वॉशिंगटन,13 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वह वर्ष 2026 के मध्यावधि चुनावों से पहले मतदाता पहचान और नागरिकता सत्यापन को अनिवार्य बनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आपातकाल घोषित करने की संभावना पर विचार कर सकते हैं। ट्रंप के इस बयान के बाद अमेरिका में चुनावी प्रक्रिया,मतदाता अधिकारों और राष्ट्रपति की संघीय शक्तियों को लेकर नई राजनीतिक और कानूनी बहस शुरू हो गई है। हालाँकि,राष्ट्रपति ने आपातकाल घोषित करने की कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं जताई है,लेकिन उनके बयान से इस संभावना को लेकर चर्चा जरूर तेज हो गई है कि यदि कांग्रेस चुनाव सुधार से संबंधित विधेयक पारित नहीं करती है,तो प्रशासन दूसरे रास्तों पर विचार कर सकता है।
ट्रंप ने यह टिप्पणी ‘रियल अमेरिकाज वॉयस’ को दिए एक इंटरव्यू के दौरान की। इंटरव्यू में उनसे चुनावी नियमों में बदलाव और संभावित आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर सवाल किया गया था। ट्रंप से बातचीत करने वाले वेन एलिन रूट ने सुझाव दिया कि यदि सीनेट ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को मंजूरी नहीं देती है,तो राष्ट्रपति को आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए। रूट का कहना था कि इस रास्ते के जरिए फोटो पहचान पत्र और अमेरिकी नागरिकता का प्रमाण अनिवार्य किया जा सकता है तथा डाक के जरिए मतदान यानी मेल-इन बैलेट पर भी कुछ सीमाएँ लगाई जा सकती हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने इस सुझाव का सीधे तौर पर समर्थन नहीं किया,लेकिन उन्होंने ऐसा भी नहीं कहा कि वह इस विकल्प को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करने पर विचार करेंगे, तो उन्होंने कहा कि अतीत में इससे भी ज्यादा असामान्य चीजें हो चुकी हैं और फिलहाल वह इससे अधिक कुछ नहीं कहेंगे। ट्रंप की इस प्रतिक्रिया को इस संभावना के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि यदि कांग्रेस में उनकी पसंद का चुनाव संबंधी कानून आगे नहीं बढ़ता है,तो उनका प्रशासन अन्य संवैधानिक या कानूनी विकल्प तलाश सकता है।
ट्रंप ने मध्यावधि चुनावों से पहले चुनावी नियमों में बदलाव की जरूरत पर जोर देते हुए सीनेट से ‘सेव अमेरिका एक्ट’ पर कार्रवाई करने की अपील की। उन्होंने कहा कि सीनेट को इस विधेयक पर आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि लोग इसकी उम्मीद कर रहे हैं और यह जरूरी भी है। ट्रंप ने विशेष रूप से मतदाता पहचान और नागरिकता के प्रमाण की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना है कि चुनाव में मतदान करने वाले लोगों की पहचान और नागरिकता को लेकर स्पष्ट सत्यापन होना चाहिए।
राष्ट्रपति ने कहा कि वह चाहते हैं कि मतदान की प्रक्रिया में नागरिकता का प्रमाण मौजूद हो और मतदाता पहचान पत्र की व्यवस्था भी हो। ट्रंप लंबे समय से अमेरिकी चुनावों में मतदाता पहचान और चुनावी सुरक्षा को लेकर सख्त नियमों के समर्थक रहे हैं। उनके समर्थकों का तर्क है कि मतदान से पहले मतदाता की पहचान और नागरिकता की पुष्टि करने से चुनावी प्रक्रिया में लोगों का विश्वास मजबूत हो सकता है।
हालांकि इस मुद्दे को लेकर अमेरिका में राजनीतिक मतभेद काफी गहरे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के नेता और चुनावी सुरक्षा के समर्थक इन प्रस्तावों को चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि चुनाव में केवल पात्र नागरिकों को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए और मतदाता पहचान की अनिवार्यता से प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है। दूसरी ओर,डेमोक्रेटिक पार्टी और कई नागरिक अधिकार समूहों की चिंता है कि अत्यधिक दस्तावेजी आवश्यकताएँ ऐसे योग्य नागरिकों के लिए मतदान या मतदाता पंजीकरण मुश्किल बना सकती हैं,जिनके पास आवश्यक पहचान पत्र या नागरिकता संबंधी दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
ट्रंप ने कुछ रिपब्लिकन सीनेटरों पर भी इन चुनावी उपायों का विरोध करने का आरोप लगाया। उन्होंने प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष माइक जॉनसन की प्रशंसा करते हुए दावा किया कि प्रतिनिधि सभा ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पाँच बार मंजूरी दे चुकी है,लेकिन विधेयक हर बार सीनेट में जाकर अटक जाता है। ट्रंप के मुताबिक यह स्थिति बदलनी चाहिए और सीनेट को इस विधेयक पर आगे बढ़ना चाहिए।
राष्ट्रपति ने इस दौरान डाक के जरिए मतदान की व्यवस्था की भी आलोचना की। उन्होंने मेल-इन बैलेट को भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील बताते हुए कैलिफोर्निया की चुनावी व्यवस्था पर विशेष निशाना साधा। ट्रंप ने बिना कोई ठोस सबूत पेश किए दावा किया कि कैलिफोर्निया चुनावों के मामले में सबसे भ्रष्ट स्थानों में से एक है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ क्षेत्रों में रिपब्लिकन मतदाताओं को डाक के जरिए मतपत्र प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
अमेरिका में मेल-इन वोटिंग को लेकर पहले से ही राजनीतिक बहस होती रही है। कोरोना महामारी के दौरान इस व्यवस्था का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर हुआ था और उसके बाद से रिपब्लिकन तथा डेमोक्रेटिक नेताओं के बीच इसके इस्तेमाल और सुरक्षा को लेकर मतभेद बने हुए हैं। रिपब्लिकन नेताओं का एक वर्ग इसके दुरुपयोग की आशंका जताता रहा है, जबकि इसके समर्थकों का कहना है कि डाक के जरिए मतदान उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण सुविधा है,जो किसी कारण से मतदान केंद्र तक नहीं पहुँच सकते।
इंटरव्यू के दौरान वेन एलिन रूट ने ट्रंप के सामने यह संभावना भी रखी कि चुनाव संबंधी विधेयक को सीनेट से आवश्यक समर्थन नहीं मिल सकता। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस किसी तरह कानून पारित भी कर देती है,तो उसके तुरंत कानूनी चुनौती का सामना करने की संभावना है। इसके बाद उन्होंने ट्रंप से आग्रह किया कि वह अगले एक महीने के भीतर राष्ट्रीय सुरक्षा आपातकाल घोषित करें। रूट का दावा था कि ऐसा करने से प्रशासन कांग्रेस की मंजूरी का इंतजार किए बिना फोटो पहचान पत्र,नागरिकता प्रमाण और मेल-इन मतदान से संबंधित कुछ नियम लागू कर सकेगा।
ट्रंप ने इस सुझाव पर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की। उनकी प्रतिक्रिया ने केवल इस संभावना को खुला रखा कि भविष्य में प्रशासन आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल पर विचार कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कांग्रेस चुनाव संबंधी कानून पारित कर देती है तो उसे अदालत में चुनौती देना अधिक मुश्किल होगा। इससे संकेत मिलता है कि ट्रंप फिलहाल कांग्रेस के रास्ते से चुनावी नियमों में बदलाव को प्राथमिकता दे रहे हैं,लेकिन यदि यह प्रयास विफल रहता है तो अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है।
चुनावी नियमों को लेकर यह बहस अमेरिकी संघीय व्यवस्था की जटिलता से भी जुड़ी है। अमेरिका में चुनाव मुख्य रूप से राज्य और स्थानीय प्रशासन द्वारा संचालित किए जाते हैं। हालांकि ये चुनाव अमेरिकी संविधान और संघीय कानूनों द्वारा निर्धारित व्यापक ढाँचे के तहत होते हैं, लेकिन मतदाता पंजीकरण, मतदान की प्रक्रिया और चुनाव संचालन से जुड़े कई महत्वपूर्ण नियम राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। ऐसे में संघीय सरकार द्वारा एक समान राष्ट्रीय नियम लागू करने की कोशिश संवैधानिक और कानूनी सवाल खड़े कर सकती है।
अमेरिकी संघीय कानून पहले से ही गैर-नागरिकों को संघीय चुनावों में मतदान करने से रोकता है। इसलिए नागरिकता प्रमाण को अनिवार्य करने के समर्थक यह तर्क देते हैं कि उनका उद्देश्य मौजूदा प्रतिबंध को लागू करने के लिए सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत करना है। उनका कहना है कि मतदाता सूची में केवल योग्य नागरिकों को शामिल करने से चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता बढ़ाई जा सकती है।
लेकिन विरोधियों का सवाल है कि नागरिकता का प्रमाण किस तरह माँगा जाएगा और किन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाएगा। उनका तर्क है कि अमेरिका में सभी योग्य नागरिकों के पास जन्म प्रमाणपत्र,पासपोर्ट या अन्य दस्तावेज समान रूप से उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में यदि पंजीकरण के समय दस्तावेजी प्रमाण अनिवार्य कर दिया जाता है,तो कुछ योग्य नागरिकों को प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। नागरिक अधिकार समूहों को आशंका है कि इसका असर खास तौर पर कम आय वाले,बुजुर्ग, ग्रामीण इलाकों में रहने वाले और उन लोगों पर पड़ सकता है,जिनके पास जरूरी दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
‘सेव अमेरिका एक्ट’ इसी व्यापक राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा है। इसके समर्थक इसे चुनावी सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम बताते हैं,जबकि विरोधियों का कहना है कि इसके प्रावधान मतदाता पंजीकरण और मतदान को अनावश्यक रूप से कठिन बना सकते हैं। ट्रंप इस कानून को लेकर लगातार सीनेट पर दबाव डाल रहे हैं। अब राष्ट्रीय सुरक्षा आपातकाल की संभावित चर्चा ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है।
राष्ट्रपति के लिए आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल अमेरिकी राजनीति में हमेशा संवेदनशील विषय रहा है। राष्ट्रीय आपातकाल आम तौर पर ऐसे हालात में इस्तेमाल किया जाता है जब सरकार किसी गंभीर खतरे या असाधारण परिस्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त अधिकारों की जरूरत महसूस करती है। यदि चुनावी नियमों को लागू करने के लिए ऐसी शक्ति का इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है,तो इससे संघीय सरकार और राज्यों के अधिकार क्षेत्र के बीच टकराव की संभावना पैदा हो सकती है। साथ ही अदालतों में भी इस तरह के कदम को चुनौती दिए जाने की संभावना रहेगी।
ट्रंप के ताजा बयान ने इसीलिए केवल चुनावी नियमों की बहस को ही नहीं,बल्कि राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि प्रशासन वास्तव में आपातकाल घोषित करने की दिशा में आगे बढ़ता है,तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी कथित समस्या किस प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा आपातकाल के दायरे में आती है। इस कदम की कानूनी वैधता और संघीय सरकार के अधिकारों को लेकर भी अदालतों में बहस संभव है।
मध्यावधि चुनाव अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इन चुनावों के जरिए प्रतिनिधि सभा और सीनेट की कई सीटों के लिए मतदान होता है और इनके नतीजे राष्ट्रपति के बचे हुए कार्यकाल में सरकार की राजनीतिक क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में चुनावी नियमों में बदलाव को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच संघर्ष का राजनीतिक महत्व भी काफी अधिक है।
ट्रंप के लिए चुनावी सुरक्षा और मतदाता पहचान का मुद्दा उनके व्यापक राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा रहा है। वहीं उनके विरोधियों के लिए यह सवाल मतदाता अधिकारों और चुनाव में अधिकतम भागीदारी से जुड़ा है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ इस मुद्दे को जनता के सामने रख रहे हैं। अब इस बहस में राष्ट्रीय सुरक्षा आपातकाल का विकल्प जुड़ने से मामला और संवेदनशील हो गया है।
फिलहाल ट्रंप ने आपातकाल घोषित करने का कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है। उन्होंने केवल इतना संकेत दिया है कि यदि परिस्थितियाँ असामान्य हुईं,तो ऐसे विकल्प पर विचार किया जा सकता है। साथ ही वह सीनेट से ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पारित करने का आग्रह कर रहे हैं। इसलिए आने वाले दिनों में अमेरिकी कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। यदि विधेयक पर सीनेट में सहमति बनती है,तो चुनावी नियमों में बदलाव का रास्ता विधायी प्रक्रिया से आगे बढ़ सकता है,लेकिन यदि यह प्रयास विफल रहता है,तो राष्ट्रपति की ओर से आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल की संभावना पर राजनीतिक और कानूनी बहस और तेज हो सकती है।
इस पूरे विवाद का केंद्र एक बुनियादी सवाल बन गया है कि अमेरिका चुनावी सुरक्षा मजबूत करने और मतदाता अधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन कैसे कायम करेगा। ट्रंप प्रशासन जहाँ नागरिकता सत्यापन और मतदाता पहचान को चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए जरूरी मानता है,वहीं विरोधी पक्ष को आशंका है कि कठोर दस्तावेजी नियम से योग्य मतदाताओं के लिए मतदान की राह कठिन हो सकती है। मध्यावधि चुनाव से पहले यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति में एक बड़े विवाद का रूप लेता दिखाई दे रहा है और आने वाले महीनों में कांग्रेस,राज्यों तथा अदालतों में इसकी दिशा तय होने की संभावना है।
