नई दिल्ली,21 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर चर्चाएँ जारी हैं। इस समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों को नई गति मिल सकती है और आर्थिक संबंधों का विस्तार हो सकता है। हालाँकि,कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने रहने के कारण बातचीत को अंतिम रूप देने में अपेक्षा से अधिक समय लग सकता है। व्यापार एवं आर्थिक परिषद के अध्यक्ष जॉन कावुलिच ने मंगलवार को यह बात कही। उनके अनुसार,दोनों देश समझौते के करीब पहुंचने के संकेत तो दे रहे हैं,लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि विवादित मुद्दों पर वास्तव में कितनी सहमति बन पाई है।
कावुलिच ने कहा कि भारत और अमेरिका की ओर से दिए जा रहे कूटनीतिक बयानों से ऐसा लगता है कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। दोनों पक्ष एक-दूसरे के साथ समझौता करने की इच्छा भी जाहिर कर रहे हैं। इसके बावजूद सार्वजनिक बयानों के आधार पर यह तय करना मुश्किल है कि वार्ता किस चरण में पहुँची है और किन विषयों पर सहमति बन चुकी है। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि क्या दोनों देश प्रमुख विवादों का समाधान निकालने में सफल रहे हैं या फिर कुछ मुद्दों को फिलहाल अलग रखकर अन्य क्षेत्रों में सहमति की घोषणा करने की तैयारी कर रहे हैं।
उनके मुताबिक,किसी समझौते के करीब पहुँचने के संकेत और वास्तविक सहमति के बीच अंतर हो सकता है। बातचीत के शुरुआती चरण में दोनों पक्ष व्यापक उद्देश्यों पर सहमत दिखाई दे सकते हैं,लेकिन जब चर्चा किसी खास प्रावधान,नियम या व्यापारिक शर्त पर पहुँचती है,तो मतभेद सामने आने लगते हैं। यही वजह है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापक व्यापार समझौते को जल्द पूरा करना आसान नहीं माना जा सकता।
कावुलिच ने भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार,दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच पहले से ही व्यापक आर्थिक संबंध हैं और व्यापार को आगे बढ़ाने की काफी संभावनाएँ मौजूद हैं। यदि दोनों देश प्रमुख बाधाओं को दूर कर लेते हैं, तो इससे द्विपक्षीय कारोबार में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। व्यापारिक सहयोग के विस्तार से कंपनियों को नए अवसर मिल सकते हैं और दोनों बाजारों के बीच आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच व्यापार से जुड़े मुद्दों का दायरा काफी बड़ा है। ऐसे में सभी विषयों पर एक साथ सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। व्यापक स्तर पर बातचीत करते समय समझौते की सामान्य रूपरेखा तैयार करना अपेक्षाकृत आसान होता है,लेकिन उसके व्यावहारिक प्रावधानों पर सहमति बनाना अधिक कठिन साबित हो सकता है। प्रत्येक विषय पर दोनों देशों की आर्थिक प्राथमिकताओं,घरेलू परिस्थितियों और नीतिगत हितों को ध्यान में रखना पड़ता है।
कावुलिच के अनुसार, जब बातचीत विस्तार से आगे बढ़ती है,तब यह सामने आता है कि किन मुद्दों पर दोनों पक्षों की अपेक्षाएँ अलग-अलग हैं। ऐसे मतभेदों को दूर करने के लिए अतिरिक्त विचार-विमर्श और समझौते की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि दोनों देश जल्द ही सभी शर्तों पर सहमत हो जाएँगे। उन्होंने संकेत दिया कि व्यापक व्यापार समझौते की दिशा में प्रगति के बावजूद इसके अंतिम स्वरूप और समयसीमा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल का आयात भी भारत-अमेरिका संबंधों में चर्चा का एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कावुलिच ने कहा कि रूसी तेल की खरीद अब केवल ऊर्जा व्यापार तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि इसका राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है। भारतीय कंपनियों की ओर से रूस से कच्चा तेल खरीदने के फैसले को लेकर अमेरिका में अलग-अलग राजनीतिक और नीतिगत दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस मुद्दे के राजनीतिक मायने सभी पक्षों के लिए एक जैसे नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए रूसी तेल आयात के सवाल के अलग निहितार्थ हो सकते हैं,जबकि अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों,अन्य राजनीतिक हस्तियों,गैर-सरकारी संगठनों,यूक्रेन और यूरोपीय संघ की चिंताएँ इससे अलग हो सकती हैं। इस कारण तेल आयात का विषय विभिन्न पक्षों की आलोचना और राजनीतिक बहस का कारण बन सकता है।
कावुलिच ने यह भी रेखांकित किया कि ऊर्जा से जुड़े फैसलों में केवल राजनीतिक पहलुओं को ही नहीं देखा जा सकता। देशों और कारोबारियों के लिए ऊर्जा की उपलब्धता और उसकी कीमत भी महत्वपूर्ण होती है। कच्चे तेल की खरीद से जुड़े फैसलों पर लागत, आपूर्ति की निरंतरता और आर्थिक जरूरतों का प्रभाव पड़ता है। ऐसे में ऊर्जा की वहनीयता यानी उचित कीमत पर ऊर्जा हासिल करना सरकारों और कंपनियों के लिए एक अहम विचार बना रहता है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों को व्यापारिक हितों के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं में संतुलन बनाना होगा। एक ओर समझौते से व्यापार बढ़ाने और बाजारों में अवसर पैदा करने की संभावना है,वहीं दूसरी ओर विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण वार्ता को जटिल बना सकते हैं।
कावुलिच की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि समझौते की दिशा में सकारात्मक बातचीत के बावजूद अभी कई सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी हैं। दोनों देशों के बीच वास्तविक प्रगति का आकलन इस बात से होगा कि वे विवादित विषयों पर कितनी सहमति बना पाते हैं और क्या उस सहमति को ठोस व्यापारिक शर्तों में बदला जा सकता है।
फिलहाल,प्रस्तावित समझौते को लेकर उम्मीदें बनी हुई हैं,लेकिन इसकी सफलता और समयसीमा दोनों पक्षों की बातचीत पर निर्भर करेगी। यदि भारत और अमेरिका प्रमुख मतभेदों को दूर करने में सफल होते हैं,तो द्विपक्षीय व्यापार को विस्तार देने का रास्ता खुल सकता है। हालाँकि,सभी मुद्दों पर सहमति बनने तक समझौते को अंतिम रूप देना चुनौतीपूर्ण बना रह सकता है।
