बेरूत,27 जून (युआईटीवी)- लेबनान और इजरायल के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच वॉशिंगटन में हुए नए फ्रेमवर्क समझौते ने पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने इस समझौते को देश की पूर्ण संप्रभुता बहाल करने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम बताया है। उन्होंने कहा कि यह समझौता केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है,बल्कि लेबनान के भविष्य, उसकी क्षेत्रीय अखंडता और विस्थापित नागरिकों की घर वापसी की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। हालाँकि,इस समझौते को लेकर देश के भीतर मतभेद भी सामने आ गए हैं। हिज्बुल्लाह ने इस समझौते का कड़ा विरोध करते हुए साफ कर दिया है कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने हथियार नहीं छोड़ेगा।
लेबनानी राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी आधिकारिक बयान में राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने कहा कि सरकार इस समझौते को पूरी तरह लागू कराने और देश की संप्रभुता बहाल करने के लिए लगातार प्रयास करती रहेगी। उन्होंने कहा कि वर्षों से संघर्ष और अस्थिरता के कारण अपने घरों से विस्थापित हुए हजारों लेबनानी नागरिकों के लिए यह समझौता नई उम्मीद लेकर आया है। उनके अनुसार इस प्रक्रिया के सफल होने से लोग अपनी जमीन और घरों में सुरक्षित लौट सकेंगे तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में सामान्य जीवन धीरे-धीरे बहाल होगा।
राष्ट्रपति आउन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लेबनान अब किसी भी प्रकार के विदेशी कब्जे को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि देश की भूमि पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए यह समझौता किया गया है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि सभी पक्ष अपने दायित्वों का ईमानदारी से पालन करें तो क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है।
उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए अमेरिका का विशेष आभार व्यक्त किया। राष्ट्रपति ने कहा कि वॉशिंगटन ने दोनों पक्षों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने और सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके साथ ही उन्होंने उन अरब देशों और अन्य मित्र राष्ट्रों का भी धन्यवाद किया,जिन्होंने पूरे वार्ता दौर में लेबनान का समर्थन किया और शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में सहयोग दिया।
हालाँकि,इस समझौते को लेकर लेबनान के भीतर राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है। देश के प्रभावशाली संगठन हिज्बुल्लाह ने इस फ्रेमवर्क समझौते का तीखा विरोध किया है। संगठन के सांसद हसन फदलल्लाह ने स्पष्ट कहा कि हिज्बुल्लाह इस समझौते को लागू करने की किसी भी कोशिश का विरोध करेगा। उन्होंने दोहराया कि संगठन अपने हथियार नहीं छोड़ेगा और वह स्वयं को लेबनान की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानता है।
हसन फदलल्लाह ने यह भी कहा कि हिज्बुल्लाह के प्रमुख सहयोगी ईरान का भी इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख है। उनके अनुसार तेहरान ने संकेत दिया है कि जब तक इजरायल पूरी तरह लेबनानी क्षेत्र से पीछे नहीं हटता,तब तक वह अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार के समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा। इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लेबनान-इजरायल समझौते का असर केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया की कूटनीतिक और सामरिक राजनीति पर भी पड़ सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह फ्रेमवर्क समझौता दोनों देशों के बीच वर्षों से चले आ रहे सीमा विवाद और सुरक्षा संबंधी तनाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। लंबे समय से दक्षिणी लेबनान में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच समय-समय पर संघर्ष होता रहा है,जिससे सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों का सामान्य जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। ऐसे में यह समझौता यदि सफलतापूर्वक लागू होता है,तो क्षेत्र में स्थिरता स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
इजरायल के सरकारी प्रसारक कान टीवी के अनुसार इस समझौते के तहत एक पायलट कार्यक्रम लागू किया जाएगा। इसके अंतर्गत इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान के दो क्षेत्रों से चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेगी। इसे विश्वास बहाली की दिशा में पहला कदम माना जा रहा है। इसके अलावा समझौते में दक्षिणी लेबनान में हिज्बुल्लाह द्वारा बनाई गई कथित सुरंगों और संगठन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों से निपटने के लिए भी एक साझा रूपरेखा तैयार की गई है।
इस बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी इस समझौते को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट किया। एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा कि जब तक हिज्बुल्लाह अपने हथियार नहीं छोड़ता,तब तक इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान में अपने नियंत्रण वाले सुरक्षा क्षेत्र में तैनात रहेगी। उन्होंने कहा कि इजरायल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा और सीमावर्ती क्षेत्रों में किसी भी खतरे का सामना करने के लिए तैयार रहेगा।
नेतन्याहू ने इस समझौते को इजरायल की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता बताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक चली जटिल वार्ताओं और कई दौर की बातचीत के बाद यह समझौता संभव हो सका है। उनके अनुसार यह केवल सीमा सुरक्षा से जुड़ा समझौता नहीं है,बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में भी एक अहम कदम है।
इजरायली प्रधानमंत्री ने यह भी दावा किया कि यह समझौता ईरान के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका है। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान लगातार इजरायल पर दबाव बनाने और उसे दक्षिणी लेबनान से पीछे हटने के लिए मजबूर करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन यह समझौता इजरायल की शर्तों और सुरक्षा हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
हालाँकि,समझौते की घोषणा के बावजूद जमीन पर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। लेबनान की राष्ट्रीय समाचार एजेंसी के अनुसार शुक्रवार को भी इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में जमीनी और हवाई अभियान जारी रखा। सीमा से सटे ऐन अरब कस्बे में इजरायली सैनिकों ने तलाशी अभियान चलाया,जिससे स्थानीय लोगों में एक बार फिर तनाव का माहौल बन गया।
समाचार एजेंसी के अनुसार इस कार्रवाई से कुछ घंटे पहले इजरायली सेना तीन लेबनानी नागरिकों और चार सीरियाई कृषि श्रमिकों सहित सात लोगों को अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र में ले गई थी। इस घटना ने समझौते के बाद भी दोनों देशों के बीच मौजूद अविश्वास और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को उजागर कर दिया है।
कुल मिलाकर लेबनान और इजरायल के बीच हुआ यह नया फ्रेमवर्क समझौता क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है,लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। एक ओर लेबनानी सरकार इसे संप्रभुता बहाल करने और विस्थापित नागरिकों की वापसी का अवसर मान रही है,वहीं हिज्बुल्लाह का विरोध और सीमा पर जारी सैन्य गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि स्थायी शांति की राह अभी आसान नहीं है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के कदम और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भूमिका इस समझौते के भविष्य को तय करने में निर्णायक साबित होगी।
