सोल,16 सितंबर (युआईटीवी)- उत्तर कोरिया ने बुधवार को अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वह दक्षिण कोरिया और जापान को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियाँ हासिल करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। उत्तर कोरिया ने इस मुद्दे को अपनी परमाणु क्षमता और सैन्य प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूत करने के पक्ष में भी इस्तेमाल किया है। उसका कहना है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य गतिविधियां और उसके सहयोगी देशों की बढ़ती सैन्य क्षमताएं क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर रही हैं। उत्तर कोरिया की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है,जब दक्षिण कोरिया और जापान की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों को लेकर चर्चा तेज हुई है।
उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी केसीएनए में प्रकाशित एक टिप्पणी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक विश्लेषक ने अमेरिका की नीति पर निशाना साधा। विश्लेषक ने आरोप लगाया कि वॉशिंगटन दक्षिण कोरिया और जापान को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां हासिल करने के लिए उकसा रहा है। उन्होंने अमेरिका को दुनिया में परमाणु प्रसार का प्रमुख सूत्रधार बताया और दावा किया कि परमाणु तकनीक के सैन्य इस्तेमाल से जुड़ी उसकी नीतियाँ वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा कर रही हैं। ये आरोप उत्तर कोरिया की सरकारी मीडिया में प्रकाशित टिप्पणी के रूप में सामने आए हैं।
उत्तर कोरिया की प्रतिक्रिया एक अमेरिकी नौसेना अधिकारी की हालिया टिप्पणी के बाद आई। अमेरिकी अधिकारी ने हवाई में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के पत्रकारों से बातचीत के दौरान दक्षिण कोरिया और जापान की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों से जुड़ी योजनाओं पर चर्चा की थी। अधिकारी ने कहा था कि दक्षिण कोरिया को ऐसी पनडुब्बियों की जरूरत के पीछे स्पष्ट सैन्य और रणनीतिक उद्देश्य होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन्हें केवल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा या प्रतीकात्मक सैन्य क्षमता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। जापान की ओर से इस दिशा में दिखाई जा रही रुचि के प्रति अमेरिकी अधिकारी का रुख अपेक्षाकृत सकारात्मक बताया गया।
दक्षिण कोरिया लंबे समय से अपनी नौसैनिक क्षमताओं को मजबूत करने पर विचार कर रहा है। इस दिशा में परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों को एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। दक्षिण कोरिया की प्रस्तावित पनडुब्बियाँ परमाणु हथियारों से लैस रणनीतिक पनडुब्बियाँ नहीं,बल्कि परमाणु ऊर्जा से संचालित ऐसी पनडुब्बियाँ होंगी, जिनमें पारंपरिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाएगा। दक्षिण कोरिया के रक्षा संबंधी दस्तावेजों के अनुसार,ऐसी पनडुब्बियों का उद्देश्य लंबे समय तक समुद्र में संचालन, अधिक क्षमता और बेहतर जीवित रहने की क्षमता हासिल करना है।
दक्षिण कोरिया ने अपने परमाणु ऊर्जा से चलने वाले पनडुब्बी कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर की दीर्घकालिक परियोजना के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा क्षमता को मजबूत करना और विशेष रूप से उत्तर कोरिया से जुड़े सुरक्षा खतरों के बीच नौसैनिक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है। दक्षिण कोरिया ने यह भी स्पष्ट किया है कि परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी और परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बी अलग-अलग क्षमताएँ हैं। इसके बावजूद उत्तर कोरिया इस पूरे घटनाक्रम को क्षेत्र में परमाणु सैन्य क्षमता के विस्तार से जोड़कर देख रहा है।
उत्तर कोरिया ने अपने बयान में ऑकस सुरक्षा साझेदारी का भी उल्लेख किया। ऑकस में अमेरिका,ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस साझेदारी की घोषणा वर्ष 2021 में की गई थी और इसके तहत ऑस्ट्रेलिया को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियाँ हासिल करने में मदद देने की व्यवस्था की गई है। अमेरिका और ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया के पनडुब्बी कार्यक्रम में तकनीकी और सुरक्षा सहयोग कर रहे हैं। उत्तर कोरिया का दावा है कि यही व्यवस्था भविष्य में दक्षिण कोरिया और जापान जैसे अन्य अमेरिकी सहयोगी देशों के लिए भी एक मॉडल बन सकती है।
उत्तर कोरियाई विश्लेषक ने इसी आधार पर अमेरिका की कथित ‘ऑकस 2.0’ योजना का जिक्र किया। उनका दावा है कि अमेरिका गैर-परमाणु सहयोगी देशों तक सैन्य इस्तेमाल से जुड़ी परमाणु तकनीक पहुँचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उत्तर कोरिया का कहना है कि यदि ऐसी तकनीक और क्षमताएं एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अधिक देशों तक पहुँचती हैं,तो इससे क्षेत्रीय सैन्य प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। हालाँकि, ‘ऑकस 2.0’ को लेकर उत्तर कोरियाई विश्लेषक का दावा उनकी टिप्पणी का हिस्सा है और इसे अमेरिका की आधिकारिक नीति के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया और जापान की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों से जुड़ी कोशिशों को ‘लापरवाह कदम’ करार दिया। उसके अनुसार, अमेरिका अपने सहयोगी देशों की सैन्य क्षमताओं को बढ़ाकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को मजबूत कर रहा है। उत्तर कोरियाई विश्लेषक ने दावा किया कि इस तरह की गतिविधियाँ वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था को कमजोर कर सकती हैं। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि ऐसी परिस्थितियों में उत्तर कोरिया को अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूत करने की जरूरत है।
उत्तर कोरिया की ओर से अपनी परमाणु क्षमता बढ़ाने को लेकर दिया गया यह तर्क नया नहीं है। प्योंगयांग लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सैन्य गतिविधियों को अपनी हथियार क्षमताओं को विकसित करने के कारणों में शामिल करता रहा है। हाल के दिनों में भी उत्तर कोरिया ने अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग की आलोचना की है। सितंबर में तीनों देशों ने ‘फ्रीडम एज’ सैन्य अभ्यास भी पूरा किया,जिसमें समुद्री सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता समेत कई क्षेत्रों में सहयोग किया गया।
दक्षिण कोरिया, अमेरिका और जापान के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ने के बीच उत्तर कोरिया की यह प्रतिक्रिया क्षेत्रीय तनाव के व्यापक संदर्भ में सामने आई है। हाल में उत्तर कोरिया ने भी मिसाइल और अन्य सैन्य प्रणालियों से जुड़े अभ्यास किए हैं। ऐसे में परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों को लेकर जारी बहस केवल नौसैनिक क्षमता तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि यह कोरियाई प्रायद्वीप और पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा रणनीति से जुड़ा विषय बनती जा रही है।
कुल मिलाकर,परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों को लेकर अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान और उत्तर कोरिया के बीच अलग-अलग रणनीतिक दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। अमेरिका के लिए दक्षिण कोरिया और जापान के साथ सैन्य सहयोग क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है, जबकि उत्तर कोरिया इसे अपने खिलाफ बढ़ती सैन्य क्षमता के रूप में देखता है। वहीं,दक्षिण कोरिया अपनी प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संचालित पनडुब्बियों को पारंपरिक हथियारों के साथ समुद्री सुरक्षा और दीर्घकालिक नौसैनिक क्षमता बढ़ाने के साधन के रूप में प्रस्तुत करता है। ऐसे में आने वाले समय में इस मुद्दे पर होने वाली चर्चाएँ एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और परमाणु अप्रसार से जुड़े सवालों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी।
