संयुक्त राष्ट्र,26 सितंबर (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के भारत पर लगाए गए आरोपों के बाद भारत ने राइट टू रिप्लाई के तहत कड़ा जवाब दिया। संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रथम सचिव पेटल गहलोत ने पाकिस्तान के राजनीतिक और आतंकवाद संबंधी रिकॉर्ड का जिक्र करते हुए शहबाज शरीफ के भाषण को निशाने पर लिया। उन्होंने पाकिस्तान के शासन में सेना की भूमिका, वर्ष 2024 के चुनावों से जुड़े ‘फॉर्म-47’ विवाद,ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में पाए जाने, धार्मिक असहिष्णुता और जम्मू-कश्मीर को लेकर इस्लामाबाद के दावों पर भारत का पक्ष रखा।
शहबाज शरीफ ने अपने संबोधन में कश्मीर और सिंधु जल संधि समेत कई मुद्दों को उठाया था। उन्होंने भारत पर सिंधु नदी के पानी को कथित तौर पर हथियार की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और कश्मीर को पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। इसके जवाब में भारत ने कहा कि पाकिस्तान को दूसरे देशों पर आरोप लगाने से पहले अपने राजनीतिक और सुरक्षा रिकॉर्ड पर भी नजर डालनी चाहिए।
पेटल गहलोत ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और वहाँ की सत्ता व्यवस्था को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि शहबाज शरीफ ऐसी सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसके संदर्भ में भारत पाकिस्तान में सेना की भूमिका का मुद्दा उठाता रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में राजनीतिक नेतृत्व बदलता रहा है,लेकिन सत्ता के वास्तविक प्रभाव को लेकर सेना की भूमिका पर लंबे समय से बहस होती रही है।
भारत ने अपने जवाब में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर का भी उल्लेख किया। गहलोत ने कहा कि शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में मुनीर की कई बार प्रशंसा की,जबकि वह निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था और सेना के प्रभाव को लेकर सवाल उठाए।
गहलोत ने ‘फॉर्म-47’ का जिक्र करते हुए पाकिस्तान के 2024 के आम चुनावों पर उठे विवाद की ओर ध्यान दिलाया। वर्ष 2024 के चुनाव के बाद पाकिस्तान में कई राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों ने कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में परिणामों को लेकर सवाल उठाए थे। शुरुआती परिणामों और बाद में जारी किए गए आधिकारिक परिणामों के बीच कथित अंतर को लेकर विवाद हुआ था। इसी वजह से ‘फॉर्म-47’ शब्द पाकिस्तान की राजनीतिक बहस में काफी चर्चित हुआ। भारत ने इसी संदर्भ को संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया।
भारत की ओर से पाकिस्तान में सेना और निर्वाचित सरकार के बीच शक्ति संतुलन का मुद्दा भी उठाया गया। हालाँकि,पाकिस्तान की ओर से अपनी राजनीतिक व्यवस्था को लेकर अलग-अलग समय पर अपने तर्क रखे जाते रहे हैं। इसलिए दोनों देशों के दावों को उनके संबंधित राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।
भारत ने पाकिस्तान के संविधान में हुए 27वें संशोधन का भी उल्लेख किया। यह संशोधन नवंबर 2025 में पाकिस्तान की संसद से पारित होकर कानून बना था। इसके तहत सैन्य कमान की संरचना में बड़े बदलाव किए गए,जिसमें सेना प्रमुख को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज की भूमिका देना और नौसेना तथा वायुसेना पर भी कमान से जुड़े प्रावधान शामिल थे। संशोधन में पाँच सितारा सैन्य अधिकारियों के लिए आजीवन कानूनी संरक्षण से संबंधित प्रावधान भी किए गए।
भारत ने इन संवैधानिक बदलावों को पाकिस्तान में सत्ता और संस्थागत संतुलन से जोड़कर पेश किया। वहीं,पाकिस्तान सरकार की ओर से 27वें संशोधन को संवैधानिक और प्रशासनिक ढाँचे में बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया गया था। पाकिस्तानी संसद के आधिकारिक विवरण के अनुसार संशोधन में न्यायपालिका और सैन्य कमान से जुड़े कई प्रावधान शामिल किए गए थे।
इसके बाद भारतीय प्रतिनिधि ने पाकिस्तान के आतंकवाद से जुड़े रिकॉर्ड पर जोर दिया। उन्होंने 11 सितंबर 2001 के अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों के मुख्य साजिशकर्ता ओसामा बिन लादेन का उल्लेख किया। लादेन 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी अभियान में मारा गया था। उसका ठिकाना पाकिस्तान सैन्य अकादमी के निकट होने का तथ्य भारत की ओर से पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी दावों पर सवाल उठाने के लिए सामने रखा गया।
गहलोत ने कहा कि आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के बयानों को उसके अपने रिकॉर्ड के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों को पनाह और समर्थन देने के आरोप लगाता रहा है, जबकि पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र में भी दोनों देशों के बीच आतंकवाद को लेकर यह मतभेद लगातार सामने आता रहा है।
धार्मिक असहिष्णुता के मुद्दे पर भी भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ पलटवार किया। शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में भारत में धार्मिक असहिष्णुता का आरोप लगाया था। इसके जवाब में पेटल गहलोत ने पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति और ईशनिंदा कानूनों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता पर भारत को उपदेश देने से पहले अपने यहां की परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए।
पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून लंबे समय से मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय बहस का विषय रहे हैं। इन कानूनों में कुछ अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है। मानवाधिकार संगठनों ने इनके दुरुपयोग और अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इसी पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान के दावों पर सवाल उठाया।
जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत ने एक बार फिर अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट किया। पेटल गहलोत ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। भारत का यह रुख लंबे समय से कायम है और वह पाकिस्तान के कश्मीर संबंधी दावों को स्वीकार नहीं करता। दूसरी ओर, पाकिस्तान कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताते हुए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इसे उठाता रहा है।
राइट टू रिप्लाई में भारत ने हालिया भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव और ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। पेटल गहलोत ने पाकिस्तान की ओर से इस अभियान को लेकर किए गए दावों को खारिज किया। भारत के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद किया गया था। भारत ने उस हमले में 26 लोगों की मौत का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ढाँचे के खिलाफ कार्रवाई की बात कही थी।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी सुरक्षा का अधिकार वह आगे भी इस्तेमाल करेगा। गहलोत ने कहा कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करते समय भारत यह सुनिश्चित करेगा कि आतंकवादियों को भागने या छिपने की जगह न मिले। यह बयान भारत की उस नीति के अनुरूप था जिसमें वह आतंकवादी हमलों के जवाब में सीमा पार स्थित आतंकवादी ढाँचे को निशाना बनाने की बात करता रहा है।
भारत और पाकिस्तान के बीच इस मुद्दे पर दावों में बड़ा अंतर है। भारत ऑपरेशन सिंदूर को आतंकवादी हमले के जवाब में की गई कार्रवाई बताता है,जबकि पाकिस्तान भारत की सैन्य कार्रवाई की अलग व्याख्या करता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी दोनों देशों ने अपने-अपने पक्ष को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने रखने की कोशिश की।
पेटल गहलोत के बयान का एक अहम हिस्सा पाकिस्तान के राजनीतिक ढांचे और सैन्य प्रभाव से जुड़ा रहा। भारत ने ‘फॉर्म-47’ और 27वें संवैधानिक संशोधन को एक साथ रखते हुए पाकिस्तान में निर्वाचित संस्थाओं और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच शक्ति संतुलन पर सवाल उठाया। 27वें संशोधन के बाद पाकिस्तान के सैन्य कमान ढाँचे में महत्वपूर्ण बदलाव हुए और फील्ड मार्शल असीम मुनीर को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज की भूमिका मिली। साथ ही,पाँच सितारा अधिकारियों के लिए आजीवन कानूनी संरक्षण का प्रावधान भी किया गया।
हालाँकि,पाकिस्तान सरकार इन बदलावों को अपने संवैधानिक ढाँचे का हिस्सा बताती है, वहीं मानवाधिकार और नागरिक संस्थाओं से जुड़े कुछ संगठनों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने भी 27वें संशोधन के बाद सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण और जवाबदेही से जुड़े सवाल उठाए थे।
इस तरह संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के भाषण के बाद भारत का जवाब कई स्तरों पर रहा। कश्मीर और सिंधु जल संधि जैसे पारंपरिक मुद्दों के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के राजनीतिक ढाँचे,चुनावी विवाद,आतंकवाद के इतिहास, अल्पसंख्यकों की स्थिति और हालिया संवैधानिक बदलावों को सामने रखा।
संयुक्त राष्ट्र का मंच एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच जारी राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेदों का केंद्र बना। शहबाज शरीफ ने भारत पर आरोप लगाते हुए कश्मीर और पानी को प्रमुख मुद्दा बनाया,जबकि भारत ने जवाब में पाकिस्तान से जुड़े उन मुद्दों को सामने रखा जिन पर वह लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सवाल उठाता रहा है। दोनों देशों के बयानों से यह स्पष्ट है कि कश्मीर, आतंकवाद, जल संसाधन और सैन्य भूमिका जैसे विषय अभी भी भारत-पाकिस्तान संबंधों में प्रमुख विवाद के मुद्दे बने हुए हैं।
