ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई

ईरान में उबाल पर जन आंदोलन,इंटरनेट बंद कर सरकार ने अपनाया सख्त रुख,खामेनेई ने विदेशी साजिश का लगाया आरोप

नई दिल्ली,10 जनवरी (युआईटीवी)- ईरान इन दिनों अभूतपूर्व राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। देश के कई हिस्सों में पिछले 12 दिनों से जारी विरोध प्रदर्शन अब चरम पर पहुँच गए हैं। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि सरकार ने अशांति पर काबू पाने के लिए देश का लगभग पूरी तरह से दुनिया से संपर्क काट दिया है। इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गई हैं और अंतर्राष्ट्रीय टेलीफोन कॉल्स पर भी रोक लगा दी गई है। सड़कों पर भड़के गुस्से और जलते शहरों के बीच ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी है कि वे “दूसरे देशों के हाथों न खेलें” और सरकार किसी भी सूरत में पीछे हटने वाली नहीं है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक,शुक्रवार को ईरानी अधिकारियों ने व्यापक स्तर पर इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दीं,ताकि प्रदर्शनकारियों के बीच समन्वय और सूचनाओं के प्रसार को रोका जा सके। सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स ठप होने से आम नागरिकों के लिए भी हालात और मुश्किल हो गए हैं। इसके बावजूद जो वीडियो सामने आए हैं,उनमें तेहरान सहित कई बड़े और छोटे शहरों की सड़कों पर सरकार विरोधी प्रदर्शन साफ नजर आते हैं। इन वीडियो में इमारतों और वाहनों में आग लगाई गई,नारेबाजी होती दिखी और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों के दृश्य सामने आए।

इसी बीच,सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने टेलीविजन पर प्रसारित अपने संबोधन में बेहद सख्त लहजे में कहा कि यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त नहीं है,बल्कि इसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी निर्वासित विपक्षी गुटों और संयुक्त राज्य अमेरिका के इशारे पर काम कर रहे हैं। खामेनेई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईरान की इस्लामिक सरकार दबाव में आकर झुकने वाली नहीं है और देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

अपने भाषण में खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कुछ लोग “दूसरे देश के राष्ट्रपति को खुश करने के लिए अपनी ही सड़कों और शहरों को बर्बाद कर रहे हैं।” उनका इशारा सीधे तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर था। हाल ही में एक साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा था कि अगर ईरानी शासन प्रदर्शन कर रहे लोगों को निशाना बनाता है,तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई करेगा। इस बयान के बाद ईरान में सियासी बयानबाजी और तेज हो गई है।

मानवाधिकार संगठनों की ओर से हालात को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। कुछ समूहों ने दक्षिणी ईरान में सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाए जाने की रिपोर्ट दी है। इन रिपोर्टों के मुताबिक,अब तक 40 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है,जबकि सैकड़ों लोग घायल बताए जा रहे हैं। हालाँकि,ईरानी सरकार ने मृतकों की संख्या को लेकर आधिकारिक तौर पर विस्तृत जानकारी साझा नहीं की है।

ईरान में भड़का यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं,बल्कि गहरे सामाजिक-आर्थिक संकट की उपज माना जा रहा है। देश लंबे समय से बढ़ती महँगाई,बेरोजगारी,मुद्रा अवमूल्यन और बदहाल अर्थव्यवस्था से जूझ रहा है। आम लोगों का कहना है कि उनकी आय लगातार घट रही है,जबकि रोजमर्रा की जरूरतों की चीजें आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं। इसके साथ ही सुरक्षा बलों की सख्त और दमनकारी कार्रवाइयों ने जनता के गुस्से को और भड़का दिया है।

इन प्रदर्शनों को ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी का भी समर्थन मिल रहा है। उन्होंने गुरुवार और शुक्रवार को स्थानीय समयानुसार रात 8 बजे देशभर में विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। उनके इस आह्वान के बाद कई शहरों में प्रदर्शन और तेज हो गए। सोशल मीडिया पर,भले ही सरकारी पाबंदियों के कारण सीमित जानकारी सामने आ रही हो,लेकिन जो खबरें बाहर आ रही हैं,उनसे यह साफ है कि विरोध अब केवल कुछ इलाकों तक सीमित नहीं रहा।

8 जनवरी की रात को हालात उस वक्त और बिगड़ गए,जब विरोध प्रदर्शनों ने अचानक रफ्तार पकड़ ली। इसके बाद राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के नेतृत्व वाली सरकार ने इंटरनेट और अंतर्राष्ट्रीय कॉल सेवाएँ बंद करने का फैसला लिया। सरकार का तर्क है कि यह कदम अफवाहों और विदेशी हस्तक्षेप को रोकने के लिए जरूरी था,लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसका मकसद सच्चाई को दुनिया से छिपाना है।

ईरान की न्यायपालिका और सुरक्षा बलों के शीर्ष अधिकारियों ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि “आजादी-आजादी” के नारों के बीच कानून तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार जहाँ इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बता रही है,वहीं प्रदर्शनकारी इसे अपने बुनियादी अधिकारों और बेहतर जीवन की लड़ाई करार दे रहे हैं।

फिलहाल ईरान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है,जहाँ टकराव और संवाद के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। सड़कों पर गुस्सा,सत्ता के गलियारों में सख्ती और दुनिया से कटा हुआ देश—इन सबके बीच यह सवाल सबसे बड़ा है कि क्या यह आंदोलन किसी बड़े बदलाव की शुरुआत है या फिर सरकार की कठोर कार्रवाई इसे दबा देगी।