विदेश मंत्री एस जयशंकर

पश्चिम एशिया में तनाव के बीच भारत का मानवीय कदम,कोच्चि बंदरगाह पर ईरानी युद्धपोत को दी डॉकिंग की अनुमति

नई दिल्ली,10 मार्च (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अस्थिरता के बीच भारत ने एक महत्वपूर्ण मानवीय और कूटनीतिक कदम उठाते हुए ईरान के युद्धपोत आईआरआईएस लवन को कोच्चि बंदरगाह पर डॉक करने की अनुमति दी है। इस फैसले को लेकर ईरान ने भारत के प्रति आभार व्यक्त किया है और इसे मानवीय दृष्टिकोण से उठाया गया कदम बताया है। इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने राज्यसभा में अपने संबोधन के दौरान दी और पश्चिम एशिया में बदलते हालात के बीच भारत की नीति और प्राथमिकताओं को भी स्पष्ट किया।

राज्यसभा में बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि मौजूदा समय में पश्चिम एशिया के हालात बेहद जटिल हैं और क्षेत्र में कई तरह के तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे हालात में कई देशों के साथ उच्च स्तर पर संपर्क बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। उन्होंने बताया कि विशेष रूप से ईरान के साथ नेतृत्व स्तर पर सीधा संवाद स्थापित करना फिलहाल कठिन रहा है,हालाँकि कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से बातचीत लगातार जारी है।

विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में बताया कि उन्होंने हाल ही में दो बार ईरान के विदेश मंत्री से बातचीत की है। उन्होंने कहा कि 20 फरवरी 2026 और 5 मार्च 2026 को उन्होंने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची से फोन पर चर्चा की थी। इस बातचीत के दौरान दोनों देशों के बीच पश्चिम एशिया की स्थिति,समुद्री सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। जयशंकर ने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में भी दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय बातचीत जारी रहने की उम्मीद है।

विदेश मंत्री ने कोच्चि बंदरगाह पर ईरानी नौसेना के जहाज के डॉक करने की घटना का विस्तार से जिक्र किया। उन्होंने बताया कि ईरानी नौसेना के जहाज आईआरआईएस लवन को भारत के बंदरगाह पर आने की अनुमति विशेष परिस्थितियों में दी गई थी। दरअसल उस समय क्षेत्र में ईरानी नौसेना से जुड़ी एक बड़ी दुर्घटना की खबर सामने आई थी। श्रीलंका के पास ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस डेना के डूबने की घटना घटी थी,जिससे इलाके में सुरक्षा और तकनीकी चुनौतियाँ बढ़ गई थीं।

जयशंकर ने बताया कि इसी दौरान ईरानी नौसेना का एक अन्य जहाज तकनीकी समस्याओं का सामना कर रहा था और उसे तत्काल सहायता की जरूरत थी। ऐसी स्थिति में ईरान की ओर से भारत से मदद का अनुरोध किया गया। उन्होंने कहा कि ईरानी पक्ष ने 20 फरवरी 2026 को इस क्षेत्र में मौजूद अपने तीन जहाजों को भारतीय बंदरगाहों पर डॉक करने की अनुमति माँगी थी। भारत सरकार ने इस अनुरोध पर विचार किया और 1 मार्च 2026 को उन्हें अनुमति दे दी गई।

इसके बाद ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस लवन 4 मार्च 2026 को केरल के कोच्चि बंदरगाह पर पहुँचा और वहाँ डॉक किया। जयशंकर ने बताया कि जहाज का क्रू फिलहाल भारतीय नौसेना की सुविधाओं में ठहरा हुआ है और उन्हें आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फैसला पूरी तरह मानवीय आधार पर लिया गया था और भारत ने हमेशा संकट के समय सहायता देने की नीति अपनाई है।

विदेश मंत्री ने कहा कि भारत का मानना है कि समुद्र में किसी भी देश के जहाज को तकनीकी या आपात स्थिति में सहायता मिलनी चाहिए। यह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री परंपराओं और मानवीय मूल्यों के अनुरूप भी है। उन्होंने कहा कि इसी भावना के तहत भारत ने ईरानी जहाज को अपने बंदरगाह पर डॉक करने की अनुमति दी।

ईरान ने भी इस कदम के लिए भारत का आभार व्यक्त किया है। जयशंकर ने बताया कि ईरानी विदेश मंत्री ने व्यक्तिगत रूप से भारत सरकार और भारतीय जनता के प्रति धन्यवाद व्यक्त किया है। ईरान ने इसे इंसानियत और सहयोग की भावना का उदाहरण बताया है।

राज्यसभा में अपने संबोधन के दौरान जयशंकर ने पश्चिम एशिया में चल रही अस्थिरता के व्यापक प्रभावों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में जारी तनाव का असर केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था,ऊर्जा आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा इस समय सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। भारत दुनिया के प्रमुख ऊर्जा आयातक देशों में से एक है और पश्चिम एशिया से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का आयात करता है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर भारत की ऊर्जा आपूर्ति और घरेलू बाजार पर पड़ सकता है।

जयशंकर ने कहा कि सरकार इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लगातार स्थिति की निगरानी कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की नीति हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों और भारतीय उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना रही है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए सरकार हर संभव कदम उठा रही है।

विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए किसी भी संकट की स्थिति में उनकी सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है।

उन्होंने बताया कि भारत इस दिशा में क्षेत्र के देशों की सरकारों के साथ लगातार संपर्क में है और आवश्यकता पड़ने पर हर संभव सहायता प्रदान करने के लिए तैयार है। जयशंकर ने कहा कि भारतीय दूतावास और मिशन भी वहां रहने वाले भारतीयों के संपर्क में हैं और उनकी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

अपने संबोधन के दौरान जयशंकर ने भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांतों को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा शांति और स्थिरता का समर्थक रहा है और किसी भी संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से निकालने में विश्वास करता है।

उन्होंने कहा कि भारत सभी पक्षों से संयम बरतने और तनाव को कम करने की अपील करता है। इसके साथ ही उन्होंने आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। जयशंकर ने कहा कि युद्ध और संघर्ष का सबसे अधिक असर आम लोगों पर पड़ता है,इसलिए सभी देशों को ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए प्रयास करना चाहिए।

अपने भाषण के अंत में विदेश मंत्री ने कहा कि भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि चाहे ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा हो,व्यापार हो या विदेशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा,सरकार इन सभी मामलों में देश के हितों को सबसे ऊपर रखेगी।

उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात के बीच भारत संतुलित और जिम्मेदार भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत का उद्देश्य क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना है,साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।