मुंबई,18 सितंबर (युआईटीवी)- टाटा समूह के भीतर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच बढ़ते मतभेद का असर शुक्रवार को शेयर बाजार में साफ दिखाई दिया। समूह की कई प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में शुरुआती कारोबार के दौरान तेज गिरावट दर्ज की गई। कुछ शेयरों में यह गिरावट करीब 8 प्रतिशत तक पहुँच गई। बाजार में इस दबाव की मुख्य वजह टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और टाटा संस को सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध करने के मुद्दे पर टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच सामने आया मतभेद माना जा रहा है।
शुक्रवार सुबह कारोबार शुरू होने के बाद टाटा समूह की कई कंपनियों के शेयरों में बिकवाली देखने को मिली। सुबह करीब 9:45 बजे टाटा केमिकल्स का शेयर लगभग 7.78 प्रतिशत गिरकर 718.65 रुपये के आसपास कारोबार कर रहा था। टाटा इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन में भी करीब 3.56 प्रतिशत की कमजोरी देखी गई और इसका शेयर 693.70 रुपये के आसपास पहुँच गया। टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स का शेयर लगभग 2.96 प्रतिशत की गिरावट के साथ 305 रुपये पर था। वहीं,टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस करीब 2.73 प्रतिशत टूटकर 2,130.30 रुपये के स्तर पर आ गया। टाटा टेक्नोलॉजीज में भी लगभग 2.76 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह करीब 737.80 रुपये पर कारोबार कर रहा था।
समूह की दूसरी कंपनियों पर भी दबाव दिखाई दिया। टाटा पावर का शेयर लगभग 0.99 प्रतिशत नीचे था और करीब 365.35 रुपये पर कारोबार कर रहा था। टाटा एलेक्सी में करीब 1.04 प्रतिशत की कमजोरी रही और इसका शेयर 3,346.70 रुपये के आसपास पहुँच गया। तेजस नेटवर्क्स में भी लगभग 0.69 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और शेयर 520.65 रुपये के स्तर पर था। हालाँकि,सभी टाटा कंपनियों में एक जैसी स्थिति नहीं रही। टाटा कैपिटल, इंडियन होटल्स, वोल्टास, नेल्को और ओरिएंटल होटल्स जैसे कुछ शेयर सीमित तेजी के साथ कारोबार करते नजर आए।
शेयर बाजार में इस प्रतिक्रिया के पीछे टाटा संस के भीतर नेतृत्व और भविष्य की संरचना को लेकर बढ़ती अनिश्चितता को महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। टाटा संस टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है और इसके नियंत्रण तथा भविष्य की रणनीति का असर समूह की दर्जनों कंपनियों पर पड़ता है। इसलिए इसके बोर्ड स्तर पर लिए जा रहे फैसलों को निवेशक काफी करीब से देख रहे हैं। हालिया घटनाक्रम में टाटा संस के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन बनाए रखने का फैसला किया, जबकि टाटा ट्रस्ट्स ने इस निर्णय का विरोध किया है।
टाटा ट्रस्ट्स की ओर से जारी बयान के अनुसार,एन. चंद्रशेखरन ने अगस्त में मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद दोबारा चेयरमैन पद के लिए खुद को पेश नहीं करने का निर्णय लिया था। ट्रस्ट्स का कहना है कि यह निर्णय स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया था और बाद में इसे वापस नहीं लिया जा सकता। ट्रस्ट्स के मुताबिक,इस फैसले को समूह के संबंधित पक्षों ने स्वीकार कर लिया था और उसी आधार पर आगे की प्रक्रिया की दिशा तय हुई थी। ऐसे में बाद में उनकी पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव उठाना विवाद का कारण बना।
इसके बाद 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड की बैठक में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव रखा गया। प्रस्ताव को बोर्ड के चार निदेशकों का समर्थन मिला, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और उसके नामित निदेशक नोएल टाटा ने इसका विरोध किया। टाटा ट्रस्ट्स ने इस मतदान प्रक्रिया और कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में मौजूद प्रावधानों का हवाला देते हुए पुनर्नियुक्ति को कानूनी रूप से अमान्य बताया है।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति जैसे महत्वपूर्ण फैसले के लिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की आवश्यक सहमति का प्रावधान है। ट्रस्ट्स के अनुसार,जब उनके नामित निदेशकों में से एक ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया है, तो केवल सामान्य बोर्ड बहुमत के आधार पर इस फैसले को वैध नहीं माना जा सकता। इसी वजह से ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर अपनी आपत्ति सार्वजनिक की है।
इस विवाद का दूसरा बड़ा मुद्दा टाटा संस की संभावित सार्वजनिक लिस्टिंग है। टाटा संस ने नियामकीय परिस्थितियों के बीच कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के विकल्प पर आगे बढ़ने का संकेत दिया है। दूसरी ओर,टाटा ट्रस्ट्स ने इस विचार पर सहमति नहीं जताई है। ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा समूह की एक सदी से अधिक पुरानी संरचना को बनाए रखना जरूरी है और टाटा संस को सार्वजनिक कंपनी बनाने से पहले सभी संभावित विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने रुख में कहा है कि टाटा समूह की मौजूदा संरचना केवल कारोबारी व्यवस्था नहीं है,बल्कि लंबे समय से सार्वजनिक हित और परोपकारी उद्देश्यों से जुड़ी रही है। ट्रस्ट्स का मानना है कि किसी भी बड़े संरचनात्मक बदलाव के प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। वहीं,टाटा संस की ओर से लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का रुख नियामकीय परिस्थितियों और कंपनी की भविष्य की जरूरतों से जुड़ा हुआ है।
इस विवाद के बीच शेयर बाजार में निवेशकों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से तेज रही। टाटा समूह की कंपनियों के शेयरों में एक साथ गिरावट ने समूह के कुल बाजार मूल्य पर भी असर डाला। उपलब्ध बाजार आँकड़ों के अनुसार शुक्रवार को टाटा समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के बाजार मूल्य में अरबों डॉलर की कमी दर्ज हुई। निवेशकों की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि टाटा संस के नेतृत्व और भविष्य की संरचना पर स्पष्टता आने में समय लग सकता है।
टाटा समूह के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी अलग-अलग कंपनियां ऑटोमोबाइल, सूचना प्रौद्योगिकी, बिजली, रसायन, होटल, रक्षा, दूरसंचार और वित्तीय सेवाओं सहित कई क्षेत्रों में कारोबार करती हैं। समूह की होल्डिंग कंपनी के स्तर पर नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता का असर निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है। हालाँकि,अलग-अलग कंपनियों का वास्तविक कारोबार और वित्तीय प्रदर्शन अपने-अपने क्षेत्रों की परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।
इस पूरे विवाद में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है और उसके नामित निदेशक बोर्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच किसी बड़े मतभेद का असर केवल बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहता,बल्कि समूह की भविष्य की रणनीति और प्रमुख कंपनियों पर भी चर्चा शुरू हो जाती है।
फिलहाल सबसे बड़ी अनिश्चितता एन. चंद्रशेखरन के भविष्य को लेकर बनी हुई है। टाटा संस के बोर्ड ने उन्हें दोबारा चेयरमैन बनाए रखने का फैसला किया है,जबकि टाटा ट्रस्ट्स इस निर्णय की वैधता पर सवाल उठा रहा है। इसके अलावा टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आ चुके हैं। ऐसे में आगे की प्रक्रिया बोर्ड,शेयरधारकों और संबंधित नियामकीय व्यवस्थाओं के स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकती है।
शुक्रवार की शेयर बाजार गतिविधि ने यह जरूर दिखा दिया कि टाटा समूह के भीतर चल रहा यह विवाद निवेशकों के लिए भी महत्वपूर्ण हो चुका है। आने वाले दिनों में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति, टाटा संस की लिस्टिंग और समूह की मौजूदा शासन व्यवस्था को लेकर स्थिति किस दिशा में जाती है, इस पर बाजार की नजर बनी रहेगी। फिलहाल टाटा समूह की कंपनियों के शेयरों में आई गिरावट ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि समूह की शीर्ष होल्डिंग कंपनी से जुड़े फैसलों का असर व्यापक बाजार धारणा पर पड़ सकता है।
