विज्ञान और तकनीक में अमेरिकी दबदबा बढ़ाने की तैयारी (तस्वीर क्रेडिट@np_nationpress)

विज्ञान और तकनीक में अमेरिकी दबदबा बढ़ाने की तैयारी,ट्रंप प्रशासन ने 6 अरब डॉलर से अधिक की योजनाओं का किया ऐलान

वाशिंगटन,9 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका में वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक तकनीक के विकास को नई गति देने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने कई बड़ी पहलों की घोषणा की है। इन योजनाओं के केंद्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष में परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल और जैव चिकित्सा अनुसंधान जैसे क्षेत्र हैं। सरकार का उद्देश्य केवल नई तकनीकों को विकसित करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक खोजों की प्रक्रिया को तेज करना, अनुसंधान के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना और भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा में अमेरिका की स्थिति मजबूत करना भी है।

इन घोषणाओं को ‘साइंस: ए न्यू गोल्डन एज समिट’ में सामने रखा गया। इसके तहत सरकारी विभागों, प्रौद्योगिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों और परोपकारी संस्थाओं को एक साझा मंच पर लाने की योजना बनाई गई है। घोषित कार्यक्रमों में कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने,अत्याधुनिक प्रयोगशालाएँ तैयार करने, वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित करने और नई पीढ़ी के शोधकर्ताओं को अवसर देने पर जोर दिया गया है।

व्हाइट हाउस की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक,इन पहलों में जेनेसिस मिशन के लिए 11 औद्योगिक साझेदारों की ओर से 2.4 अरब डॉलर के कंप्यूटिंग संसाधन और तकनीकी सहयोग शामिल हैं। इसके अतिरिक्त क्वांटम तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान और जैव चिकित्सा विज्ञान से जुड़े कार्यक्रमों के लिए भी बड़े निवेश की घोषणा की गई है। प्रशासन इन प्रयासों को अमेरिका की वैज्ञानिक क्षमता को अगले स्तर तक पहुँचाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा मान रहा है।

नई घोषणाओं में जेनेसिस मिशन को विशेष महत्व दिया गया है। इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अत्यधिक शक्तिशाली कंप्यूटिंग प्रणालियों की मदद से वैज्ञानिक अनुसंधान को अधिक तेज और प्रभावी बनाना है। पारंपरिक शोध में कई समस्याओं के समाधान के लिए लंबे समय तक प्रयोग करने, बड़ी मात्रा में आंकड़ों का विश्लेषण करने और अलग-अलग संभावनाओं की जाँच करने की जरूरत पड़ती है। उन्नत कंप्यूटिंग और एआई आधारित प्रणालियाँ इनमें से कई प्रक्रियाओं को तेज करने में मदद कर सकती हैं।

इस मिशन के लिए निजी क्षेत्र की कई प्रमुख कंपनियों ने संसाधन उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई है। घोषित योगदान के अनुसार, एनवीडिया एक अरब डॉलर, एएमडी 50 करोड़ डॉलर और ओपनएआई 20 करोड़ डॉलर देने का वादा कर चुके हैं। वहीं,एंथ्रोपिक और गूगल की ओर से 15-15 करोड़ डॉलर के योगदान की घोषणा की गई है। अमेजन वेब सर्विसेज,माइक्रोन और अन्य तकनीकी बुनियादी ढाँचा कंपनियाँ भी इस सहयोग में शामिल हैं।

इस साझेदारी से वैज्ञानिकों को अधिक शक्तिशाली कंप्यूटिंग सुविधाएँ उपलब्ध कराने की योजना है। इन संसाधनों का इस्तेमाल ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवाओं, अंतरिक्ष विज्ञान और अन्य क्षेत्रों की जटिल समस्याओं पर काम करने के लिए किया जा सकेगा। इस पहल से 15 से अधिक संघीय एजेंसियों को सहयोग मिलने की उम्मीद है।

व्हाइट हाउस के विज्ञान सलाहकार माइकल क्रैट्सियोस ने इन घोषणाओं को अमेरिकी वैज्ञानिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार,यह प्रयास दूसरे विश्व युद्ध के बाद संघीय अनुसंधान व्यवस्था को नए सिरे से विकसित करने के दौर जैसी व्यापकता रखता है। उन्होंने कहा कि नए निवेशों के जरिए विज्ञान के क्षेत्र में मौजूद अवसरों को वास्तविक उपलब्धियों में बदलने का प्रयास किया जाएगा।

अमेरिकी प्रशासन ने वैज्ञानिक कंप्यूटिंग सुविधाओं और तकनीकी प्रशिक्षण के विस्तार के लिए लगभग एक अरब डॉलर के निवेश की भी घोषणा की है। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत और जॉर्जिया राज्य की भागीदारी होगी। इसका मकसद अनुसंधान संस्थानों को आधुनिक कंप्यूटिंग संसाधनों से लैस करना और ऐसे विशेषज्ञ तैयार करना है,जो उभरती हुई तकनीकों के विकास में योगदान दे सकें।

योजना के अंतर्गत 10 राज्यों के 14 से अधिक विश्वविद्यालय एक क्षेत्रीय कंप्यूटिंग समूह में शामिल होंगे। इस व्यवस्था से विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं को साझा सुविधाओं और तकनीकी संसाधनों का लाभ मिल सकेगा। इसके अलावा,उत्तर और दक्षिण कैरोलिना के पाँच विश्वविद्यालयों को मिलाकर एक अन्य अनुसंधान कंप्यूटिंग केंद्र विकसित करने की योजना है।

ऐसे केंद्रों की जरूरत इसलिए बढ़ रही है,क्योंकि आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान में विशाल मात्रा में आंकड़ों को संभालना और जटिल गणनाएँ करना महत्वपूर्ण हो गया है। यदि विश्वविद्यालयों को उन्नत कंप्यूटिंग सुविधाएँ मिलती हैं,तो वे अपने स्तर पर अधिक व्यापक शोध कर सकेंगे। साथ ही,अलग-अलग संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ने से ज्ञान और तकनीकी विशेषज्ञता का आदान-प्रदान भी आसान हो सकता है।

राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन और ऊर्जा विभाग ने उन्नत वैज्ञानिक उपकरणों तथा स्वचालित प्रयोगशालाओं के विकास के लिए 10 करोड़ डॉलर से अधिक की सहायता की घोषणा की है। स्वचालित प्रयोगशालाओं में कई प्रक्रियाओं को मशीनों और डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से संचालित किया जा सकता है। इससे प्रयोगों को दोहराना,परिणामों का विश्लेषण करना और संभावित खोजों तक पहुँचने में लगने वाला समय कम करने में मदद मिल सकती है।

क्वांटम कंप्यूटिंग को भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीकों में गिना जाता है। सामान्य कंप्यूटर जिस तरह सूचनाओं को संसाधित करते हैं, उससे अलग सिद्धांतों पर काम करने वाली यह तकनीक कुछ विशेष प्रकार की जटिल समस्याओं को हल करने में नई संभावनाएँ खोल सकती है। हालाँकि,उपयोगी और भरोसेमंद क्वांटम कंप्यूटर विकसित करना अभी भी वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती है।

इसी दिशा में अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने 21.5 करोड़ डॉलर की प्रतियोगिता शुरू करने की घोषणा की है। इसका लक्ष्य ऐसे क्वांटम कंप्यूटरों के विकास को प्रोत्साहित करना है,जो तकनीकी त्रुटियों के बावजूद विश्वसनीय ढंग से काम कर सकें। इन्हें फॉल्ट-टॉलरेंट क्वांटम कंप्यूटर कहा जाता है।

क्वांटम प्रणालियों में होने वाली छोटी-छोटी त्रुटियां गणनाओं के नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए ऐसी तकनीक विकसित करना जरूरी है,जो त्रुटियों का पता लगाने और उनके प्रभाव को नियंत्रित करने में सक्षम हो। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस क्षेत्र में प्रगति से वैज्ञानिक अनुसंधान की कई जटिल समस्याओं पर काम करने के नए रास्ते खुल सकते हैं।

हालाँकि,इस तकनीक की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि शोधकर्ता कितनी विश्वसनीय प्रणालियां विकसित कर पाते हैं और उन्हें व्यावहारिक जरूरतों के अनुरूप कितना बेहतर बनाया जा सकता है।

अंतरिक्ष अनुसंधान में भी परमाणु ऊर्जा आधारित तकनीकों को अहम स्थान दिया गया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और ऊर्जा विभाग ने अंतरिक्ष यान तथा चंद्रमा पर ऊर्जा उपलब्ध कराने वाली प्रणालियों के विकास से जुड़ी योजनाएँ सामने रखी हैं।

इनमें ‘स्पेस रिएक्टर-1’ नामक परियोजना शामिल है, जिसे वर्ष 2028 में प्रस्तावित मंगल मिशन के लिए परमाणु ऊर्जा से संचालित अंतरिक्ष यान के रूप में विकसित करने की योजना है। इसके अलावा ‘लूनर रिएक्टर-1’ के तहत चंद्रमा पर परमाणु विखंडन आधारित ऊर्जा रिएक्टर स्थापित करने की परिकल्पना की गई है।

अंतरिक्ष में ऊर्जा की उपलब्धता लंबे अभियानों के लिए महत्वपूर्ण होती है। सौर ऊर्जा का इस्तेमाल संभव है,लेकिन चंद्रमा के कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक सूर्य का प्रकाश उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में परमाणु ऊर्जा आधारित प्रणाली वैज्ञानिक उपकरणों,संचार व्यवस्था और अन्य जरूरी सुविधाओं को बिजली देने का विकल्प बन सकती है।

मंगल जैसे दूरस्थ ग्रहों तक पहुंचने वाले अभियानों में भी ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है। इसलिए परमाणु ऊर्जा से जुड़े प्रयोग भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। हालाँकि,इन परियोजनाओं की सफलता के लिए तकनीकी विकास, सुरक्षा और संचालन से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना होगा।

स्वास्थ्य और जीवन विज्ञान के क्षेत्र में भी एक बड़ी पहल की घोषणा की गई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों, ऊर्जा विभाग और बायोहब ने मिलकर 1.8 अरब डॉलर का कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई है। इसका उद्देश्य कोशिकाओं और जैविक प्रणालियों के आभासी मॉडल तैयार करना है,ताकि वैज्ञानिक शरीर के भीतर होने वाली जटिल प्रक्रियाओं को अधिक विस्तार से समझ सकें।

मानव शरीर में कोशिकाएँ और विभिन्न जैविक प्रणालियां आपस में जुड़कर काम करती हैं। किसी बीमारी के विकसित होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं,जिनमें आनुवंशिक बदलाव,कोशिकाओं के व्यवहार और बाहरी परिस्थितियों की भूमिका शामिल होती है। इन प्रक्रियाओं को समझने के लिए वैज्ञानिकों को बड़ी मात्रा में जैविक आँकड़ों का अध्ययन करना पड़ता है।

आभासी मॉडल तैयार होने से शोधकर्ता कंप्यूटर आधारित वातावरण में विभिन्न परिस्थितियों का विश्लेषण कर सकेंगे। इससे बीमारी के विकास की प्रक्रिया को समझने, संभावित उपचारों का अध्ययन करने और नए शोध प्रश्न तैयार करने में सहायता मिल सकती है। हालाँकि,ऐसे मॉडल वास्तविक जैविक प्रक्रियाओं का पूरी तरह विकल्प नहीं होंगे। उनके निष्कर्षों की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला और अन्य वैज्ञानिक परीक्षणों की जरूरत बनी रहेगी।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य कंप्यूटिंग तकनीक और जीव विज्ञान के बीच सहयोग बढ़ाना है, ताकि स्वास्थ्य से जुड़ी जटिल समस्याओं पर अधिक प्रभावी ढंग से काम किया जा सके।

अमेरिकी प्रशासन ने जेनेसिस मिशन फेलोशिप के तहत 10 करोड़ डॉलर देने की भी घोषणा की है। इस कार्यक्रम के माध्यम से ऐसे डॉक्टरेट पाठ्यक्रमों को समर्थन दिया जाएगा,जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता को विज्ञान और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ जोड़ा जाएगा।

इस पहल का उद्देश्य ऐसे शोधकर्ताओं को तैयार करना है,जो वैज्ञानिक विषयों की गहरी समझ के साथ आधुनिक कंप्यूटिंग तकनीकों का इस्तेमाल भी कर सकें। इसके अलावा, स्कूली स्तर पर प्रतिभाशाली विद्यार्थियों,अपने करियर की शुरुआत कर रहे शोधकर्ताओं और पारंपरिक अनुसंधान संस्थानों से बाहर काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए भी अवसर बढ़ाने की योजना है।

एक अन्य कार्यक्रम के तहत नए ‘एक्स-लैब्स कंसोर्टियम’ को उद्योग जगत और परोपकारी संस्थाओं से 31 करोड़ डॉलर से अधिक की सहायता मिलने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञों को एक साथ लाकर संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा देना है। ऐसी टीमों में कंप्यूटर विज्ञान,इंजीनियरिंग, जीव विज्ञान और अन्य क्षेत्रों के शोधकर्ता मिलकर जटिल समस्याओं पर काम कर सकते हैं।

व्हाइट हाउस ने इन नई घोषणाओं को पहले किए गए संघीय निवेशों की अगली कड़ी बताया है। इनमें जेनेसिस मिशन को समर्थन देने के लिए पाँच अरब डॉलर की प्रतिबद्धता और स्वतंत्र अनुसंधान प्रयोगशालाओं के लिए राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन की 1.5 अरब डॉलर की पहल भी शामिल है।

इन कार्यक्रमों की व्यापक रणनीति में सरकार, निजी कंपनियों, विश्वविद्यालयों और परोपकारी संस्थाओं की संयुक्त भागीदारी को महत्वपूर्ण माना गया है। प्रशासन चाहता है कि शोध के लिए जरूरी धन, कंप्यूटिंग क्षमता, वैज्ञानिक उपकरण और प्रशिक्षित मानव संसाधन एक-दूसरे के पूरक बनें।

इन घोषणाओं से अमेरिका के वैज्ञानिक अनुसंधान तंत्र को नई सुविधाएँ मिलने की संभावना है। हालाँकि,निवेश की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि इन संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है,परियोजनाओं से कितनी ठोस वैज्ञानिक उपलब्धियाँ सामने आती हैं और विकसित तकनीकों का आम लोगों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर अंतरिक्ष ऊर्जा और जैव चिकित्सा तक फैली ये योजनाएँ दिखाती हैं कि अमेरिकी प्रशासन भविष्य की तकनीकों में अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कई क्षेत्रों में एक साथ काम करना चाहता है। आने वाले वर्षों में इन पहलों की प्रगति यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि घोषित निवेश कितनी तेजी से उपयोगी खोजों,बेहतर अनुसंधान सुविधाओं और नई तकनीकी क्षमताओं में बदल पाते हैं।