वाशिंगटन,15 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय अस्थिरता तक सीमित नहीं रहा,बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी ताजा टिप्पणी में वैश्विक आर्थिक वृद्धि के अनुमान को घटा दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है,जब दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले से ही व्यापार तनाव और टैरिफ से जुड़े झटकों से उबरने की कोशिश कर रही थी।
आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गौरींचस ने एक समूह साक्षात्कार के दौरान बताया कि वर्ष 2026 के लिए वैश्विक आर्थिक वृद्धि का अनुमान पहले 3.4 प्रतिशत रखा गया था,जिसे अब घटाकर लगभग 3.1 प्रतिशत कर दिया गया है। यह गिरावट भले ही आँकड़ों में मामूली लगे,लेकिन वैश्विक स्तर पर इसका असर काफी व्यापक हो सकता है, क्योंकि यह संकेत देता है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था की रफ्तार उम्मीद से धीमी पड़ रही है।
गौरींचस ने स्पष्ट किया कि यह गिरावट ऐसे समय में आई है,जब वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे स्थिरता की ओर बढ़ रही थी। हाल के वर्षों में व्यापारिक तनाव और टैरिफ नीतियों ने वैश्विक व्यापार को प्रभावित किया था,लेकिन धीरे-धीरे स्थितियाँ सुधर रही थीं। वित्तीय स्थितियाँ बेहतर हो रही थीं और तकनीकी क्षेत्र,खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस,में बढ़ते निवेश ने आर्थिक गतिविधियों को नई ऊर्जा दी थी। इसके साथ ही निजी क्षेत्र ने भी आपूर्ति श्रृंखलाओं को नए तरीकों से पुनर्गठित कर व्यापारिक बाधाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
हालाँकि,मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने इस सकारात्मक रुझान को झटका दिया है। इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है,जिससे तेल और गैस की कीमतों में अस्थिरता देखने को मिल रही है। चूँकि,वैश्विक अर्थव्यवस्था काफी हद तक ऊर्जा बाजार पर निर्भर करती है,इसलिए यहाँ किसी भी तरह की अनिश्चितता का सीधा असर उत्पादन लागत,महँगाई और आर्थिक विकास पर पड़ता है।
आईएमएफ के अनुसार,पहले टैरिफ और व्यापार नीति से जुड़ी अनिश्चितता ने वैश्विक वृद्धि को 0.5 से 0.6 प्रतिशत तक प्रभावित किया था,लेकिन समय के साथ इसका असर कम होने लगा था और उम्मीद की जा रही थी कि आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। इसी बीच मध्य पूर्व संकट ने एक नई चुनौती खड़ी कर दी,जिसने इस सुधार की प्रक्रिया को धीमा कर दिया।
गौरींचस ने कहा कि इस संकट का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि यह कितने समय तक चलता है और ऊर्जा बाजार पर इसका कितना प्रभाव पड़ता है। अगर संघर्ष सीमित समय तक रहता है और तेल व गैस की आपूर्ति जल्दी सामान्य हो जाती है,तो इसका असर मुख्य रूप से इसी साल तक सीमित रह सकता है,लेकिन अगर स्थिति और बिगड़ती है और ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊँची बनी रहती हैं,तो इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक देखा जा सकता है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर इस संकट के कारण वैश्विक वित्तीय स्थितियाँ कड़ी हो जाती हैं,तो इसका असर एक या दो साल से भी अधिक समय तक रह सकता है। ऐसे में निवेश में कमी,कर्ज की लागत में वृद्धि और उपभोक्ता खर्च में गिरावट जैसी समस्याएँ सामने आ सकती हैं,जो आर्थिक विकास को और धीमा कर सकती हैं।
आईएमएफ ने विशेष रूप से कमजोर और विकासशील देशों को लेकर चिंता जताई है। संस्था का कहना है कि बढ़ती ऊर्जा कीमतों के साथ-साथ खाद्य पदार्थों की कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है,जिससे इन देशों में खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। पहले से ही आर्थिक दबाव झेल रहे देशों के लिए यह स्थिति और कठिन हो सकती है, क्योंकि उन्हें महँगाई और वित्तीय अस्थिरता दोनों का सामना करना पड़ेगा।
इस साल की शुरुआत में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। व्यापारिक तनाव में कमी और तकनीकी निवेश में वृद्धि से आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की संभावना थी,लेकिन मध्य पूर्व संकट ने इन उम्मीदों को झटका दिया है और अब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का माहौल बन गया है।
ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता का असर सीधे तौर पर महँगाई पर पड़ रहा है। जब तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो परिवहन और उत्पादन लागत में इजाफा होता है,जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है। इससे महँगाई बढ़ती है और लोगों की क्रय शक्ति कम होती है,जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर तकनीकी प्रगति और निजी क्षेत्र की मजबूती सकारात्मक संकेत दे रही है,वहीं दूसरी ओर भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा संकट बड़ी चुनौतियाँ बनकर सामने आ रहे हैं। ऐसे में नीति निर्माताओं के लिए संतुलन बनाना बेहद जरूरी हो गया है।
आईएमएफ की यह चेतावनी बताती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी कई जोखिमों से घिरी हुई है। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक क्षेत्र में पैदा हुई अस्थिरता का असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक समुदाय इस चुनौती से कैसे निपटता है और क्या कूटनीतिक प्रयासों के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
