अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@ShpoolNews)

नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर ट्रंप का फिर दावा,बोले- मैंने आठ युद्ध खत्म कराए, सम्मान मिलना चाहिए

वाशिंगटन,8 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर चर्चा में हैं। वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा से ठीक पहले ट्रंप ने अपने लिए इस प्रतिष्ठित सम्मान का दावा दोहराया है। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि इस बार नोबेल शांति पुरस्कार उन्हें मिलना चाहिए। हालाँकि,ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि अंतिम फैसला उनके हाथ में नहीं है और पुरस्कार विजेता का चयन नॉर्वे की स्वतंत्र नोबेल समिति ही करेगी। वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा 9 अक्टूबर को ओस्लो में होनी है।

ट्रंप ने अपने दावे के समर्थन में विदेश नीति और कूटनीतिक प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सत्ता में लौटने के बाद उनकी सरकार ने कई अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों को समाप्त कराने या उन्हें रोकने की दिशा में काम किया है। ट्रंप का दावा है कि उन्होंने आठ युद्धों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने प्रयासों को अमेरिकी राष्ट्रपतियों के इतिहास में असाधारण बताते हुए कहा कि इससे पहले शायद ही किसी राष्ट्रपति ने इतने संघर्षों को खत्म कराने की कोशिश की हो।

ट्रंप ने पत्रकारों के सामने अपने पुराने दावे को दोहराते हुए कहा कि उन्होंने ऐसे काम किए हैं, जो उनसे पहले किसी राष्ट्रपति ने नहीं किए। उनका कहना था कि वह अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं कर रहे,बल्कि केवल तथ्यों का उल्लेख कर रहे हैं। उनके मुताबिक,अलग-अलग संघर्षों में अमेरिका ने बातचीत,कूटनीतिक दबाव,आर्थिक कदम और अन्य माध्यमों का इस्तेमाल करके तनाव कम करने की कोशिश की है। ट्रंप ने इसी रिकॉर्ड को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए अपनी योग्यता का आधार बताया।

हालाँकि,ट्रंप के इन दावों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग मत सामने आते रहे हैं। जिन संघर्षों को अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कूटनीतिक प्रयासों की उपलब्धि बताते हैं, उनमें से कुछ में उनकी भूमिका को संबंधित पक्ष उतना निर्णायक नहीं मानते। कुछ मामलों में संघर्ष पूरी तरह समाप्त होने के बजाय अस्थायी रूप से शांत हुआ है या बाद में दोबारा तनाव की स्थिति बनी है। इसलिए ट्रंप द्वारा बताए गए आठ संघर्षों को लेकर यह सवाल भी उठता रहा है कि उनमें अमेरिकी प्रशासन की वास्तविक भूमिका कितनी थी और किन परिस्थितियों में समझौते या युद्धविराम संभव हुआ।

भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुए सैन्य टकराव का उदाहरण भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। ट्रंप ने कई मौकों पर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम कराने में अमेरिकी भूमिका का दावा किया है, लेकिन भारत ने उनके इस दावे को स्वीकार नहीं किया। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि दोनों देशों के बीच सैन्य गतिविधियाँ रोकने को लेकर फैसला सीधे दोनों देशों के बीच बातचीत और सैन्य स्तर पर हुआ था। ऐसे में यह मुद्दा ट्रंप के उस व्यापक दावे पर भी सवाल खड़ा करता है,जिसमें वह कई संघर्षों को सुलझाने का श्रेय अपने प्रशासन को देते हैं।

नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर ट्रंप की उम्मीदें नई नहीं हैं। पिछले वर्ष भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस सम्मान को लेकर अपनी इच्छा जाहिर की थी। पुरस्कार उन्हें नहीं मिला तो उन्होंने इस फैसले पर नाराजगी व्यक्त की थी। इसके बाद भी ट्रंप लगातार यह कहते रहे हैं कि उनके कूटनीतिक प्रयासों को नोबेल समिति को मान्यता देनी चाहिए। इस वर्ष पुरस्कार की घोषणा का समय नजदीक आते ही उन्होंने एक बार फिर इस मुद्दे को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिया है।

इस बार हालाँकि ट्रंप ने अपने बयान में यह भी माना कि उनके पुरस्कार जीतने की कोई गारंटी नहीं है। उन्होंने नॉर्वे की नोबेल समिति के फैसले को लेकर अनिश्चितता जताई और कहा कि समिति शायद उनके जैसे व्यक्ति को यह सम्मान नहीं दे। उनके इस बयान से यह भी संकेत मिलता है कि वह पुरस्कार के लिए अपनी दावेदारी को लेकर आश्वस्त होने के साथ-साथ समिति के संभावित फैसले को लेकर संशय में भी हैं। नोबेल शांति पुरस्कार का फैसला नॉर्वे की स्वतंत्र समिति करती है और अमेरिकी सरकार या किसी अन्य देश की सरकार का इस चयन में प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता।

नोबेल शांति पुरस्कार के चयन की प्रक्रिया भी काफी गोपनीय रहती है। इस वर्ष पुरस्कार के लिए 287 उम्मीदवारों के नामांकन हुए हैं,लेकिन आधिकारिक रूप से यह नहीं बताया जाता कि अंतिम सूची में कौन-कौन शामिल है। नोबेल संस्था के नियमों के अनुसार नामांकन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक रूप से लंबे समय तक गोपनीय रखी जाती है। इसलिए किसी व्यक्ति के नामांकन को लेकर सामने आने वाले दावों की आधिकारिक पुष्टि तत्काल नहीं की जाती।

ट्रंप ने अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी चर्चा में ला दिया। उन्होंने वर्ष 2009 में ओबामा को दिए गए नोबेल शांति पुरस्कार पर सवाल उठाया। ट्रंप का तर्क था कि ओबामा को राष्ट्रपति बनने के शुरुआती दौर में ही यह सम्मान दिया गया था और उस समय उनकी ओर से कोई ऐसी बड़ी उपलब्धि सामने नहीं आई थी, जिसके आधार पर पुरस्कार दिया जाता। ट्रंप ने इसी तुलना के जरिए यह बताने की कोशिश की कि उनके अपने कार्यकाल में किए गए कूटनीतिक प्रयासों को भी पुरस्कार के लिए पर्याप्त आधार माना जाना चाहिए।

बराक ओबामा को 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति और लोगों के बीच सहयोग को मजबूत करने के उनके प्रयासों के लिए दिया गया था। ट्रंप का इस फैसले का उल्लेख करना उनके वर्तमान दावे से जुड़ा हुआ है। वह यह सवाल उठाते रहे हैं कि यदि शुरुआती दौर में ओबामा को यह सम्मान दिया जा सकता है,तो उनके द्वारा किए गए कथित शांति प्रयासों को क्यों नहीं मान्यता मिलनी चाहिए।

हालाँकि,ट्रंप की विदेश नीति के सामने अभी भी कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। इनमें रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध सबसे महत्वपूर्ण है। ट्रंप ने सत्ता में लौटने के बाद इस युद्ध को जल्द समाप्त कराने का दावा किया था,लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आया है। युद्ध को समाप्त कराने की कोशिशें उनकी विदेश नीति के सबसे कठिन परीक्षणों में से एक बनी हुई हैं। इसी वजह से ट्रंप द्वारा दुनिया में शांति स्थापित करने के अपने दावे और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर को लेकर भी बहस जारी है।

ईरान से जुड़ा संघर्ष भी ट्रंप की विदेश नीति के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक बातचीत की स्थिति ने पश्चिम एशिया की परिस्थितियों को जटिल बनाया है। ऐसे समय में जब कई क्षेत्रों में संघर्ष जारी हैं,नोबेल समिति के सामने यह तय करने की चुनौती है कि शांति स्थापित करने के लिए किस व्यक्ति या संस्था के प्रयासों को सबसे अधिक महत्व दिया जाए।

ट्रंप के समर्थकों का तर्क है कि उन्होंने पारंपरिक कूटनीतिक तरीकों से अलग हटकर दबाव और बातचीत को एक साथ इस्तेमाल किया है और कई मामलों में इसी रणनीति से समझौते की स्थिति बनी। वहीं,आलोचक यह सवाल उठाते हैं कि किसी संघर्ष में युद्धविराम या अस्थायी शांति को पूरी तरह समाप्त हो चुके युद्ध के बराबर नहीं माना जा सकता। इसी वजह से ट्रंप के आठ युद्ध खत्म कराने वाले दावे पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है।

इस बीच 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा को लेकर दुनिया की नजरें नॉर्वे पर टिकी हैं। पुरस्कार की आधिकारिक घोषणा 9 अक्टूबर को नॉर्वे के नोबेल संस्थान में होगी। समिति के सामने इस वर्ष दुनिया भर से आए 287 नामांकन हैं और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में शांति से जुड़े प्रयासों का महत्व पहले से अधिक बढ़ गया है।

डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह पुरस्कार केवल एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान का विषय नहीं है,बल्कि उनकी विदेश नीति की उपलब्धियों को वैश्विक मान्यता दिलाने का माध्यम भी माना जा सकता है। हालाँकि,अंतिम फैसला पूरी तरह नॉर्वे की नोबेल समिति के हाथ में है। ट्रंप ने खुद भी स्वीकार किया है कि उनकी दावेदारी के बावजूद यह जरूरी नहीं कि पुरस्कार उन्हें ही मिले। अब देखना होगा कि समिति इस वर्ष शांति के लिए किस व्यक्ति या संस्था के योगदान को सबसे महत्वपूर्ण मानती है और क्या ट्रंप का नाम उस अंतिम फैसले में शामिल होता है।