सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हिरासत में लेते ही शुरू होगी गिरफ्तारी की 24 घंटे की समय-सीमा, देरी होने पर आरोपी की रिहाई जरूरी

नई दिल्ली,5 नवंबर (युआईटीवी)- सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक 24 घंटे की समय-सीमा उसी क्षण से शुरू हो जाती है,जब उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर वास्तव में रोक लगा दी जाती है। जाँच एजेंसी द्वारा गिरफ्तारी की औपचारिक प्रक्रिया पूरी करने या दस्तावेजों में गिरफ्तारी का समय दर्ज करने से यह अवधि शुरू नहीं होती। अदालत ने कहा है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद उसकी स्वतंत्रता सीमित हो जाती है,इसलिए उसी वास्तविक समय को गिरफ्तारी की अवधि की गणना का आधार माना जाएगा।

इस फैसले को नागरिकों के मौलिक अधिकारों और पुलिस हिरासत की प्रक्रिया के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि जाँच एजेंसियाँ तलाशी,जब्ती या अन्य कानूनी औपचारिकताओं का हवाला देकर गिरफ्तारी की वास्तविक अवधि को आगे नहीं बढ़ा सकतीं। यदि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना संवैधानिक रूप से निर्धारित समय से अधिक हिरासत में रखा जाता है,तो उसकी रिहाई का सवाल उठेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कागजों में गिरफ्तारी का समय दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं है,बल्कि मजिस्ट्रेट को यह जाँचना होगा कि व्यक्ति को वास्तव में कब से हिरासत में रखा गया था।

यह फैसला चार आरोपियों की ओर से दायर अपीलों पर सुनाया गया। इन लोगों ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी,जिसमें उन्हें नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट यानी एनडीपीएस कानून के तहत दर्ज मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। मामले की सुनवाई जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने की। पीठ ने संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि गिरफ्तारी की 24 घंटे की अवधि की गणना उस तारीख और समय से की जानी चाहिए, जब व्यक्ति को वास्तव में हिरासत में लिया गया था।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(2) गिरफ्तार व्यक्ति को एक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इसके तहत किसी भी गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। इस अवधि की गणना करते समय गिरफ्तारी के स्थान से अदालत तक पहुँचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय शामिल नहीं किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस किसी व्यक्ति को बिना न्यायिक निगरानी के लंबे समय तक अपनी हिरासत में न रख सके।

संविधान का यह प्रावधान व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने और पुलिस की शक्तियों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए बनाया गया है। किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस को निर्धारित समय के भीतर उसे न्यायिक अधिकारी के सामने पेश करना होता है। इसके बाद हिरासत जारी रखने या रिमांड देने का फैसला मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस तरह गिरफ्तारी के शुरुआती चरण से ही न्यायिक निगरानी सुनिश्चित की जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस संवैधानिक सुरक्षा का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है,जब 24 घंटे की अवधि की गणना वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से की जाए। यदि जाँच एजेंसी को यह छूट दे दी जाए कि वह अपनी सुविधा के अनुसार औपचारिक गिरफ्तारी का समय दर्ज करके अवधि की गणना शुरू करे,तो संविधान में दी गई सुरक्षा कमजोर हो सकती है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि तलाशी और जब्ती की कार्रवाई पूरी होने के बाद या जाँच एजेंसी द्वारा गिरफ्तारी का औपचारिक रिकॉर्ड तैयार किए जाने के समय से 24 घंटे की गणना करना कानून के अनुरूप नहीं है। अदालत के मुताबिक,ऐसा करना न केवल कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ होगा,बल्कि संवैधानिक प्रावधानों का भी उल्लंघन होगा। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता जिस समय से सीमित होती है,वही समय उसकी हिरासत की शुरुआत माना जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना संवैधानिक रूप से तय 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा जाता है,तो उसे तत्काल रिहा किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी साफ किया कि इस अवधि की गणना में केवल वही आवश्यक यात्रा समय घटाया जा सकता है,जो गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुँचने में लगता है। इसके अलावा किसी अन्य गतिविधि या जांच प्रक्रिया के लिए लगाए गए समय को 24 घंटे की अवधि से बाहर नहीं रखा जा सकता।

इसका अर्थ है कि जाँच एजेंसी किसी आरोपी को पहले हिरासत में लेकर उससे पूछताछ करे,तलाशी और जब्ती की कार्रवाई पूरी करे और फिर बाद में औपचारिक गिरफ्तारी दिखाए, तो वह इस प्रक्रिया के आधार पर संवैधानिक समय-सीमा को आगे नहीं बढ़ा सकती। अदालत ने वास्तविक परिस्थितियों और व्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंध को महत्वपूर्ण माना है।

हालाँकि,सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर देना ही हिरासत को स्वतः वैध नहीं बना देता। जाँच एजेंसी को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हिरासत की अवधि कानून के अनुसार उचित हो। इसके लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58 के प्रावधानों का पालन करना जरूरी है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58 के अनुसार,बिना वारंट गिरफ्तार किए गए किसी व्यक्ति को पुलिस अधिकारी मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित अवधि से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रख सकता। इसके साथ ही,मजिस्ट्रेट के किसी विशेष आदेश के अभाव में हिरासत की अवधि 24 घंटे से अधिक नहीं हो सकती। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस हिरासत केवल जरूरत और कानून के दायरे में ही रहे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अनुच्छेद 22(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58 को एक साथ समझना जरूरी है। इसका मतलब है कि पुलिस को न केवल संवैधानिक समय-सीमा का पालन करना होगा,बल्कि हिरासत की अवधि को मामले की परिस्थितियों के आधार पर उचित भी साबित करना होगा। यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया जाता है,तब भी यह जरूरी नहीं कि हिरासत की पूरी अवधि न्यायसंगत मानी जाए।

अदालत ने इस मामले में मजिस्ट्रेट की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। पीठ के मुताबिक,जब किसी आरोपी को पहली बार मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है, तो न्यायिक अधिकारी का दायित्व है कि वह रिकॉर्ड में उस वास्तविक तारीख और समय को दर्ज करे, जब व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित की गई थी। इसके बाद मजिस्ट्रेट को खुद यह जाँच करनी चाहिए कि गिरफ्तारी और पेशी के बीच संवैधानिक समय-सीमा का पालन हुआ है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को केवल पुलिस की ओर से प्रस्तुत गिरफ्तारी मेमो या दस्तावेजों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसे यह पता लगाना होगा कि आरोपी को वास्तव में कब हिरासत में लिया गया था। इसके आधार पर यह तय किया जाना चाहिए कि उसे अदालत के सामने निर्धारित समय के भीतर पेश किया गया या नहीं।

पीठ ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट को हिरासत की अवधि की उचितता पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा। यदि गिरफ्तारी से लेकर पेशी तक का समय 24 घंटे से कम है,तब भी न्यायिक अधिकारी को यह देखना चाहिए कि मामले की परिस्थितियों के हिसाब से इतनी देर तक हिरासत में रखना जरूरी था या नहीं। यदि उसे लगता है कि पुलिस ने बिना पर्याप्त कारण के व्यक्ति को अनुचित अवधि तक हिरासत में रखा,तो वह आगे की रिमांड देने से इनकार कर सकता है।

इस निर्देश से यह स्पष्ट होता है कि मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी केवल आरोपी को अदालत में पेश किए जाने की औपचारिकता पूरी करना नहीं है। उसे व्यक्ति की स्वतंत्रता और पुलिस की कार्रवाई की वैधता की भी जाँच करनी होगी। अदालत ने इस तरह गिरफ्तारी के समय, हिरासत की अवधि और रिमांड की प्रक्रिया में न्यायिक निगरानी को अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया,जिसके तहत चारों अपीलकर्ताओं को एनडीपीएस कानून के मामले में जमानत देने से इनकार किया गया था। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं को जमानत पर रिहा किया जाए। हालाँकि,उनकी रिहाई विशेष अदालत की ओर से निर्धारित शर्तों के अधीन होगी।

यह फैसला गिरफ्तारी की प्रक्रिया में पुलिस और जाँच एजेंसियों की जवाबदेही तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगने के वास्तविक समय को नजरअंदाज करके औपचारिक गिरफ्तारी के समय से संवैधानिक अवधि की गणना नहीं की जा सकती। साथ ही,मजिस्ट्रेट को भी हिरासत के समय और उसकी जरूरत की स्वतंत्र जाँच करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट की इस व्याख्या से गिरफ्तारी के दौरान नागरिकों को मिलने वाले संवैधानिक संरक्षण को मजबूती मिलती है। इसका संदेश स्पष्ट है कि जाँच एजेंसियों को कानून के दायरे में रहकर काम करना होगा और गिरफ्तारी से जुड़ी औपचारिकताओं के जरिए किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को कमजोर नहीं किया जा सकता। अब पुलिस हिरासत और रिमांड से जुड़े मामलों में वास्तविक हिरासत का समय दर्ज करना और उसकी न्यायिक जाँच करना बेहद महत्वपूर्ण होगा।