तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन

परिसीमन प्रस्ताव पर सियासी संग्राम: दक्षिणी राज्यों की चिंता, केंद्र की योजना पर बढ़ा विवाद

चेन्नई,15 अप्रैल (युआईटीवी)- देश की राजनीति में एक बार फिर परिसीमन का मुद्दा केंद्र में आ गया है और इस पर सियासी घमासान तेज होता जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए परिसीमन अभ्यास को लेकर दक्षिण भारत के कई राज्यों ने खुलकर विरोध जताया है। खासकर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने इस मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद करते हुए इसे संघीय ढाँचे के लिए खतरा बताया है। पार्टी का कहना है कि जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण से उन राज्यों के साथ अन्याय होगा,जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है।

दरअसल,परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के अनुपात में संसदीय सीटों का पुनर्निर्धारण करना होता है, ताकि हर क्षेत्र को समान प्रतिनिधित्व मिल सके। वर्तमान में लोकसभा में 543 सदस्य हैं,जिनका निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया था। उस समय देश की जनसंख्या लगभग 55 करोड़ थी। अब जब भारत की आबादी 1.4 अरब से अधिक हो चुकी है,तो केंद्र सरकार नई परिसीमन प्रक्रिया के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने की योजना बना रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक,प्रस्तावित परिसीमन संशोधन विधेयक के तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 850 तक की जा सकती है। वहीं केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व भी 20 से बढ़ाकर 35 करने की योजना है। इस विधेयक को संसद के आगामी विशेष सत्र में पेश किए जाने की संभावना जताई जा रही है। हालाँकि,इस प्रस्ताव ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु,केरल,आंध्र प्रदेश और कर्नाटक इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उन राज्यों को नुकसान पहुँचाएगा,जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है। इन राज्यों को आशंका है कि इससे उत्तर भारत के बड़े राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश,को असमान रूप से अधिक लाभ मिलेगा,जहाँ जनसंख्या वृद्धि दर अपेक्षाकृत अधिक रही है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि यह कदम राज्य के हितों के खिलाफ है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार इस योजना को आगे बढ़ाती है,तो उनकी पार्टी बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू करेगी। स्टालिन ने कहा कि इससे संसद में तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है और यह संघीय ढाँचे को कमजोर करेगा। उनका यह बयान दर्शाता है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है।

वहीं दूसरी ओर,विपक्ष के कुछ नेता इस मुद्दे को लेकर अलग राय रखते हैं। एडप्पाडी के. पलानीस्वामी ने कहा है कि परिसीमन से तमिलनाडु को कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस प्रक्रिया को लेकर अनावश्यक भय फैलाया जा रहा है। उनके अनुसार,परिसीमन के बाद तमिलनाडु की सीटों की संख्या बढ़कर लगभग 50 हो सकती है,जो वर्तमान 39 सीटों से अधिक है।

हालाँकि,इस पूरे विवाद का केंद्र बिंदु सीटों के अनुपात में होने वाला संभावित बदलाव है। अनुमान है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर करीब 143 तक हो सकती हैं। इससे संसद में शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आ सकता है,जो राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है। दक्षिणी राज्यों को इसी बदलाव से सबसे ज्यादा चिंता है,क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक प्रभावशीलता कम हो सकती है।

विवाद को और बढ़ाने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार 2026 के बाद होने वाली अगली जनगणना का इंतजार किए बिना ही परिसीमन करने पर विचार कर रही है। खबरों के अनुसार,सरकार 2011 की जनगणना या उससे पहले के आँकड़ों के आधार पर परिसीमन लागू कर सकती है। यह कदम कई राज्यों को अस्वीकार्य लग रहा है,क्योंकि उनका मानना है कि इससे सही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं हो पाएगा।

इस बीच,केंद्र सरकार की योजना केवल परिसीमन तक सीमित नहीं है। सरकार संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक भी पेश करने की तैयारी में है,जिसके तहत 2029 के आम चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव है। यदि यह विधेयक पारित होता है,तो भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन का मुद्दा केवल सीटों के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं है,बल्कि यह देश के संघीय ढांचे और क्षेत्रीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। एक ओर केंद्र सरकार का तर्क है कि बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व बढ़ाना जरूरी है,वहीं दूसरी ओर राज्यों की चिंता है कि इससे उनके अधिकार और प्रभाव में कमी आ सकती है।

परिसीमन प्रस्ताव ने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में संसद के विशेष सत्र में इस विधेयक पर चर्चा और बहस के दौरान यह मुद्दा और गरमाने की संभावना है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र और राज्यों के बीच इस मुद्दे पर किस तरह का संतुलन बनता है और क्या कोई ऐसा समाधान निकलता है,जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो सके।