नई दिल्ली,3 जनवरी (युआईटीवी)- हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से सामने आया 19 वर्षीय छात्रा की मौत का मामला अब पूरे प्रदेश ही नहीं,बल्कि देशभर में चिंता और आक्रोश का विषय बन चुका है। जिस कॉलेज में छात्राओं की शिक्षा,सुरक्षा और भविष्य की बात की जाती है,वहीं से एक ऐसी घटना सामने आई जिसने उच्च शिक्षा संस्थानों की व्यवस्था,अनुशासन और जवाबदेही को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप हैं कि कॉलेज में चल रही कथित रैगिंग,लगातार मिल रही मानसिक प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न ने छात्रा को गहरे अवसाद में धकेल दिया। तबीयत बिगड़ने के बाद वह जिंदगी की जंग हार गई और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। जैसे-ही घटना सामने आई,सवालों की लड़ी शुरू हो गई—क्या कॉलेज प्रशासन ने अपना दायित्व निभाया? क्या पुलिस समय पर हरकत में आई? और क्या रैगिंग-विरोधी कानून वास्तव में जमीन पर लागू होते हैं या केवल कागजों में सीमित रह गए हैं?
जानकारी के मुताबिक,मृतक छात्रा धर्मशाला डिग्री कॉलेज से जुड़ी थी और पिछले कुछ समय से गंभीर मानसिक तनाव में थी। परिवार का कहना है कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान चार छात्राओं ने लगातार उसके साथ रैगिंग और दुर्व्यवहार किया। यही नहीं,एक प्रोफेसर पर भी मानसिक और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। परिजनों का दावा है कि छात्रा ने घर पर कई बार अपने दर्द और घुटन का इशारा किया,मगर वह खुलकर कुछ कह नहीं पा रही थी। धीरे-धीरे उसकी हालत बिगड़ती गई और आखिरकार इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया।
मौत के बाद मामला दोबारा सुर्खियों में आया और पुलिस ने जाँच शुरू की। पीड़ित छात्रा के पिता के बयान के आधार पर थाना धर्मशाला में केस दर्ज किया गया। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 75, 115(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया है,जिनमें यौन उत्पीड़न,स्वेच्छा से चोट पहुँचाना और समान आशय जैसी गंभीर धाराएँ शामिल हैं। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन (रैगिंग निषेध) एक्ट 2009 की धारा 3 भी जोड़ी गई है। इस केस में चार छात्राओं और एक कॉलेज प्रोफेसर को आरोपी बनाया गया है,जिससे यह स्पष्ट हो गया कि जाँच अब केवल औपचारिकता नहीं,बल्कि व्यापक स्तर पर आगे बढ़ेगी।
कांगड़ा के एएसपी वीर बहादुर ने बताया कि यह मामला पहले सीएम हेल्पलाइन तक भी पहुँचा था। पुलिस के पास जानकारी आते ही पीड़ित परिवार से संपर्क किया गया था,लेकिन उस समय परिवार इलाज के सिलसिले में बाहर था। परिवार से कहा गया कि धर्मशाला लौटने के बाद विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराएँ। एएसपी का कहना है कि छात्रा की मौत के बाद मामले को फिर से गंभीरता से लिया गया और अब हर पहलू की बारीकी से जाँच की जा रही है। इसमें रैगिंग के आरोप,शिक्षकों की भूमिका,कॉलेज प्रशासन के कदम और पुलिस की प्रारंभिक कार्रवाई—सब पर अलग-अलग स्तर पर समीक्षा की जा रही है।
मृतक छात्रा के पिता विक्रम सिंह का दर्द शब्दों में साफ झलकता है। उन्होंने कहा कि जिस कॉलेज में उन्होंने विश्वास के साथ अपनी बेटी को पढ़ने भेजा,वहीं पर उसे सबसे ज्यादा प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उनके अनुसार,कुछ छात्राओं ने न केवल दुर्व्यवहार किया,बल्कि जातिसूचक शब्द भी कहे,जिससे बेटी अंदर ही अंदर टूटती चली गई। पिता का आरोप है कि जिन शिक्षकों से उम्मीद थी कि वे बच्ची का साथ देंगे,उनमें से ही एक प्रोफेसर ने उसे मानसिक रूप से परेशान किया। उनका कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई होती,शिकायतों को गंभीरता से लिया जाता और पुलिस तथा प्रशासन संवेदनशीलता दिखाते,तो शायद आज उनकी बेटी जिंदा होती। उन्होंने यह भी बताया कि मजबूरी में उन्हें सीएम हेल्पलाइन का सहारा लेना पड़ा,क्योंकि स्थानीय स्तर पर कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था।
दूसरी ओर,कॉलेज प्रशासन ने अपने ऊपर लगे आरोपों से दूरी बनाने की कोशिश की है। कॉलेज प्रिंसिपल राकेश पठानिया ने पीड़ित परिवार के प्रति संवेदना जताई,लेकिन साथ ही यह भी कहा कि छात्रा पिछले साल कॉलेज में पढ़ती थी,जबकि इस सत्र में उसकी एनरोलमेंट नहीं हुई थी। उनके अनुसार,फर्स्ट ईयर में तीन विषयों में फेल होने के कारण नियमों के तहत सेकेंड ईयर में उसका दाखिला संभव नहीं था। प्रिंसिपल का दावा है कि छात्रा कुछ समय के लिए कॉलेज परिसर में दिखी जरूर थी,लेकिन वह इस सत्र में औपचारिक रूप से कॉलेज की रेगुलर छात्रा नहीं थी।
कॉलेज प्रशासन यह भी कह रहा है कि संस्थान में रैगिंग के खिलाफ सख्त नीति लागू है। हर ब्लॉक में एंटी-रैगिंग कमेटी के नंबर लिखे गए हैं और जैसे ही कोई शिकायत मिलती है,तुरंत कार्रवाई की जाती है। उनका कहना है कि इस मामले में कॉलेज को किसी भी किस्म की औपचारिक शिकायत नहीं मिली,अन्यथा आंतरिक जाँच समिति गठित कर दी जाती। सवाल हालाँकि यह उठ रहा है कि जब छात्रा कॉलेज परिसर में लगातार दिखाई दे रही थी और उसके साथ रैगिंग के आरोप सामने आ रहे थे,तो क्या कॉलेज सतर्कता बरतने में नाकाम रहा?
कॉलेज के सह-प्राचार्य और प्रोफेसर यूनिट अध्यक्ष विक्रम श्रीवत्स ने आरोपी प्रोफेसर अशोक का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि लगाए गए आरोप निराधार हैं और कॉलेज का स्टाफ अपने सहकर्मी के साथ खड़ा है। मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर मोनिका मक्कड़ ने भी बयान दिया कि 2006 से कॉलेज में पढ़ा रहे प्रोफेसर अशोक के खिलाफ इससे पहले कभी कोई शिकायत नहीं आई। इन बयानों ने बहस को और जटिल बना दिया है,क्योंकि एक ओर छात्रा के परिवार के गंभीर आरोप हैं,तो दूसरी ओर कॉलेज का स्टाफ अपने सदस्य के बचाव में खड़ा नजर आ रहा है।
इसी बीच,छात्र संगठनों ने भी इस मामले को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की प्रदेश मंत्री नैंसी अटल ने कहा कि संगठन पीड़ित परिवार के साथ खड़ा है और न्याय की लड़ाई में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी। उनका आरोप है कि यदि पुलिस और कॉलेज प्रशासन ने समय रहते संज्ञान लिया होता,तो शायद स्थिति यहाँ तक न पहुँचती। उन्होंने पुलिस पर यह टिप्पणी भी की कि छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलनों में तो सख्ती दिखाई जाती है,लेकिन ऐसे संवेदनशील मामलों में गंभीरता नहीं बरती जाती।
इस पूरे मामले ने रैगिंग-विरोधी कानूनों की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। देशभर के कॉलेजों में एंटी-रैगिंग कमेटियाँ और हेल्पलाइन नंबर तो मौजूद हैं,पर क्या छात्र-छात्राएँ वास्तव में उन पर भरोसा कर पाते हैं? क्या शिकायत करने वालों को सुरक्षा और गोपनीयता की गारंटी दी जाती है? या फिर शिकायत के बाद पीड़ित को और ज्यादा प्रताड़ना झेलनी पड़ती है? धर्मशाला की इस घटना ने यह दिखा दिया है कि व्यवस्था में कहीं-न-कहीं बड़ी खामियाँ हैं,जिनका खामियाजा एक परिवार ने अपनी बेटी खोकर चुकाया।
मामले की जाँच अभी जारी है और पुलिस ने आश्वासन दिया है कि तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई होगी,लेकिन इससे अलग,समाज और शिक्षा प्रणाली के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा है—क्या हमारे कॉलेज केवल डिग्री देने वाले संस्थान बनकर रह गए हैं या वे वास्तव में सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिए भी गंभीर हैं? छात्रा की मौत केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं,बल्कि एक चेतावनी है कि रैगिंग, मानसिक उत्पीड़न और लापरवाही का दुष्परिणाम कितना भयावह हो सकता है।
आज जरूरत इस बात की है कि कॉलेज प्रशासन,पुलिस,सरकार और समाज मिलकर ऐसे मामलों को उदाहरण बनाएँ,जहाँ दोषियों को सख्त सजा मिले और पीड़ित परिवार को न्याय के साथ सम्मान भी। तभी शायद भविष्य में कोई और छात्रा चुपचाप पीड़ा झेलने को मजबूर न हो और न ही किसी माँ-बाप को अपनी बेटी को यूँ असमय खोने का दर्द सहना पड़े।
