नई दिल्ली,9 सितंबर (युआईटीवी)- अभिनेता और कॉमेडियन राजपाल यादव को चेक बाउंस से जुड़े सात मामलों में चल रही कानूनी लड़ाई के बीच सुप्रीम कोर्ट से मंगलवार को बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने राजपाल यादव और उनकी पत्नी की याचिका पर सुनवाई करने की सहमति जताते हुए उनकी विशेष अनुमति याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। यह याचिका दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई है,जिसमें हाई कोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत चेक बाउंस के सात मामलों में राजपाल यादव और उनकी पत्नी की सजा को बरकरार रखा था। हालाँकि,हाई कोर्ट ने सजा की अवधि और जुर्माने की राशि में कमी की थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पाँच करोड़ रुपये जमा करने की शर्त पर सरेंडर करने से फिलहाल छूट दे दी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत के समक्ष विशेष अनुमति याचिका का मौखिक रूप से उल्लेख किए जाने के बाद पीठ ने इसे सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया और सशर्त नोटिस जारी किया। अदालत ने मामले में जवाब दाखिल करने के लिए 15 सितंबर तक का समय निर्धारित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को सरेंडर करने से तभी छूट मिलेगी,जब वे बुधवार तक शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री में पांच करोड़ रुपये जमा कर देंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा अगले दिन तक अदालत की रजिस्ट्री में पाँच करोड़ रुपये जमा करने की शर्त पर उन्हें सरेंडर करने से छूट दी जाती है। इस आदेश के बाद फिलहाल राजपाल यादव और उनकी पत्नी को तत्काल सरेंडर करने से राहत मिल गई है। हालाँकि,यह राहत अंतिम निर्णय नहीं है और मामले की अगली सुनवाई में अदालत पूरे विवाद तथा याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए कानूनी सवालों पर विचार करेगी।
यह मामला राजपाल यादव द्वारा बनाई जा रही एक फिल्म से जुड़े वित्तीय और अनुबंध संबंधी विवाद से शुरू हुआ था। याचिका में बताया गया है कि फिल्म से संबंधित पक्षों के बीच अलग-अलग समय पर चार समझौते हुए थे। शुरुआती समझौते निर्धारित समयसीमा में पूरे नहीं हो पाए,जिसके बाद पक्षों के बीच आगे के समझौते किए गए। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि चौथे समझौते के दौरान पुराने समझौतों के तहत जारी किए गए सिक्योरिटी चेक वापस किए जाने थे और उनकी जगह नए चेक जारी किए जाने थे।
याचिका के अनुसार,21 अप्रैल 2013 को पक्षों के बीच एक सहमति समझौता हुआ था। इसे चौथा समझौता भी बताया गया है। राजपाल यादव और उनकी पत्नी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि इस सहमति समझौते के तहत पहले के समझौते में जारी किए गए आठ सिक्योरिटी चेक वापस किए जाने थे। इसके बदले 10 करोड़ रुपये की राशि से संबंधित चार नए चेक जारी किए गए थे। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इसके बावजूद प्रतिवादी पक्ष ने पुराने आठ सिक्योरिटी चेक वापस नहीं किए।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि बाद में पुराने आठ में से सात चेक बैंक में प्रस्तुत किए गए और उनके बाउंस होने के बाद उनके आधार पर कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई। राजपाल यादव और उनकी पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया है कि जब पक्षों के बीच बाद में सहमति समझौता हो चुका था और पुराने सिक्योरिटी चेक वापस किए जाने की सहमति बन गई थी,तो उन चेक को बाद में भुगतान के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए था। उनका कहना है कि संबंधित चेक नए समझौते के बाद लागू करने योग्य नहीं रह गए थे।
याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले का भी हवाला दिया है। उन्होंने मेसर्स गिम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मनोज गोयल मामले में शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए कहा है कि पक्षों के बीच बाद में हुआ समझौता मूल शिकायत की कार्यवाही पर प्रभाव डाल सकता है। उनका तर्क है कि जब दोनों पक्षों के बीच बाद में सहमति बनी और पुराने चेक को वापस किए जाने पर सहमति हुई,तो उन्हीं पुराने चेक के आधार पर आगे की आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रहनी चाहिए थी।
राजपाल यादव और उनकी पत्नी की याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि निचली अदालतों और अपीलीय अदालतों ने बाद में हुए सहमति समझौते के प्रभाव पर पर्याप्त विचार नहीं किया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अदालतों को यह देखना चाहिए था कि जिन चेक के आधार पर शिकायतें दर्ज की गईं,वे चौथे समझौते के बाद वैध और लागू करने योग्य थे या नहीं। उनके मुताबिक,बाद में हुए समझौते के कारण पहले जारी किए गए सिक्योरिटी चेक की स्थिति बदल गई थी और इस पहलू को मामले के फैसले में उचित महत्व नहीं दिया गया।
इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने राजपाल यादव और उनकी पत्नी की ओर से दायर रिवीजन याचिकाओं को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई सजा में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था। हालाँकि,अदालत ने सातों मामलों में सजा की अवधि को छह महीने से घटाकर तीन महीने की साधारण कैद कर दिया था। इसके साथ ही प्रत्येक मामले में लगाए गए जुर्माने को भी 1.60 करोड़ रुपये से घटाकर 1.05 करोड़ रुपये कर दिया गया था। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि सातों मामलों में दी गई मुख्य सजाएँ एक साथ चलेंगी।
इस तरह सात मामलों में संशोधित जुर्माने की कुल राशि 7.35 करोड़ रुपये बनती है। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि प्रत्येक मामले में लगाए गए 1.05 करोड़ रुपये के जुर्माने में से 1,04,75,000 रुपये शिकायतकर्ता मेसर्स मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को दिए जाएँ, जबकि 25,000 रुपये राज्य सरकार के खाते में जमा किए जाएँ। अदालत ने मामले में अभिनेता की ओर से शिकायतकर्ता को पहले किए गए भुगतानों को भी ध्यान में रखा था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने सजा में बदलाव करने के साथ-साथ उसे तत्काल लागू करने के बजाय दो महीने के लिए रोक दिया था। इसका उद्देश्य याचिकाकर्ताओं को कानून के तहत उपलब्ध वैधानिक उपायों का लाभ उठाने का अवसर देना था। इसी अवधि के दौरान राजपाल यादव और उनकी पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिका दायर की।
हाई कोर्ट के फैसले में देरी का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा था। अदालत ने कहा था कि राजपाल यादव की ओर से सजा को चुनौती देने में 1,894 दिनों की अत्यधिक देरी हुई। इस लंबी देरी को देखते हुए हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि मामले में पक्षों के बीच समझौते की कोशिशों के लिए कई अवसर और रियायतें दी गई थीं,लेकिन राजपाल यादव अदालत के सामने दिए गए कई वादों को पूरा करने में सफल नहीं रहे।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान राजपाल यादव के रवैये पर भी टिप्पणी की थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई मुकदमेबाज अदालत के सामने किए गए कई वादों को पूरा करने के बजाय जेल जाने का रास्ता चुनता है,तो यह उसकी अपनी पसंद है। अदालत ने यह भी कहा था कि कानून किसी अभिनेता की इच्छा के अनुसार दोबारा लिखी जाने वाली कोई स्क्रिप्ट नहीं है और रणनीति बदलने के साथ कानूनी स्थिति भी नहीं बदल सकती। अदालत ने स्पष्ट किया था कि न्यायिक निर्णय तय कानूनी सिद्धांतों और अदालत के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर किए जाते हैं।
हालाँकि,अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष राजपाल यादव और उनकी पत्नी ने मामले में एक अलग कानूनी आधार पर राहत की माँग की है। उनका मुख्य जोर बाद में हुए सहमति समझौते पर है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब पक्षों के बीच समझौते के तहत पुराने सिक्योरिटी चेक वापस करने पर सहमति बन गई थी,तो पुराने चेक के बाउंस होने के आधार पर शुरू की गई कार्यवाही की वैधता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए था।
मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू शिकायतकर्ता को किए गए भुगतान से जुड़ा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राजपाल यादव द्वारा पहले ही किए गए भुगतानों को ध्यान में रखा था। इसी आधार पर सातों मामलों में जुर्माने की राशि को कम किया गया था। लेकिन अदालत ने मूल सजा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया और तीन महीने की साधारण कैद बरकरार रखी। सातों मामलों की सजा को एक साथ चलाने का आदेश दिए जाने से कुल प्रभावी सजा की अवधि भी उसी के अनुरूप निर्धारित हुई।
अब सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुँचने के बाद कानूनी लड़ाई का अगला चरण शुरू हो गया है। शीर्ष अदालत ने याचिकाओं को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए संबंधित पक्ष से जवाब माँगा है। हालाँकि,पाँच करोड़ रुपये जमा करने की शर्त पर मिली सरेंडर से छूट को फिलहाल अंतरिम राहत के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट आगे यह तय करेगा कि हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप किया जाना चाहिए या नहीं और राजपाल यादव तथा उनकी पत्नी द्वारा बाद में हुए सहमति समझौते को लेकर उठाए गए तर्क कितने स्वीकार्य हैं।
इस पूरे मामले में अब सबसे ज्यादा नजर इस बात पर रहेगी कि सुप्रीम कोर्ट पुराने सिक्योरिटी चेक,बाद में हुए सहमति समझौते और उसके बाद शुरू हुई चेक बाउंस की कार्यवाही को किस कानूनी दृष्टिकोण से देखता है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि पुराने चेक समझौते के बाद प्रभावी नहीं रह गए थे,जबकि निचली अदालतों और हाई कोर्ट के स्तर पर उनकी सजा बरकरार रखी गई है। ऐसे में शीर्ष अदालत की सुनवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि बाद में हुए समझौते का पुराने चेक से जुड़े मामलों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
फिलहाल मंगलवार का सुप्रीम कोर्ट का आदेश राजपाल यादव और उनकी पत्नी के लिए तत्काल राहत लेकर आया है। पाँच करोड़ रुपये अदालत की रजिस्ट्री में जमा करने की शर्त पूरी करने पर उन्हें सरेंडर से छूट मिली है। साथ ही विशेष अनुमति याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार किए जाने से उन्हें अपने पक्ष में उठाए गए कानूनी तर्कों को शीर्ष अदालत के सामने विस्तार से रखने का अवसर मिलेगा। अब 15 सितंबर तक संबंधित पक्ष के जवाब और उसके बाद होने वाली सुनवाई पर इस मामले की आगे की दिशा निर्भर करेगी। सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले तक दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दी गई सजा और उससे जुड़े अन्य आदेशों पर कानूनी स्थिति शीर्ष अदालत की सुनवाई के अधीन रहेगी।
