अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ट्रंप का बड़ा दावा: चीन ने 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल किया,चुनावी व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल

वाशिंगटन,17 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर चुनावी सुरक्षा और विदेशी हस्तक्षेप का मुद्दा केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुफिया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से जुड़े दस्तावेजों के एक बड़े संग्रह को सार्वजनिक करने का आदेश देकर एक नई राजनीतिक और सुरक्षा बहस छेड़ दी है। ट्रंप का दावा है कि इन दस्तावेजों में ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य मौजूद हैं,जो अमेरिकी चुनावी व्यवस्था की गंभीर कमियों, मतदाता डेटा की सुरक्षा में बड़ी सेंध और चुनावों में विदेशी हस्तक्षेप के संभावित खतरों को उजागर करते हैं। उनके अनुसार,इन रिकॉर्ड्स से यह संकेत मिलता है कि चीन ने करोड़ों अमेरिकी मतदाताओं से जुड़ी संवेदनशील जानकारी तक पहुँच बना ली थी और इस डेटा का इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से किया जा सकता था।

गुरुवार रात पूरे देश में प्रसारित अपने संबोधन में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उनका प्रशासन अमेरिकी लोकतंत्र से जुड़े ऐसे तथ्यों को जनता के सामने लाना चाहता है,जिन्हें लंबे समय तक गोपनीय रखा गया। उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि वह तत्काल प्रभाव से उन खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक कर रहे हैं,जिनमें चुनावी बुनियादी ढाँचे की कमजोरियों और विदेशी साइबर गतिविधियों के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियाँ दर्ज हैं। ट्रंप ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है,जब जनता को उन खतरों की पूरी जानकारी हो,जिनका सामना चुनावी व्यवस्था कर रही है।

राष्ट्रपति के अनुसार,सार्वजनिक किए गए दस्तावेज व्हाइट हाउस की “गवर्नमेंट ट्रांसपेरेंसी टास्क फोर्स” द्वारा तैयार किए गए थे। उन्होंने बताया कि इन दस्तावेजों की समीक्षा राष्ट्रपति के “इंटेलिजेंस एडवाइजरी बोर्ड” तथा वरिष्ठ खुफिया अधिकारियों ने भी की थी। ट्रंप का कहना है कि इन रिकॉर्ड्स को सार्वजनिक करने का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को लाभ पहुँचाना नहीं,बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी पारदर्शिता को मजबूत करना है।

ट्रंप ने सबसे बड़ा दावा करते हुए कहा कि दस्तावेजों के पहले समूह से यह जानकारी सामने आई है कि चीन ने लगभग 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं की फाइलों तक पहुंच हासिल कर ली थी। उनके अनुसार,इन फाइलों में मतदाताओं के नाम,पते,टेलीफोन नंबर, राजनीतिक झुकाव और अन्य ऐसी जानकारियाँ शामिल थीं,जिनका उपयोग चुनावी गतिविधियों को प्रभावित करने या मतदाताओं को लक्षित करने के लिए किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में संवेदनशील डेटा का विदेशी हाथों में पहुँचना अमेरिकी लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

व्हाइट हाउस की एक अलग टास्क फोर्स द्वारा जारी बयान में भी चुनावी डेटा सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं। बयान के अनुसार, 20 करोड़ से अधिक मतदाताओं से जुड़े रिकॉर्ड्स की सुरक्षा में सेंध लगाई गई थी। इसके अलावा कम से कम 18 राज्यों से संबंधित मतदाता रिकॉर्ड भी प्रभावित हुए। रिपोर्ट में सार्वजनिक रूप से 16 राज्यों और क्षेत्रों की पहचान की गई,जिनमें अलास्का,अर्कांसस,कोलोराडो,कनेक्टिकट,फ्लोरिडा, जॉर्जिया,मैरीलैंड,मिशिगन,न्यूयॉर्क,नॉर्थ कैरोलिना और ओहियो सहित कई अन्य राज्य शामिल बताए गए हैं। इन राज्यों में मतदाताओं के डेटा की सुरक्षा को लेकर विशेष चिंता व्यक्त की गई है।

अपने संबोधन में ट्रंप ने खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान चीन की गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी उनसे छिपाई गई। ट्रंप ने कहा कि यदि उन्हें उस समय यह जानकारी उपलब्ध कराई जाती,तो वह चुनावी सुरक्षा को मजबूत करने और साइबर खतरों से निपटने के लिए अधिक प्रभावी कदम उठा सकते थे। उन्होंने कहा कि इस तरह की जानकारी को राष्ट्रपति से छिपाना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं,बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।

इसी संदर्भ में राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय खुफिया निदेशक कार्यालय,न्याय विभाग,संघीय जाँच ब्यूरो और केंद्रीय खुफिया एजेंसी को निर्देश दिया है कि वे यह जाँच करें कि आखिर यह जानकारी राष्ट्रपति और प्रशासन के सामने समय पर क्यों नहीं रखी गई। उन्होंने कहा कि यदि जाँच में यह साबित होता है कि किसी अधिकारी ने जानबूझकर तथ्यों को छिपाया या अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया,तो ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। ट्रंप ने स्पष्ट कहा कि दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों को पद से हटाया जाना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए।

जारी किए गए रिकॉर्ड्स में कई ऐसी रिपोर्टें भी शामिल हैं,जिनमें चीन पर अमेरिका की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करने के प्रयासों के आरोप लगाए गए हैं। इन दस्तावेजों में दावा किया गया है कि चीन ने ट्रंप को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की रणनीति अपनाई,अमेरिकी व्यापारिक नेताओं और पत्रकारों को प्रभावित करने का प्रयास किया तथा नस्लीय,आर्थिक,आव्रजन और राजनीतिक मतभेदों का लाभ उठाकर अमेरिकी समाज में विभाजन बढ़ाने की कोशिश की। हालाँकि,इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है,लेकिन दस्तावेजों के सामने आने के बाद इन दावों पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

कुछ अन्य दस्तावेजों में यह भी उल्लेख किया गया है कि चीन से जुड़े संदिग्ध साइबर तत्वों ने मतदाता पंजीकरण से संबंधित सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं और व्यक्तिगत पहचान संबंधी डेटा को व्यवस्थित तरीके से एकत्र किया। एक खुफिया आकलन के अनुसार जनवरी 2022 में कोलोराडो,कनेक्टिकट,फ्लोरिडा,मिशिगन,ओक्लाहोमा और रोड आइलैंड से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मतदाता जानकारी को एक संदिग्ध चीनी साइबर इकाई ने व्यावसायिक वेबसाइटों के माध्यम से डाउनलोड किया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उसी इकाई ने ओहियो के मतदाता पंजीकरण आवेदन को डाउनलोड करने का प्रयास किया,लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो सकी।

इन खुलासों के साथ ट्रंप ने मिशिगन में कथित फर्जी मतदाता पंजीकरण आवेदनों से जुड़ी जाँच का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संघीय जाँच ब्यूरो के रिकॉर्ड्स में गवाहों के बयान,डेटाबेस की विस्तृत जाँच और कई वर्षों तक चली संघीय जाँच का विवरण शामिल है। हालाँकि,अंततः अभियोजकों ने किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आरोप तय करने से इनकार कर दिया और बाद में संघीय जाँच ब्यूरो ने यह कहते हुए मामला बंद कर दिया कि जाँच के दौरान ऐसा कोई संघीय कानून उल्लंघन नहीं मिला,जिसके आधार पर मुकदमा चलाया जा सके। ट्रंप ने कहा कि भले ही उस मामले में कानूनी कार्रवाई नहीं हुई,लेकिन उससे चुनावी प्रणाली की कमजोरियाँ सामने आती हैं।

राष्ट्रपति ने यह भी घोषणा की कि उनका प्रशासन सभी राज्यों के गवर्नरों,विधायकों और संबंधित अधिकारियों को उनके अधिकार क्षेत्र में पाई गई चुनावी कमियों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराएगा। उन्होंने कहा कि चुनाव केवल संघीय सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं,बल्कि राज्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए सभी राज्यों को अपनी चुनावी प्रणालियों की समीक्षा कर आवश्यक सुधार करने चाहिए,ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की साइबर सेंधमारी या डेटा चोरी को रोका जा सके।

अपने संबोधन में ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस से चुनाव सुधार संबंधी नए कानून बनाने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि मतदान के लिए फोटो पहचान-पत्र अनिवार्य किया जाना चाहिए और प्रत्येक मतदाता के लिए नागरिकता का प्रमाण प्रस्तुत करना भी आवश्यक होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने मेल बैलेट प्रणाली के व्यापक उपयोग पर भी सवाल उठाए और सुझाव दिया कि इसका इस्तेमाल केवल सीमित परिस्थितियों में ही किया जाए। उनके अनुसार,इससे चुनावी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनेगी।

उधर,गृह सुरक्षा विभाग और साइबर सुरक्षा एवं अवसंरचना सुरक्षा एजेंसी की एक अलग रिपोर्ट में भी चुनावी डेटा की सुरक्षा को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार यदि मतदाताओं का डेटा चोरी हो जाता है,तो उसका इस्तेमाल अनुपस्थित मतपत्रों के लिए फर्जी आवेदन करने,मतदाताओं का पता बदलने,मतदान केंद्र की जानकारी में बदलाव करने तथा मतदाता पंजीकरण जोड़ने या हटाने जैसी गतिविधियों में किया जा सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सभी 50 राज्यों की मतदाता पंजीकरण प्रणालियों को किसी न किसी स्तर पर निशाना बनाया गया था और कम से कम 20 राज्यों में सिस्टम के साथ छेड़छाड़ की पुष्टि हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक चुनावों में साइबर सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुकी है। चुनावी डेटा केवल मतदाताओं की व्यक्तिगत जानकारी तक सीमित नहीं होता,बल्कि इससे राजनीतिक रणनीतियाँ,प्रचार अभियान और मतदाताओं की प्राथमिकताओं का भी विश्लेषण किया जा सकता है। यदि इस प्रकार का डेटा विदेशी संस्थाओं के हाथ लग जाता है,तो उसका उपयोग दुष्प्रचार,साइबर हमलों,लक्षित प्रचार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देश चुनावी साइबर सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।

हालाँकि,ट्रंप के इन दावों के बाद अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। उनके समर्थक इसे चुनावी पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं,जबकि आलोचकों का कहना है कि सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों की स्वतंत्र जाँच और तथ्यों का निष्पक्ष सत्यापन भी उतना ही आवश्यक है। कई विश्लेषकों का मानना है कि दस्तावेजों में लगाए गए आरोपों की पुष्टि संबंधित एजेंसियों की विस्तृत जाँच के बाद ही संभव होगी।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि चुनावी सुरक्षा,साइबर हमलों और विदेशी हस्तक्षेप का मुद्दा अमेरिका में फिर से राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। ट्रंप द्वारा दस्तावेजों को सार्वजनिक करने के फैसले ने न केवल चुनावी प्रणाली की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली,सरकारी जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की पारदर्शिता पर भी व्यापक चर्चा शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में इन दस्तावेजों की जाँच, एजेंसियों की प्रतिक्रिया और कांग्रेस में संभावित चुनाव सुधारों पर होने वाली बहस अमेरिकी राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।