चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन (तस्वीर क्रेडिट@shen_shiwei)

ईरान बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी को लेकर चीन की तीखी प्रतिक्रिया,बताया ‘खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना’ कदम

बीजिंग,15 अप्रैल (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच चीन ने ईरान के बंदरगाहों पर अमेरिका की कथित नाकेबंदी को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने इसे “खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना” करार देते हुए कहा कि इस तरह की सैन्य कार्रवाई क्षेत्रीय स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे न केवल तनाव बढ़ेगा,बल्कि पहले से कमजोर पड़े संघर्ष विराम समझौते पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

बीजिंग में आयोजित नियमित प्रेस वार्ता के दौरान गुओ जियाकुन ने कहा कि अमेरिका द्वारा सैन्य गतिविधियों को बढ़ाना और लक्षित नाकेबंदी करना स्थिति को और जटिल बना रहा है। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया पहले ही संवेदनशील दौर से गुजर रहा है और ऐसे में इस तरह के कदम आग में घी डालने का काम करेंगे। चीन ने साफ संकेत दिया कि वह इस मुद्दे पर गहरी चिंता रखता है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करता है।

चीन ने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है और यहाँ से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में तेल और गैस का परिवहन होता है। गुओ जियाकुन ने कहा कि यदि इस मार्ग की सुरक्षा खतरे में पड़ती है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जहाजों की आवाजाही में किसी भी प्रकार की बाधा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है।

इस दौरान जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अतिरिक्त टैरिफ से जुड़े बयान पर सवाल किया गया,तो चीनी प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका सैन्य उत्पादों के निर्यात के बहाने चीन पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की कोशिश करता है,तो बीजिंग इसका कड़ा जवाब देगा। उन्होंने कहा कि चीन अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा और किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।

चीन ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर भी चिंता जताई है। फिलीपींस के दावो में अमेरिकी सेना द्वारा नए सैन्य ईंधन डिपो के निर्माण की योजना पर प्रतिक्रिया देते हुए गुओ जियाकुन ने कहा कि इस तरह के कदम क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया पहले ही कई चुनौतियों से जूझ रही है और ऐसे में एकतरफा फैसले तथा सैन्य शक्ति का प्रदर्शन वैश्विक संतुलन को बिगाड़ सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जो विकास और स्थिरता हासिल की गई है,वह लंबे प्रयासों का परिणाम है और इसे किसी भी कीमत पर बाधित नहीं किया जाना चाहिए। चीन का मानना है कि इस क्षेत्र में सहयोग और संवाद के जरिए ही स्थायी शांति सुनिश्चित की जा सकती है,न कि सैन्य दबाव के माध्यम से।

उधर,अमेरिका की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर सख्त रुख अपनाने के संकेत मिले हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाएगी और जरूरत पड़ने पर उन्हें रोका भी जा सकता है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार,इस ऑपरेशन में अत्याधुनिक युद्धपोत यूएसएस ट्रिपोली (एलएचए-7) को तैनात किया गया है,जिसमें एफ-35बी लाइटनिंग स्टील्थ फाइटर जेट, एमवी-22 ओस्प्रे विमान और हेलिकॉप्टर शामिल हैं।

इस सैन्य तैनाती ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की चिंता को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है,तो इसका असर वैश्विक व्यापार,ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर पड़ सकता है।

इसी बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी सक्रिय कूटनीतिक पहल शुरू कर दी है। उन्होंने बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नहयान से मुलाकात की और मध्य पूर्व में शांति के लिए चार सूत्रीय प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व,संप्रभुता का सम्मान,अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन और विकास-सुरक्षा संतुलन जैसे अहम बिंदु शामिल हैं।

इसके अलावा,चीन ने यूरोपीय देशों के साथ भी इस मुद्दे पर संवाद बढ़ाया है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज के साथ बैठक में शी जिनपिंग ने अमेरिका के बढ़ते हस्तक्षेप पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दुनिया में “जंगल का कानून” लौटने का खतरा बढ़ रहा है और इसे रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना जरूरी है।

ईरान के बंदरगाहों पर कथित अमेरिकी नाकेबंदी को लेकर वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। चीन का कड़ा रुख यह दर्शाता है कि यह मुद्दा अब केवल क्षेत्रीय नहीं,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रमुख वैश्विक शक्तियाँ इस संकट को सुलझाने के लिए किस तरह के कदम उठाती हैं और क्या कूटनीतिक प्रयास स्थिति को शांत करने में सफल हो पाते हैं।