अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ पर अमेरिकी अदालत की बड़ी रोक,राष्ट्रपति की आर्थिक नीति को लगा झटका

वाशिंगटन,8 मई (युआईटीवी)- अमेरिका की फेडरल ट्रेड कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति को बड़ा झटका देते हुए उनके द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया है। अदालत के इस फैसले ने न केवल ट्रंप प्रशासन की आर्थिक रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं,बल्कि अमेरिका में राष्ट्रपति की शक्तियों और व्यापार कानूनों की सीमाओं को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि ट्रंप प्रशासन ने 1974 के व्यापार कानून की व्याख्या करते समय अपनी संवैधानिक और कानूनी सीमाओं का उल्लंघन किया है।

यह मामला उस समय सामने आया,जब राष्ट्रपति ट्रंप ने फरवरी में 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ लागू करने की घोषणा की थी। ट्रंप प्रशासन का दावा था कि यह कदम अमेरिका के बढ़ते व्यापार घाटे और विदेशी आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए जरूरी है। प्रशासन ने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का हवाला देते हुए इन टैरिफ को लागू किया था। यह प्रावधान राष्ट्रपति को सीमित अवधि के लिए आयात पर अस्थायी अधिभार लगाने की अनुमति देता है। हालाँकि,अदालत ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य आधुनिक व्यापार घाटों से निपटना नहीं था।

दो-एक के बहुमत से दिए गए फैसले में अदालत ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने जिस प्रकार व्यापार घाटे और चालू खाते के घाटे को आधार बनाकर टैरिफ लगाए,वह कानून की मूल भावना के खिलाफ है। अदालत के अनुसार, 1974 में कांग्रेस ने यह प्रावधान विशेष रूप से उस दौर की अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था से जुड़े ‘भुगतान-संतुलन संकट’ से निपटने के लिए बनाया था। इसका उपयोग व्यापक आर्थिक या राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जा सकता।

न्यायाधीश मार्क ए. बार्नेट और क्लेयर आर. केली ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप की घोषणा यह साबित करने में विफल रही कि धारा 122 के उपयोग के लिए जरूरी कानूनी शर्तें पूरी हुई थीं। अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासन ने ‘भुगतान-संतुलन घाटे’ और सामान्य व्यापार घाटे के बीच अंतर को नजरअंदाज किया,जबकि कानून में इन दोनों स्थितियों को अलग-अलग तरीके से देखा गया है।

फैसले में अदालत ने चेतावनी दी कि यदि राष्ट्रपति को इस प्रकार व्यापक तरीके से टैरिफ लगाने की छूट दे दी जाए,तो भविष्य में किसी भी प्रशासन को लगभग असीमित आर्थिक शक्तियाँ मिल सकती हैं। अदालत ने कहा कि ऐसी व्याख्या अमेरिकी संविधान में शक्तियों के संतुलन की भावना के खिलाफ होगी। जजों ने यह भी माना कि कांग्रेस ने जानबूझकर इस कानून के उपयोग को सीमित परिस्थितियों तक ही रखा था,ताकि कार्यपालिका की शक्तियाँ नियंत्रित रहें।

हालाँकि,इस मामले में एक न्यायाधीश ने ट्रंप प्रशासन का समर्थन भी किया। जज टिमोथी स्टैंसियू ने असहमति जताते हुए कहा कि अदालत को राष्ट्रपति के आर्थिक फैसलों में अत्यधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उनका मानना था कि आर्थिक और व्यापारिक संकटों की प्रकृति समय के साथ बदलती रहती है और सरकार को उन्हें परिभाषित करने तथा उनसे निपटने के लिए पर्याप्त लचीलापन मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत को यह तय करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि ‘भुगतान-संतुलन घाटा’ किस प्रकार मापा जाए।

यह पहला अवसर नहीं है,जब ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति अदालत के निशाने पर आई हो। इसी वर्ष की शुरुआत में भी अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की पिछली टैरिफ व्यवस्था को रद्द कर दिया था। उस फैसले में भी अदालत ने कहा था कि राष्ट्रपति ने अपनी शक्तियों की सीमा से बाहर जाकर आर्थिक फैसले लिए हैं। लगातार दूसरी बार अदालत से झटका मिलने के बाद ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। पिछले कुछ वर्षों में ट्रंप प्रशासन ने चीन,यूरोपीय देशों और कई अन्य व्यापारिक साझेदारों पर टैरिफ बढ़ाने की नीति अपनाई थी। इसका असर वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ा था। अब अदालत के फैसले के बाद यह संभावना बढ़ गई है कि अमेरिकी व्यापार नीति में बदलाव देखने को मिल सकता है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ट्रंप की टैरिफ नीति का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना और विदेशी आयात को महँगा बनाना था,लेकिन आलोचकों का आरोप रहा है कि इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ा और कई उद्योगों की लागत बढ़ गई। अदालत के ताजा फैसले ने इन आलोचनाओं को और बल दिया है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ट्रंप लंबे समय से ‘अमेरिका फर्स्ट’ आर्थिक नीति को अपनी राजनीतिक पहचान के रूप में पेश करते रहे हैं। ऐसे में अदालत द्वारा उनकी प्रमुख व्यापारिक रणनीति को गैरकानूनी ठहराया जाना उनके लिए राजनीतिक झटका माना जा रहा है। विपक्षी नेताओं ने भी फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि राष्ट्रपति कानून से ऊपर नहीं हो सकते।

हालाँकि,मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ट्रंप प्रशासन इस फैसले को संयुक्त राज्य अमेरिका की फेडरल सर्किट अपीलीय अदालत में चुनौती दे सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मामला अंततः फिर से अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों के केंद्र में बना रह सकता है।

फिलहाल,अदालत के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति की शक्तियाँ भी न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हैं। यह मामला केवल टैरिफ नीति तक सीमित नहीं है,बल्कि यह उस व्यापक सवाल से भी जुड़ा है कि आर्थिक संकटों और व्यापारिक चुनौतियों से निपटने में कार्यपालिका की सीमाएँ क्या होनी चाहिए। आने वाले समय में यह फैसला अमेरिकी व्यापार नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।