नई दिल्ली,30 अक्टूबर (युआईटीवी)- बॉलीवुड के दिवंगत सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ अपने रिश्ते को कानूनी रूप से शादी का दर्जा दिलाने की कोशिश कर रहीं अनीता आडवाणी को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। अनीता आडवाणी ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी,जिसमें उनकी अपील स्वीकार नहीं की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया। इसके साथ ही राजेश खन्ना के साथ अपने कथित लंबे समय के संबंध को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए अनीता आडवाणी की ओर से की जा रही कोशिशों को एक और झटका लगा है।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका पर टिप्पणी करते हुए इसे ‘लक्जरी लिटिगेशन’ बताया। अदालत की इस टिप्पणी का आशय यह था कि उसके सामने मामले में आगे हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है। अनीता आडवाणी की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि उनकी मुवक्किल अपने और राजेश खन्ना के बीच रहे रिश्ते के लिए सम्मान और गरिमा चाहती हैं। हालाँकि,दलीलें सुनने के बाद पीठ ने मामले में आगे सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
यह मामला लंबे समय से कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। अनीता आडवाणी का दावा है कि वह राजेश खन्ना के साथ कई वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रही थीं और दोनों के बीच का रिश्ता सामान्य परिचय तक सीमित नहीं था। इसी आधार पर उन्होंने अपने संबंध को शादी के समान कानूनी मान्यता देने और संबंधित राहत उपलब्ध कराने की मांग की थी। हालाँकि,उनके दावों को लेकर अदालतों में चली कानूनी कार्यवाही के दौरान उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी।
राजेश खन्ना हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में गिने जाते थे। अपने अभिनय और लोकप्रियता के कारण उन्होंने फिल्म जगत में खास पहचान बनाई थी। जुलाई 2012 में उनके निधन के बाद उनकी निजी जिंदगी से जुड़े कई मुद्दे चर्चा में आए। इन्हीं में अनीता आडवाणी का दावा भी शामिल था,जिसमें उन्होंने कहा था कि वह अभिनेता के साथ लंबे समय तक एक ही घर में रही थीं।
अनीता आडवाणी के मुताबिक,राजेश खन्ना के जीवन के अंतिम वर्षों में वह मुंबई स्थित उनके बंगले ‘आशीर्वाद’ में उनके साथ रहती थीं। उन्होंने आरोप लगाया था कि अभिनेता के निधन से पहले वर्ष 2012 में उन्हें बंगले से बाहर कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने अपने रिश्ते को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू की और अदालत से अपने अधिकारों की रक्षा करने की माँग की।
इस विवाद में राजेश खन्ना की अलग रह रहीं पत्नी डिंपल कपाड़िया,उनकी बेटी ट्विंकल खन्ना और दामाद अक्षय कुमार के नाम भी सामने आए थे। अनीता आडवाणी ने अपने मामले में राजेश खन्ना के परिवार के कुछ सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। हालाँकि,मामले में लगाए गए आरोप और रिश्ते को लेकर किए गए दावे न्यायिक जाँच के विषय रहे हैं। इन्हें अदालतों के सामने प्रस्तुत तथ्यों और लागू कानून के आधार पर परखा गया।
अनीता आडवाणी की मुख्य माँग यह थी कि उनके और राजेश खन्ना के बीच रहे संबंध को कानूनी रूप से शादी जैसा दर्जा दिया जाए,ताकि उन्हें संबंधित कानूनी अधिकार और राहत मिल सके,लेकिन अदालतों ने उनके दावे को स्वीकार नहीं किया। निचली अदालत से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया। वहाँ भी उनकी अपील खारिज हो गई,जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की।
अनीता आडवाणी ने वर्ष 2013 में घरेलू हिंसा कानून के तहत मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत में उन्होंने डिंपल कपाड़िया और राजेश खन्ना के परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की थी। उनका कहना था कि राजेश खन्ना के साथ अपने संबंध के कारण वह कुछ अधिकारों की हकदार हैं और उन्हें कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।
इस मामले में अनीता आडवाणी ने आर्थिक सहायता के रूप में मासिक गुजारा भत्ता देने की माँग भी की थी। इसके अलावा,उन्होंने मुंबई के बांद्रा इलाके में तीन बेडरूम का फ्लैट उपलब्ध कराने जैसी राहत माँगी थी। उनकी माँगों का उद्देश्य अपने लिए आर्थिक सुरक्षा और रहने की व्यवस्था सुनिश्चित करना था।
हालाँकि,घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत पाने के लिए किसी संबंध का कानूनी स्वरूप महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी मुद्दे पर अदालत में विचार किया गया कि अनीता आडवाणी और राजेश खन्ना के बीच का संबंध कानून के तहत विवाह के समान संबंध की श्रेणी में आता है या नहीं। इस सवाल पर अदालत के निष्कर्ष उनके पक्ष में नहीं रहे।
वर्ष 2015 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनकी शिकायत से संबंधित कार्यवाही रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अनीता आडवाणी और राजेश खन्ना के बीच का संबंध ऐसा नहीं था,जिसे संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत शादी जैसे संबंध के रूप में स्वीकार किया जा सके। अदालत ने यह भी कहा था कि परिवार के ऐसे सदस्यों को कार्यवाही में शामिल नहीं किया जा सकता,जिनके साथ अनीता आडवाणी नहीं रही थीं।
इस फैसले के बाद अनीता आडवाणी के लिए अपने दावे को कानूनी मान्यता दिलाने की राह और कठिन हो गई। इसके बावजूद उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से राहत पाने की कोशिश जारी रखी।
अनीता आडवाणी ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाई। लेकिन वर्ष 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी। उन्हें उम्मीद थी कि शीर्ष अदालत उनके मामले पर विचार करेगी और उनके रिश्ते को लेकर उठाए गए सवालों पर राहत देगी।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अनीता आडवाणी के वकील ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल अपने रिश्ते के लिए सम्मान और गरिमा चाहती हैं। उनकी ओर से अदालत से आग्रह किया गया कि मामले को इसी दृष्टिकोण से देखा जाए। हालाँकि,अदालत ने याचिका में हस्तक्षेप करने का पर्याप्त आधार नहीं पाया।
पीठ ने सुनवाई के दौरान ‘लक्जरी लिटिगेशन’ संबंधी टिप्पणी की और याचिका खारिज कर दी। इस निर्णय के साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अनीता आडवाणी की कोशिश सफल नहीं हो सकी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से उन्हें तत्काल कोई राहत नहीं मिली।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट का याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करना और किसी मामले के प्रत्येक तथ्य पर विस्तृत सुनवाई के बाद अंतिम निष्कर्ष देना अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं। इस मामले में शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी। इसलिए फैसले को उसी न्यायिक संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है।
अनीता आडवाणी और राजेश खन्ना से जुड़ा यह मामला लिव-इन रिलेशनशिप और उससे जुड़े कानूनी अधिकारों पर भी ध्यान आकर्षित करता है। भारत में वयस्कों के बीच सहमति से बने हर संबंध को अपने आप विवाह का दर्जा नहीं मिल जाता। किसी संबंध को घरेलू हिंसा कानून के तहत विवाह की प्रकृति वाला संबंध मानने के लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों को देखना पड़ता है।
ऐसे मामलों में साथ रहने की अवधि, संबंध की प्रकृति, दोनों पक्षों के बीच सामाजिक और पारिवारिक स्थिति तथा उपलब्ध साक्ष्य जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालाँकि,हर मामले का निर्णय उसके विशिष्ट तथ्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाता है। केवल लंबे समय तक साथ रहने का दावा अपने आप किसी संबंध को कानूनी विवाह में परिवर्तित नहीं कर देता।
अनीता आडवाणी का मामला भी इसी तरह के कानूनी सवालों के इर्द-गिर्द रहा। उन्होंने अपने और राजेश खन्ना के बीच रहे संबंध को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए कई वर्षों तक अदालतों का रुख किया,लेकिन निचली अदालत, बॉम्बे हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट से उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली।
राजेश खन्ना के निधन के करीब 14 साल बाद भी उनसे जुड़े इस विवाद का कानूनी पहलू चर्चा में बना हुआ है। अनीता आडवाणी की याचिका खारिज होने से उनके दावे को लेकर चल रही न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। उन्होंने अदालत से अपने रिश्ते को सम्मान और कानूनी पहचान देने की माँग की थी,लेकिन शीर्ष अदालत ने मामले में आगे हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा।
फिलहाल इस फैसले के बाद अनीता आडवाणी को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। उनके और राजेश खन्ना के संबंध को लेकर किए गए दावों पर पहले भी अदालतों में विचार हो चुका है। अब शीर्ष अदालत के ताजा आदेश ने उनकी याचिका पर आगे सुनवाई की उम्मीद को झटका दिया है। यह मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि निजी संबंधों से जुड़े विवादों में भावनात्मक दावों के साथ-साथ कानूनी मानकों और उपलब्ध साक्ष्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
