश्तों को नई दिशा देने का काम किया है। इस यात्रा के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों के बीच संबंधों को “रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक ले जाने की ऐतिहासिक घोषणा की गई। यह केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं,बल्कि भारत और स्वीडन के बीच तेजी से बढ़ते राजनीतिक,आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने स्वीकार किया कि भारत और स्वीडन के बीच वर्षों पुरानी मित्रता अब ऐसे दौर में पहुँच चुकी है,जहाँ इसे अधिक व्यापक और दीर्घकालिक साझेदारी में बदलना आवश्यक हो गया है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार,स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को गुटेनबर्ग का आधिकारिक दौरा किया। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच विस्तृत वार्ता हुई,जिसमें वैश्विक सुरक्षा,व्यापार,तकनीक,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,हरित ऊर्जा, आपूर्ति श्रृंखला और रक्षा सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई। इस बैठक को भारत और यूरोप के बीच बढ़ते संबंधों के संदर्भ में भी बेहद अहम माना जा रहा है।
दोनों प्रधानमंत्रियों ने जनवरी में नई दिल्ली में आयोजित ऐतिहासिक भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने “टुवर्ड्स 2030: एक संयुक्त भारत-यूरोपीय संघ व्यापक रणनीतिक एजेंडा” को आने वाले वर्षों में सहयोग का महत्वपूर्ण आधार बताया। साथ ही भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते और मोबिलिटी पर व्यापक सहयोग ढाँचे को भी दोनों पक्षों ने भविष्य के संबंधों के लिए निर्णायक माना।
विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया कि भारत और स्वीडन के बीच रणनीतिक साझेदारी चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित होगी। इनमें स्थिरता और सुरक्षा के लिए रणनीतिक संवाद, आर्थिक साझेदारी,उभरती प्रौद्योगिकियाँ और विश्वसनीय कनेक्टिविटी, तथा “कल को मिलकर संवारना” यानी लोगों,पर्यावरण और लचीले विकास से जुड़ी पहलें शामिल हैं। यह ढाँचा दोनों देशों के सहयोग को केवल व्यापार तक सीमित नहीं रखता,बल्कि उसे वैश्विक और बहुआयामी स्वरूप प्रदान करता है।
दोनों देशों ने “उन्नत संयुक्त कार्य योजना 2026-2030” को मंजूरी दी है,जिसके तहत रणनीतिक साझेदारी को व्यावहारिक रूप से लागू किया जाएगा। इस योजना के तहत राजनीतिक,कूटनीतिक और रक्षा स्तरों पर संवाद को और मजबूत किया जाएगा। इसमें दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और उनके कार्यालयों के बीच नियमित आदान-प्रदान भी शामिल रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत और स्वीडन के बीच सुरक्षा सहयोग को नई मजबूती देगा।
प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री क्रिस्टर्सन ने आर्थिक सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा के महत्व पर भी जोर दिया। दोनों नेताओं ने अगले पाँच वर्षों में व्यापार और निवेश सहित द्विपक्षीय आर्थिक आदान-प्रदान को दोगुना करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया। इस दिशा में “मेक इन इंडिया” और “मेड विद स्वीडन” जैसी पहलों को सहयोग का महत्वपूर्ण आधार बनाया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को नई तकनीक और निवेश प्राप्त होगा,जबकि स्वीडिश कंपनियों को भारत जैसे विशाल बाजार में अपनी उपस्थिति मजबूत करने का अवसर मिलेगा।
विदेश मंत्रालय ने बताया कि दोनों नेताओं ने भारत-स्वीडन व्यापारिक नेताओं की बैठक की भूमिका को भी काफी महत्वपूर्ण माना। इसी क्रम में यह घोषणा की गई कि वर्ष 2027 में भारत में “भारत-स्वीडन: एक साथ अधिक मजबूत- टुवर्ड्स 2047” शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। यह सम्मेलन दोनों देशों के भविष्य के सहयोग की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
इस यात्रा के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी सहयोग पर विशेष जोर दिया गया। स्वीडन के प्रधानमंत्री क्रिस्टर्सन ने भारत में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट की सफलता की सराहना की। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीडन की उप-प्रधानमंत्री एब्बा बुश और उनके साथ आए स्वीडिश एआई प्रतिनिधिमंडल की सक्रिय भागीदारी की प्रशंसा की। दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि डिजिटलीकरण और भरोसेमंद तकनीकी ढाँचे को भविष्य की साझेदारी का प्रमुख आधार बनाया जाएगा।
इसी दिशा में “स्वीडन-भारत टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कॉरिडोर” यानी एसआईटीएसी की स्थापना को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह पहल दोनों देशों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस,डिजिटल तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देगी। इसके अलावा दोनों देशों ने “ज्वाइंट इनोवेशन पार्टनरशिप 2.0” शुरू करने और “भारत-स्वीडन संयुक्त विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र” स्थापित करने पर भी सहमति जताई।
अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग भी इस यात्रा का प्रमुख हिस्सा रहा। दोनों प्रधानमंत्रियों ने अंतरिक्ष और भू-स्थानिक तकनीक में सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता और स्वीडन के एसरेंज स्पेस सेंटर की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया। इसके साथ ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और स्वीडिश इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस फिजिक्स के बीच भारतीय शुक्र ऑर्बिटर मिशन पर हो रहे सहयोग का भी स्वागत किया गया।
हरित उद्योग और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर भी दोनों देशों ने साझा प्रतिबद्धता दिखाई। दोनों नेताओं ने “लीडरशिप ग्रुप फॉर इंडस्ट्री ट्रांजिशन” यानी एलईएडी-आईटी के विस्तार का स्वागत किया और भारी उद्योगों को पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए वैश्विक प्रयासों को तेज करने पर सहमति व्यक्त की। उन्होंने “सीओपी-31” में एलईएडी-आईटी 3.0 की घोषणा का भी आह्वान किया।
खनन और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग को भी रणनीतिक महत्व दिया गया। दोनों देशों ने कम-ग्रेड और जटिल खनिज भंडारों से प्रभावी निष्कर्षण के लिए तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इसके अलावा रिफाइनिंग और डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग क्षमताओं के सह-विकास की दिशा में भी काम करने का निर्णय लिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सहयोग भविष्य की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बनाने में सहायक हो सकता है।
मानव संसाधन और लोगों के बीच संपर्क को लेकर भी दोनों देशों ने कई महत्वपूर्ण कदमों पर चर्चा की। प्रधानमंत्रियों ने छात्रों,शोधकर्ताओं और उच्च कौशल वाले पेशेवरों की आवाजाही को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। “स्टडी इन स्वीडन” और “वर्क इन स्वीडन” जैसी पहलों के जरिए भारतीय युवाओं को नए अवसर मिलने की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच सीधी और नियमित हवाई सेवाएं शुरू करने की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।
इस यात्रा के दौरान आतंकवाद का मुद्दा भी प्रमुख रूप से उठा। दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा की और हाल ही में हुए आतंकवादी हमलों,विशेष रूप से 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले की कड़ी आलोचना की। दोनों नेताओं ने आतंकवादी बुनियादी ढाँचे और सुरक्षित पनाहगाहों को खत्म करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र और एफएटीएफ जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समर्थन माना जा रहा है,क्योंकि भारत लंबे समय से वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ कठोर और समन्वित कार्रवाई की मांग करता रहा है।
इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पहलू संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर स्वीडन का समर्थन रहा। प्रधानमंत्री क्रिस्टर्सन ने एक बार फिर स्पष्ट रूप से कहा कि स्वीडन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है। इसे भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीडन सरकार और वहाँ की जनता को गर्मजोशी भरे स्वागत और आतिथ्य के लिए धन्यवाद दिया। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री क्रिस्टर्सन को भारत आने का निमंत्रण भी दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं है,बल्कि यह भारत की यूरोप नीति और वैश्विक रणनीतिक दृष्टिकोण का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत और स्वीडन के बीच बनी यह नई रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में व्यापार, तकनीक,रक्षा,शिक्षा,पर्यावरण और वैश्विक राजनीति के कई क्षेत्रों में गहरा प्रभाव छोड़ सकती है। यह यात्रा इस बात का संकेत भी देती है कि भारत अब वैश्विक मंच पर केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं,बल्कि एक महत्वपूर्ण रणनीतिक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को लगातार मजबूत कर रहा है।
