नई दिल्ली,21 अगस्त (युआईटीवी)- लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बनाए रखने की माँग दोहराई है। उन्होंने कहा कि लोकसभा सीटों के बँटवारे,तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव और कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव में इस मुद्दे पर एक समान रुख अपनाया गया है। कांग्रेस का कहना है कि लोकसभा की कुल सीटों की मौजूदा संख्या और राज्यों के बीच सीटों का अनुपात कम से कम अगले 25 वर्षों तक बरकरार रखा जाना चाहिए।
पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के जरिए परिसीमन को लेकर पार्टी का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा की कुल 543 सीटों और तमिलनाडु की 39 संसदीय सीटों में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। कांग्रेस की माँग है कि मौजूदा आँकड़ों को अगले 25 वर्षों तक बढ़ाया जाए। उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी और मुख्य विपक्षी पार्टी भी इस माँग का समर्थन कर रही हैं।
परिसीमन का मुद्दा विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन राज्यों ने लंबे समय से जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को आगे बढ़ाया है। ऐसे में उनका तर्क है कि यदि लोकसभा सीटों का बँटवारा केवल मौजूदा जनसंख्या के आधार पर किया जाता है,तो अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं और जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है,उनका संसद में प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
तमिलनाडु सरकार ने भी इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखने की माँग की है। प्रस्ताव में कहा गया है कि राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का मौजूदा अनुपात भी स्थायी रूप से बरकरार रहना चाहिए। राज्य सरकार का तर्क है कि परिसीमन की प्रक्रिया में राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का मौजूदा संतुलन प्रभावित नहीं होना चाहिए।
तमिलनाडु के प्रस्ताव में जनसंख्या और राज्यों के बीच मौजूदा अनुपात को बनाए रखने की बात भी कही गई है। इसके अलावा महिला आरक्षण को लेकर भी राज्य ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। प्रस्ताव के मुताबिक,2029 के लोकसभा चुनाव में मौजूदा 543 सीटों के आधार पर ही 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू किया जाना चाहिए। यानी महिला आरक्षण को परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़ने से जोड़ने के बजाय मौजूदा लोकसभा सीटों पर ही लागू करने की मांग की गई है।
दरअसल,लोकसभा परिसीमन और महिला आरक्षण का मुद्दा आपस में जुड़ा हुआ है। वर्ष 2023 में संसद ने महिला आरक्षण से संबंधित कानून को मंजूरी दी थी,जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। हालाँकि,इसके लागू होने को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। इसी वजह से परिसीमन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच बहस लगातार बनी हुई है।
इस मुद्दे के बीच संविधान संशोधन विधेयक का भी उल्लेख महत्वपूर्ण है। संविधान संशोधन विधेयक, 2026 को 16 अप्रैल को लोकसभा में पेश किया गया था। इसमें लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने और 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को जल्द लागू करने का प्रस्ताव रखा गया था। हालाँकि,यह विधेयक संसद में आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका।
संवैधानिक संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। प्रस्तावित विधेयक को यह आवश्यक समर्थन नहीं मिल सका,जिसके कारण वह आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद लोकसभा सीटों की संख्या और परिसीमन को लेकर राजनीतिक चर्चा और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
पी. चिदंबरम के ताजा बयान से साफ है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर मौजूदा लोकसभा सीटों की संख्या को बनाए रखने के पक्ष में है। उनका कहना है कि 543 सीटों का मौजूदा आँकड़ा और राज्यों के बीच सीटों का अनुपात अगले 25 वर्षों तक बरकरार रहना चाहिए। कांग्रेस का यह रुख दक्षिण भारत के उन राज्यों की चिंताओं के अनुरूप है,जो परिसीमन के बाद अपने संसदीय प्रतिनिधित्व में संभावित बदलाव को लेकर आशंकित हैं।
तमिलनाडु की राजनीति में इस मुद्दे पर व्यापक सहमति दिखाई देने का दावा भी किया गया है। पी. चिदंबरम ने कहा कि राज्य की सत्ताधारी पार्टी के साथ मुख्य विपक्षी पार्टी भी इस रुख का समर्थन कर रही है। इसका मतलब यह है कि परिसीमन का मुद्दा राज्य में केवल किसी एक राजनीतिक दल का विषय नहीं रह गया है,बल्कि इसे राज्य के संसदीय प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन से जोड़कर देखा जा रहा है।
तमिलनाडु में विधानसभा की कुल 234 सीटें हैं। इनमें 189 सामान्य और 45 आरक्षित सीटें हैं। राज्य की लोकसभा में 39 सीटें हैं। परिसीमन की संभावित प्रक्रिया को लेकर राज्य का जोर इसी मौजूदा प्रतिनिधित्व को बनाए रखने पर है। राज्य सरकार चाहती है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों में बदलाव करते समय उन राज्यों के योगदान को भी ध्यान में रखा जाए,जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक विकास के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है।
परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या में बदलाव के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व को व्यवस्थित करना होता है,लेकिन भारत जैसे संघीय ढांचे में इसका राजनीतिक महत्व भी काफी अधिक है। लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण राज्यों के संसद में राजनीतिक प्रभाव को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि दक्षिणी और उत्तरी राज्यों के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग चिंताएँ सामने आती रही हैं।
अब पी. चिदंबरम के बयान के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। एक तरफ लोकसभा की सीटें बढ़ाने और महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की माँग है,तो दूसरी तरफ तमिलनाडु और कांग्रेस जैसे पक्ष मौजूदा 543 सीटों और राज्यों के बीच वर्तमान अनुपात को लंबे समय तक बनाए रखने की वकालत कर रहे हैं। आने वाले समय में परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच चर्चा इस राजनीतिक बहस को और व्यापक बना सकती है।
