चेन्नई,3 मार्च (युआईटीवी)- आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है। सत्तारूढ़ द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम(डीएमके) और उसकी प्रमुख सहयोगी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के बीच सीट बँटवारे को लेकर चल रही बातचीत तय समय सीमा तक किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाई है। मंगलवार को बातचीत की अंतिम समय सीमा समाप्त हो रही है,लेकिन अब तक दोनों दलों के बीच सहमति नहीं बन सकी है। ऐसे में गठबंधन के भविष्य को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गई हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार,डीएमके नेतृत्व ने कांग्रेस से एक निश्चित समय सीमा के भीतर अपना अंतिम रुख स्पष्ट करने को कहा है। डीएमके चाहती है कि सीट बँटवारे का मसला जल्द सुलझे,ताकि पार्टी चुनाव प्रचार की तैयारियों में पूरी ताकत के साथ जुट सके। रणनीतिक रूप से यह समय बेहद अहम माना जा रहा है,क्योंकि उम्मीदवारों के चयन,क्षेत्रीय समीकरणों और प्रचार अभियान की रूपरेखा तय करने के लिए स्पष्टता जरूरी है।
गौरतलब है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन के तहत कांग्रेस को 25 सीटें दी गई थीं। उस चुनाव में गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला था और डीएमके ने सत्ता में वापसी की थी। इस बार भी डीएमके ने उसी फॉर्मूले को बरकरार रखने का प्रस्ताव रखा है और कांग्रेस को 25 सीटें देने की पेशकश की है। इसके साथ ही,सत्ताधारी पार्टी ने गठबंधन समझौते के तहत कांग्रेस को एक राज्यसभा सीट देने पर भी सहमति जताई है,जिसे एक संतुलित और सम्मानजनक प्रस्ताव के रूप में पेश किया जा रहा है।
हालाँकि,कांग्रेस इस बार अधिक सीटों की माँग पर अड़ी हुई है। पार्टी कम-से-कम 35 विधानसभा सीटें चाहती है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी की संगठनात्मक उपस्थिति मजबूत हुई है और कई क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन बेहतर रहा है,इसलिए सीटों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। उनका कहना है कि जमीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल तभी ऊँचा रहेगा जब उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलेगा।
इसी माँग को लेकर पिछले कुछ दिनों से बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। डीएमके के सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के कोटे में 10 सीटों की बढ़ोतरी करना आसान नहीं है,खासकर तब जब गठबंधन में नए दल भी शामिल हुए हैं। कई छोटे और क्षेत्रीय सहयोगी दल भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की माँग कर रहे हैं। ऐसे में डीएमके नेतृत्व के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। पार्टी चाहती है कि गठबंधन में सभी सहयोगियों को प्रतिनिधित्व मिले,ताकि व्यापक सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण साधे जा सकें।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीट बँटवारे की यह खींचतान केवल संख्या का सवाल नहीं है,बल्कि यह शक्ति संतुलन और भविष्य की रणनीति से भी जुड़ी हुई है। कांग्रेस, जो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है,दक्षिण भारत में तमिलनाडु को एक अहम राज्य के रूप में देखती है। वहीं डीएमके,जो राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति है,अपने नेतृत्व को कमजोर किए बिना सहयोगियों को साथ रखना चाहती है।
इस बीच यह संकेत भी मिले हैं कि यदि 35 सीटों की माँग पूरी नहीं हुई,तो कांग्रेस गठबंधन में अपनी स्थिति पर पुनर्विचार कर सकती है। हालाँकि,पार्टी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है,लेकिन सूत्रों के हवाले से ऐसी चर्चाएँ सामने आ रही हैं। यदि ऐसा होता है,तो राज्य की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव आ सकता है। विपक्षी दल इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और संभावित समीकरणों को लेकर मंथन कर रहे हैं।
डीएमके नेतृत्व फिलहाल सार्वजनिक रूप से संयमित बयान दे रहा है। पार्टी का कहना है कि बातचीत सकारात्मक माहौल में चल रही है और अंतिम निर्णय आपसी सहमति से लिया जाएगा। वहीं कांग्रेस भी यह दोहरा रही है कि वह गठबंधन को बनाए रखना चाहती है,लेकिन सम्मानजनक हिस्सेदारी की उम्मीद करती है। दोनों दलों के वरिष्ठ नेता लगातार संपर्क में हैं और समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं।
तमिलनाडु की राजनीति में गठबंधन की भूमिका बेहद अहम रही है। यहाँ चुनावी सफलता अक्सर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करती है। ऐसे में डीएमके और कांग्रेस के बीच तालमेल टूटने की स्थिति दोनों के लिए जोखिम भरी हो सकती है। पिछले चुनाव में गठबंधन की सफलता ने यह साबित किया था कि साझा रणनीति से विपक्षी दलों को कड़ी चुनौती दी जा सकती है।
जैसे-जैसे समय सीमा समाप्ति की ओर बढ़ रही है,राजनीतिक पर्यवेक्षकों और मतदाताओं की नजरें दोनों दलों के नेतृत्व पर टिकी हैं। क्या डीएमके अपने प्रस्ताव में लचीलापन दिखाएगी? क्या कांग्रेस अपनी मांग में कुछ नरमी लाएगी? या फिर यह गतिरोध गठबंधन की राह अलग कर देगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में स्पष्ट होंगे।
फिलहाल इतना तय है कि सीट बँटवारे पर यह रस्साकशी तमिलनाडु चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल को गर्माए रखेगी। यदि समझौता हो जाता है,तो गठबंधन एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरेगा,लेकिन अगर बातचीत विफल होती है,तो राज्य की राजनीति को नया मोड़ मिल सकता है। तमिलनाडु की जनता अब यह देखने को उत्सुक है कि क्या पुराने सहयोगी अपने मतभेद भुलाकर साथ आगे बढ़ेंगे या सियासी समीकरण बदल जाएँगे।
