सोल/वाशिंगटन, 20 अगस्त (युआईटीवी)- कोरियाई प्रायद्वीप एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन से मुलाकात करने की घोषणा की है,वहीं चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सोल की यात्रा के दौरान स्पष्ट किया है कि बीजिंग कोरियाई प्रायद्वीप में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए अपनी “रचनात्मक भूमिका” जारी रखेगा। दोनों घटनाक्रम लगभग एक ही समय पर सामने आए हैं और इन्हें केवल संयोग मानना मुश्किल है। इनसे यह संकेत मिलता है कि पूर्वी एशिया में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच कोरियाई प्रायद्वीप एक बार फिर अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक खींचतान का महत्वपूर्ण केंद्र बनने जा रहा है।
अमेरिका और चीन की प्राथमिकताएँ भले ही अलग हों,लेकिन दोनों के लिए कोरियाई प्रायद्वीप का घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। वाशिंगटन की सबसे बड़ी चिंता उत्तर कोरिया का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम है। अमेरिका अपने सहयोगी दक्षिण कोरिया की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ उत्तर कोरिया की सैन्य क्षमताओं पर नियंत्रण चाहता है। दूसरी ओर चीन की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि कोरियाई प्रायद्वीप पर ऐसा कोई संकट पैदा न हो जिससे युद्ध का खतरा बढ़े या पूर्वी एशिया में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और मजबूत हो जाए।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को व्हाइट हाउस में तकनीकी क्षेत्र के नेताओं के साथ आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उत्तर कोरिया से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए कहा कि किम जोंग-उन के साथ उनके रिश्ते अच्छे हैं। ट्रंप ने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि जापान या दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यास क्यों किए गए,क्योंकि उनके अनुसार इस तरह की गतिविधियाँ उत्तर कोरिया के साथ संबंधों के लिए ठीक नहीं थीं। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस साल किम जोंग-उन से मुलाकात करेंगे।
ट्रंप और किम के बीच व्यक्तिगत संपर्क पहले भी दुनिया का ध्यान खींच चुका है। ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान दोनों नेताओं के बीच वर्ष 2018 और 2019 में तीन महत्वपूर्ण मुलाकातें हुई थीं। इन बैठकों ने उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से जारी तनाव के बीच कूटनीतिक समाधान की उम्मीद पैदा की थी। हालाँकि,इन चर्चाओं के बावजूद उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका और दोनों देशों के बीच वार्ता आगे नहीं बढ़ पाई।
इस बार परिस्थितियाँ पहले की तुलना में काफी अलग हैं। उत्तर कोरिया ने पिछले कुछ वर्षों में अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को और आगे बढ़ाया है। देश की सरकार अपने परमाणु हथियारों को केवल बातचीत में इस्तेमाल किए जाने वाले दबाव के साधन के रूप में नहीं,बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और शासन की निरंतरता की गारंटी के रूप में देखती है। यही कारण है कि इस बार ट्रंप और किम के बीच संभावित बातचीत पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो सकती है।
उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमता को लेकर भी अलग-अलग आकलन सामने आ रहे हैं। ट्रंप ने दावा किया है कि उत्तर कोरिया के पास 57 “बहुत शक्तिशाली” परमाणु हथियार हैं। दूसरी ओर,दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बैक ने गुरुवार को संसद में कहा कि आम तौर पर प्योंगयांग के पास 80 से 120 परमाणु हथियार होने का अनुमान लगाया जाता है। इन आँकड़ों में अंतर यह दिखाता है कि उत्तर कोरिया की वास्तविक परमाणु क्षमता का आकलन करना कितना मुश्किल है।
परमाणु हथियारों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण यह सवाल है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को किस नजरिए से देखता है। प्योंगयांग लंबे समय से यह संकेत देता रहा है कि वह अपने परमाणु हथियारों को अपनी सुरक्षा के लिए अनिवार्य मानता है। उत्तर कोरियाई नेतृत्व का मानना है कि परमाणु क्षमता उसे बाहरी सैन्य हस्तक्षेप से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में अमेरिका के लिए उत्तर कोरिया को परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए तैयार करना आसान नहीं होगा।
इसी बीच चीन ने भी कोरियाई प्रायद्वीप को लेकर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सोल में दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चो ह्यून से मुलाकात की। बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि चीन कोरियाई प्रायद्वीप में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए अपनी रचनात्मक भूमिका जारी रखेगा। वांग यी ने उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच धीरे-धीरे शांति और सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ने की इच्छा भी जताई।
चीन का यह बयान ऐसे समय में आया है,जब दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने कोरियाई युद्ध को औपचारिक रूप से समाप्त करने के लिए बहुपक्षीय बातचीत का प्रस्ताव रखा है। वर्ष 1950 से 1953 तक चले कोरियाई युद्ध का अंत किसी औपचारिक शांति संधि से नहीं,बल्कि युद्धविराम के साथ हुआ था। इसका अर्थ यह है कि तकनीकी रूप से दोनों कोरियाई देश आज भी युद्ध की स्थिति में माने जाते हैं। इसलिए युद्ध को औपचारिक रूप से समाप्त करने की पहल का क्षेत्रीय राजनीति पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।
दक्षिण कोरिया की इस पहल में चीन की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। बीजिंग उत्तर कोरिया का सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी है और प्योंगयांग के साथ उसके ऐतिहासिक तथा रणनीतिक संबंध रहे हैं। चीन उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम से पैदा होने वाले जोखिमों को लेकर चिंतित जरूर है,लेकिन वह किसी ऐसे दबाव का समर्थन नहीं करना चाहता जिससे उत्तर कोरिया अस्थिर हो जाए। प्योंगयांग में सत्ता का संकट या बड़े पैमाने पर अस्थिरता चीन की सीमा पर गंभीर सुरक्षा और मानवीय चुनौतियाँ पैदा कर सकती है।
चीन के लिए एक और बड़ी चिंता अमेरिकी सैन्य मौजूदगी है। यदि उत्तर कोरिया के साथ तनाव बढ़ता है और क्षेत्र में सुरक्षा संकट पैदा होता है,तो अमेरिका दक्षिण कोरिया और जापान में अपनी सैन्य क्षमता और बढ़ा सकता है। इससे अमेरिकी सैन्य ढाँचा चीन की सीमाओं के और करीब आ सकता है। बीजिंग के लिए यह रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील स्थिति होगी। यही कारण है कि चीन युद्ध या बड़े सैन्य टकराव के बजाय तनाव को नियंत्रित रखने और बातचीत के रास्ते खुले रखने पर जोर देता है।
अमेरिका के लिए तस्वीर इसके विपरीत है। दक्षिण कोरिया और जापान के साथ उसके सुरक्षा गठबंधन पूर्वी एशिया में अमेरिकी रणनीति की आधारशिला हैं। अमेरिका के हजारों सैनिक दक्षिण कोरिया में तैनात हैं और दोनों देश नियमित रूप से संयुक्त सैन्य अभ्यास करते हैं। वाशिंगटन इन अभ्यासों को क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य तैयारी के लिए आवश्यक मानता है,लेकिन उत्तर कोरिया इन्हें अपने खिलाफ सैन्य कार्रवाई की तैयारी के रूप में देखता है।
यही विरोधाभास ट्रंप की हालिया टिप्पणियों को महत्वपूर्ण बनाता है। ट्रंप ने सैन्य अभ्यासों पर सवाल उठाते हुए संकेत दिया कि वह उत्तर कोरिया के साथ बातचीत के लिए ऐसा माहौल चाहते हैं,जिसमें प्योंगयांग खुद को सीधे सैन्य दबाव में महसूस न करे। हालाँकि, इस दृष्टिकोण से दक्षिण कोरिया और जापान की सुरक्षा चिंताओं को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं।
दक्षिण कोरिया की स्थिति सबसे जटिल है। उसकी सुरक्षा अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन पर काफी हद तक निर्भर है,जबकि चीन उसके लिए एक महत्वपूर्ण पड़ोसी और बड़ा आर्थिक साझेदार है। सोल को एक तरफ अमेरिकी सुरक्षा छाते को मजबूत बनाए रखना है, तो दूसरी तरफ चीन के साथ अपने आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को भी संतुलित करना है। ऐसे में ट्रंप और किम के बीच संभावित बातचीत दक्षिण कोरिया के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।
अगर अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच सीधा संवाद शुरू होता है और इससे तनाव कम होता है,तो दक्षिण कोरिया को सुरक्षा के लिहाज से लाभ मिल सकता है,लेकिन अगर बातचीत में केवल अमेरिका और उत्तर कोरिया के हितों को प्राथमिकता दी गई और दक्षिण कोरिया की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिला,तो सोल के सामने नई कूटनीतिक चुनौती पैदा हो सकती है।
दक्षिण कोरिया की चिंता केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं है। उत्तर कोरिया की मिसाइल क्षमता,सीमा पर सैन्य तैनाती और पारंपरिक हथियारों की ताकत भी सोल के लिए गंभीर सुरक्षा मुद्दे हैं। इसलिए यदि भविष्य में ट्रंप और किम के बीच कोई समझौता होता है तो दक्षिण कोरिया यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि उसकी सुरक्षा जरूरतों को भी बातचीत के केंद्र में रखा जाए।
जापान की भूमिका भी इस पूरे समीकरण में महत्वपूर्ण है। उत्तर कोरिया की मिसाइलें जापान के लिए सीधे सुरक्षा खतरे के रूप में देखी जाती हैं। अमेरिका और जापान के बीच मजबूत सुरक्षा गठबंधन है और दोनों देश उत्तर कोरिया के परमाणु एवं मिसाइल कार्यक्रम को लेकर लगातार चिंता जताते रहे हैं। ऐसे में ट्रंप द्वारा जापान और दक्षिण कोरिया के सैन्य अभ्यासों को उत्तर कोरिया के संदर्भ में उचित नहीं मानना टोक्यो और सोल दोनों के लिए संवेदनशील संदेश हो सकता है।
रूस भी कोरियाई प्रायद्वीप की बदलती रणनीतिक तस्वीर में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उत्तर कोरिया और रूस के बीच पिछले कुछ समय में संबंधों में नजदीकी बढ़ी है। ऐसे में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए प्योंगयांग को केवल चीन के प्रभाव के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। उत्तर कोरिया के बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय संपर्कों ने उसकी कूटनीतिक स्थिति को पहले की तुलना में अधिक जटिल बना दिया है।
यही वजह है कि ट्रंप और किम की संभावित मुलाकात केवल दो नेताओं के बीच बातचीत नहीं होगी। इसके पीछे अमेरिका की पूर्वी एशिया रणनीति,चीन की क्षेत्रीय सुरक्षा प्राथमिकताएं, दक्षिण कोरिया की सुरक्षा चिंताएँ,जापान की भूमिका और उत्तर कोरिया की परमाणु नीति जैसे कई सवाल जुड़े होंगे।
सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि ट्रंप इस बार किम से किस एजेंडे के साथ बातचीत करेंगे। क्या अमेरिका फिर से पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण को प्राथमिक लक्ष्य बनाएगा या उत्तर कोरिया की मौजूदा परमाणु क्षमता को स्वीकार करते हुए जोखिम कम करने पर ध्यान देगा? ट्रंप ने इस मुद्दे पर अभी स्पष्ट स्थिति नहीं बताई है। दूसरी ओर,उत्तर कोरिया भी अपने परमाणु हथियारों को आसानी से छोड़ने के लिए तैयार दिखाई नहीं देता।
चीन की भूमिका भी इस प्रक्रिया में निर्णायक हो सकती है। बीजिंग यह नहीं चाहेगा कि अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच ऐसा समझौता हो जिससे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य प्रभाव और बढ़ जाए। साथ ही चीन किसी नए युद्ध या परमाणु संकट का जोखिम भी नहीं लेना चाहता। इसलिए बीजिंग की रणनीति संभवतः तनाव कम करने,संवाद बनाए रखने और किसी भी समझौते में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने की होगी।
वांग यी का सोल दौरा इसी व्यापक रणनीति का संकेत माना जा सकता है। चीन यह संदेश देना चाहता है कि कोरियाई प्रायद्वीप की सुरक्षा व्यवस्था पर बातचीत में बीजिंग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिका यदि प्योंगयांग के साथ सीधे संवाद करता है तो चीन भी क्षेत्रीय कूटनीति में अपनी भूमिका बनाए रखना चाहता है।
ऐसे में कोरियाई प्रायद्वीप आने वाले समय में बड़ी शक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है। एक ओर अमेरिका उत्तर कोरिया से सीधे संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहा है,दूसरी ओर चीन शांति और स्थिरता के नाम पर अपनी कूटनीतिक भूमिका को मजबूत कर रहा है। दक्षिण कोरिया अपने सुरक्षा हितों और कूटनीतिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है,जबकि उत्तर कोरिया अपनी परमाणु क्षमता को अपनी सुरक्षा नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाए हुए है।
अगर ट्रंप और किम के बीच इस साल मुलाकात होती है,तो यह 2018 और 2019 की बैठकों के बाद एक नई कूटनीतिक शुरुआत हो सकती है,लेकिन इस बार बातचीत का रास्ता पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन होगा। परमाणु हथियारों की बढ़ी क्षमता, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता,रूस की बढ़ती भूमिका और दक्षिण कोरिया की सुरक्षा चिंताएँ किसी भी संभावित समझौते को जटिल बनाएँगी।
इसलिए ट्रंप-किम संपर्क और वांग यी की सोल यात्रा को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय एक ही व्यापक कूटनीतिक तस्वीर के हिस्से के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा। अमेरिका सीधे प्योंगयांग तक पहुँच बनाने की कोशिश कर रहा है,जबकि चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोरियाई प्रायद्वीप की शांति और सुरक्षा की प्रक्रिया में उसकी भूमिका बनी रहे। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन दोनों बड़ी शक्तियों की रणनीतियाँ किस तरह टकराती या एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाती हैं और इस पूरे समीकरण में दक्षिण कोरिया तथा उत्तर कोरिया किस तरह अपनी स्थिति तय करते हैं।
