सोनिया गांधी

सोनिया गांधी से जुड़े वोटर लिस्ट विवाद मामले में सुनवाई टली,अब 4 जुलाई को होगी अगली सुनवाई

नई दिल्ली,16 मई (युआईटीवी)- राऊज एवेन्यू कोर्ट में सोनिया गांधी के खिलाफ दाखिल रिवीजन पिटीशन पर सुनवाई फिलहाल टल गई है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 4 जुलाई की तारीख तय की है। यह मामला उस आरोप से जुड़ा है,जिसमें दावा किया गया है कि भारतीय नागरिकता हासिल करने से पहले ही सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची में दर्ज था। इस मुद्दे ने एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज कर दी है।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में दोनों पक्षों की ओर से कई महत्वपूर्ण बातें रखी गईं। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने शिकायतकर्ता और प्रतिवादी दोनों पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसी बीच शिकायतकर्ता पक्ष के वकील विकास त्रिपाठी ने चुनाव आयोग से प्राप्त कुछ दस्तावेज अदालत के रिकॉर्ड में शामिल करने की अनुमति माँगी। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया,जिसके बाद मामले से जुड़े कुछ अतिरिक्त दस्तावेज अब न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन गए हैं।

सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से कहा गया कि फिलहाल उनकी माँग सीधे ट्रायल शुरू कराने की नहीं है,बल्कि मामले की पुलिस जाँच कराई जाए। शिकायतकर्ता का तर्क था कि मामले में कई ऐसे तथ्य और सवाल मौजूद हैं,जिनकी निष्पक्ष जाँच बेहद जरूरी है। उनका कहना था कि केवल दस्तावेजों के आधार पर ही नहीं,बल्कि पूरी प्रक्रिया की गहराई से जाँच होनी चाहिए,ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उस समय वोटर सूची में नाम किस आधार पर दर्ज किया गया था।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता हासिल की थी। हालाँकि,शिकायतकर्ता का दावा है कि उनका नाम वर्ष 1980 की नई दिल्ली की मतदाता सूची में पहले से मौजूद था। इसी बिंदु को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता ने अदालत से सवाल किया है कि यदि भारतीय नागरिकता 1983 में प्राप्त की गई थी,तो उससे पहले यानी 1980 में उनका नाम मतदाता सूची में कैसे शामिल हुआ।

याचिका में यह भी आशंका जताई गई है कि उस समय मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए कथित तौर पर किसी गलत या फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल किया गया हो सकता है। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि इस पहलू की गहन जाँच जरूरी है,ताकि तथ्यों की सच्चाई सामने आ सके। हालाँकि,अभी तक अदालत ने इन आरोपों पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है और मामला फिलहाल सुनवाई के चरण में है।

मामले में एक और महत्वपूर्ण दावा वर्ष 1982 की मतदाता सूची को लेकर किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उस समय सोनिया गांधी का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अदालत से सवाल किया कि आखिर नाम हटाने के पीछे क्या कारण था और उस दौरान कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई थी। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि यदि नाम हटाया गया था,तो उससे जुड़े दस्तावेज और प्रशासनिक रिकॉर्ड की जाँच भी आवश्यक है।

इस मामले ने राजनीतिक हलकों में भी चर्चा बढ़ा दी है। हालाँकि,कांग्रेस की ओर से इस मामले पर अभी तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है,लेकिन पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह मामला कानूनी प्रक्रिया के तहत चल रहा है और अदालत के समक्ष तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होगी।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला मुख्य रूप से चुनावी रिकॉर्ड,नागरिकता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जाँच से जुड़ा हुआ है। अदालत फिलहाल इस बात पर विचार कर रही है कि क्या मामले में पुलिस जाँच की जरूरत है या उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

राजनीतिक रूप से यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सोनिया गांधी लंबे समय से भारतीय राजनीति की प्रमुख हस्तियों में शामिल रही हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य होने के कारण इस मामले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी सामने आ रही हैं। विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने मामले की निष्पक्ष जाँच की माँग की है,जबकि कांग्रेस समर्थकों का कहना है कि यह राजनीतिक उद्देश्य से उठाया गया मुद्दा है।

कानूनी जानकारों के अनुसार,अदालत की अगली सुनवाई में यह तय हो सकता है कि शिकायतकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेज और दलीलें पुलिस जाँच के लिए पर्याप्त आधार बनती हैं या नहीं। यदि अदालत को प्रथम दृष्टया मामला जाँच योग्य लगता है,तो आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

इस बीच चुनाव आयोग से जुड़े रिकॉर्ड और दस्तावेजों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि चुनावी रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी कई सवाल खड़े करती है,जबकि दूसरी ओर प्रतिवादी पक्ष अदालत में अपना पक्ष रखेगा।

फिलहाल अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 4 जुलाई को निर्धारित की है। अब सभी की नजरें उस तारीख पर टिकी हैं,जब अदालत आगे की प्रक्रिया को लेकर कोई महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती है। आने वाले दिनों में यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना रह सकता है।