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भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 675.16 अरब डॉलर पहुँचा,आरबीआई ने जारी किए ताजा आँकड़े

मुंबई,18 जुलाई (युआईटीवी)- भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राहत देने वाली खबर सामने आई है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी ताजा आँकड़ों के अनुसार,देश का विदेशी मुद्रा भंडार एक बार फिर बढ़ोतरी के रास्ते पर बना हुआ है। 10 जुलाई को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 96.4 करोड़ डॉलर की वृद्धि के साथ 675.16 अरब डॉलर तक पहुँच गया। लगातार दूसरे सप्ताह दर्ज हुई इस बढ़त को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता और बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता का महत्वपूर्ण संकेतक होता है।

भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी साप्ताहिक आँकड़ों के अनुसार,इससे पहले वाले रिपोर्टिंग सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई थी। उस दौरान इसमें 7.26 अरब डॉलर का इजाफा हुआ था,जिसके बाद कुल भंडार 674.19 अरब डॉलर पर पहुँच गया था। पिछले कुछ सप्ताहों में आई गिरावट के बाद लगातार दो सप्ताह तक हुई इस बढ़ोतरी ने विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से मजबूत स्थिति में पहुँचा दिया है।

रिजर्व बैंक के अनुसार,विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ होती हैं। इन्हें फॉरेन करेंसी एसेट्स के नाम से जाना जाता है। समीक्षा अवधि के दौरान इस मद में 93 करोड़ डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई,जिसके बाद इसका कुल आकार बढ़कर 546.51 अरब डॉलर हो गया। विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की सबसे महत्वपूर्ण श्रेणी होती हैं और इन्हीं के आधार पर देश की बाहरी भुगतान क्षमता का आकलन किया जाता है।

रिजर्व बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्य में केवल डॉलर की मात्रा का ही प्रभाव नहीं पड़ता,बल्कि प्रमुख वैश्विक मुद्राओं की विनिमय दरों में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी असर शामिल होता है। यूरो,पाउंड स्टर्लिंग और जापानी येन जैसी प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की कीमत में बदलाव होने से विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के कुल मूल्य में भी परिवर्तन होता है। इसलिए साप्ताहिक आँकड़ों में दिखाई देने वाली वृद्धि या कमी केवल डॉलर की खरीद या बिक्री का परिणाम नहीं होती,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार की गतिविधियों का भी उस पर प्रभाव पड़ता है।

देश के स्वर्ण भंडार में भी इस अवधि के दौरान बढ़ोतरी दर्ज की गई। रिपोर्टिंग सप्ताह में गोल्ड रिजर्व 2.4 करोड़ डॉलर बढ़कर 105.23 अरब डॉलर पर पहुँच गया। हाल के वर्षों में भारतीय रिजर्व बैंक लगातार अपने स्वर्ण भंडार को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनाव के दौर में सोना सुरक्षित निवेश माना जाता है,इसलिए केंद्रीय बैंक भी अपने कुल विदेशी मुद्रा भंडार में स्वर्ण की हिस्सेदारी को संतुलित बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास भारत की स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स होल्डिंग में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गई। यह 30 लाख डॉलर बढ़कर 18.626 अरब डॉलर हो गई। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत की रिजर्व ट्रेंच पोजिशन भी 70 लाख डॉलर बढ़कर 4.793 अरब डॉलर तक पहुँच गई। ये दोनों घटक भी देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा होते हैं और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में भारत की स्थिति को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालाँकि,मौजूदा स्तर पिछले कुछ महीनों की तुलना में बेहतर दिखाई दे रहा है,लेकिन यह अभी भी उस रिकॉर्ड स्तर से नीचे है,जहाँ भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इस वर्ष फरवरी के अंत में पहुँचा था। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, 27 फरवरी को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार अपने अब तक के सर्वोच्च स्तर 728.494 अरब डॉलर तक पहुँच गया था। इसके बाद वैश्विक परिस्थितियों में आए बदलाव और पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण विदेशी मुद्रा भंडार में धीरे-धीरे कमी आने लगी।

विशेषज्ञों के अनुसार,मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ा। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ने के कारण रुपये पर दबाव बना और उसकी विनिमय दर में कमजोरी देखने को मिली। ऐसे समय में भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करते हुए डॉलर की बिक्री की,ताकि रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके और विनिमय बाजार में स्थिरता बनी रहे। इसी हस्तक्षेप के कारण विदेशी मुद्रा भंडार में कुछ सप्ताह तक गिरावट दर्ज की गई थी।

भारतीय रिजर्व बैंक लंबे समय से यह नीति अपनाता रहा है कि जब भी विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक अस्थिरता दिखाई देती है,तब वह बाजार में हस्तक्षेप करता है। इसका उद्देश्य किसी विशेष विनिमय दर को बनाए रखना नहीं होता, बल्कि बाजार में अनावश्यक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना और वित्तीय स्थिरता बनाए रखना होता है। केंद्रीय बैंक ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि वह भविष्य में भी विदेशी मुद्रा बाजार की गतिविधियों पर लगातार नजर रखेगा और आवश्यकता पड़ने पर उचित कदम उठाएगा।

इसी बीच वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल के महीनों में देशवासियों से कुछ विशेष अपील की थी। उन्होंने नागरिकों से गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं को कम करने,ईंधन की खपत घटाने और एक वर्ष तक सोने की खरीद को टालने का आग्रह किया था। सरकार का मानना है कि ऐसे कदमों से विदेशी मुद्रा की बचत होगी और वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाए रखने में मदद मिलेगी।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश के लिए कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण होता है। इससे आयात भुगतान,बाहरी ऋण दायित्वों और वैश्विक आर्थिक संकट जैसी परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता बढ़ती है। साथ ही यह विदेशी निवेशकों के बीच भी विश्वास पैदा करता है कि देश की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को झेलने में सक्षम है। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार ऊर्जा सुरक्षा,व्यापारिक स्थिरता और वित्तीय संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

हाल के आँकड़े यह संकेत देते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक चुनौतियों के बावजूद धीरे-धीरे अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है। विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार दूसरे सप्ताह हुई बढ़ोतरी से यह उम्मीद बढ़ी है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ अनुकूल बनी रहती हैं और विदेशी पूँजी प्रवाह स्थिर रहता है,तो आने वाले समय में भंडार में और वृद्धि देखने को मिल सकती है। फिलहाल भारतीय रिजर्व बैंक की सतर्क नीति और मजबूत आर्थिक बुनियाद देश को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।