अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@ShpoolNews)

ट्रंप का बड़ा ऐलान,इजरायल को हर साल मिलने वाली करीब 4 अरब डॉलर की अमेरिकी मदद होगी बंद; नेतन्याहू से बनी सहमति

वाशिंगटन,4 नवंबर (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल को लेकर एक बड़ा फैसला लेने का संकेत दिया है। उन्होंने घोषणा की है कि इस साल के अंत तक अमेरिका इजरायल को हर साल दी जाने वाली आर्थिक और सैन्य सहायता बंद कर सकता है। ट्रंप के मुताबिक, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ इस मुद्दे पर बातचीत हुई है और करीब 4 अरब डॉलर की सालाना मदद रोकने को लेकर सहमति बनी है। हालाँकि,अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि सहायता बंद करने का मतलब इजरायल से संबंध समाप्त करना नहीं है। अमेरिका पहले की तरह उसे हथियारों की बिक्री जारी रखेगा और किसी बड़े संकट या जरूरत के समय उसकी मदद भी करेगा। ट्रंप के इस बयान को दोनों देशों के दशकों पुराने रक्षा और आर्थिक संबंधों में संभावित बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।

ट्रंप ने यह बात फॉक्स न्यूज के कार्यक्रम ‘फॉक्स एंड फ्रेंड्स’ में बातचीत के दौरान कही। उन्होंने कहा कि इस साल के अंत तक इजरायल को दी जाने वाली अमेरिकी आर्थिक सहायता समाप्त कर दी जाएगी। राष्ट्रपति के मुताबिक,इजरायल अब आर्थिक रूप से इतना मजबूत हो चुका है कि उसे अमेरिका से हर साल मिलने वाली वित्तीय मदद पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ इस विषय पर सहमति बनी है। हालाँकि,ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि मौजूदा सहायता व्यवस्था को दिसंबर तक समाप्त करने के लिए प्रशासन कौन-सी प्रक्रिया अपनाएगा और इसके लिए किन औपचारिक कदमों की जरूरत होगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने बयान में दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग जारी रहने की बात भी कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायल को आर्थिक सहायता बंद करने के बावजूद अमेरिका हथियारों की बिक्री नहीं रोकेगा। इसका अर्थ है कि इजरायल अपनी सैन्य जरूरतों के लिए अमेरिकी रक्षा कंपनियों से हथियार और सैन्य उपकरण खरीदता रह सकेगा। इसके अलावा,यदि भविष्य में इजरायल को किसी गंभीर सुरक्षा संकट का सामना करना पड़ता है तो अमेरिका उसकी सहायता करने के लिए तैयार रहेगा। इस तरह ट्रंप ने वित्तीय मदद और रक्षा सहयोग को अलग-अलग रखने का संकेत दिया है।

दरअसल,अमेरिका और इजरायल के बीच लंबे समय से मजबूत सैन्य साझेदारी रही है। दोनों देशों के बीच मौजूदा सैन्य सहायता समझौता सितंबर 2028 तक लागू है। इस समझौते के तहत अमेरिका इजरायल को हर साल करीब 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता उपलब्ध कराता है। यह रकम दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिकी सहायता से इजरायल अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने, रक्षा उपकरणों की खरीद और सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न जरूरतों को पूरा करने में मदद हासिल करता रहा है।

मौजूदा समझौते की अवधि सितंबर 2028 तक होने के बावजूद ट्रंप ने इस साल के अंत तक सहायता समाप्त करने की बात कही है। इसी वजह से उनके बयान के बाद कई सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिकी प्रशासन मौजूदा समझौते में बदलाव करेगा या सहायता रोकने के लिए कोई अलग व्यवस्था तैयार की जाएगी। अभी तक इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक प्रक्रिया सामने नहीं आई है। ट्रंप ने भी अपने बयान में यह नहीं बताया कि समझौते की शेष अवधि के दौरान सहायता को किस तरह समाप्त किया जाएगा। ऐसे में इस घोषणा को लागू करने के लिए अमेरिकी प्रशासन की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

इजरायल को अमेरिकी सहायता देने का मुद्दा पिछले कुछ समय से अमेरिका के भीतर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बना हुआ है। खासतौर पर गाजा में इजरायल के सैन्य अभियानों के बाद अमेरिकी नागरिकों और राजनीतिक दलों के बीच इस नीति को लेकर मतभेद बढ़े हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेताओं ने इजरायल की सैन्य कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि अमेरिका को इजरायल को दी जाने वाली सहायता पर पुनर्विचार करना चाहिए। वहीं,रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता पारंपरिक रूप से इजरायल के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने और उसे सैन्य समर्थन देने के पक्ष में रहे हैं।

अमेरिकी मतदाताओं के बीच भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय देखने को मिली है। जून में क्विनिपियाक यूनिवर्सिटी की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण में 48 प्रतिशत अमेरिकी मतदाताओं ने माना था कि अमेरिका इजरायल को जरूरत से ज्यादा समर्थन दे रहा है। डेमोक्रेटिक मतदाताओं के बीच यह आँकड़ा 66 प्रतिशत था। इन आँकड़ों से संकेत मिलता है कि इजरायल को अमेरिकी सहायता देने की नीति पर घरेलू स्तर पर असहमति बढ़ी है। गाजा में जारी सैन्य अभियानों और मानवीय स्थिति को लेकर उठने वाले सवालों ने इस बहस को और व्यापक बनाया है।

ट्रंप की यह घोषणा ऐसे समय में हुई है,जब अमेरिका में मध्यावधि चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हैं। इन चुनावों में उनकी रिपब्लिकन पार्टी के सामने प्रतिनिधि सभा में अपना बहुमत बनाए रखने की चुनौती है। ऐसे में इजरायल को दी जाने वाली सहायता का मुद्दा चुनावी राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो गया है। अमेरिका में विदेश नीति से जुड़े फैसलों का असर कई बार घरेलू चुनावी माहौल पर भी पड़ता है। खासकर तब,जब किसी मुद्दे पर मतदाताओं के बीच स्पष्ट मतभेद दिखाई दे रहे हों।

ट्रंप के बयान को इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में भी देखा जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया है कि इजरायल को दी जाने वाली वित्तीय मदद समाप्त करने से उन डेमोक्रेट नेताओं की आलोचना कमजोर पड़ सकती है,जो लंबे समय से अमेरिकी सहायता का विरोध कर रहे हैं। हालाँकि,हथियारों की बिक्री जारी रखने और जरूरत पड़ने पर इजरायल की मदद करने की बात कहकर उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिका अपनी रणनीतिक साझेदारी को पूरी तरह समाप्त करने के पक्ष में नहीं है।

अमेरिका और इजरायल के संबंध केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने, सैन्य तकनीक और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौते हैं। पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों में इजरायल अमेरिका का एक अहम सहयोगी माना जाता है। ऐसे में सालाना सहायता रोकने का फैसला दोनों देशों के संबंधों के एक महत्वपूर्ण पहलू को प्रभावित कर सकता है। हालाँकि,ट्रंप ने हथियारों की बिक्री और संकट के समय सहयोग जारी रखने की बात कहकर संकेत दिया है कि रणनीतिक रिश्तों को बनाए रखने की कोशिश की जाएगी।

इस फैसले का एक दूसरा पहलू इजरायल की आर्थिक और रक्षा क्षमता से भी जुड़ा है। ट्रंप का तर्क है कि इजरायल अब इतना मजबूत हो चुका है कि उसे नियमित अमेरिकी वित्तीय सहायता की आवश्यकता नहीं है। हालाँकि,अमेरिकी सहायता लंबे समय से इजरायल की रक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। इसलिए इसे अचानक समाप्त करने का फैसला इजरायल की रक्षा खरीद और सैन्य बजट से जुड़ी योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के सामने भी यह तय करने की चुनौती होगी कि अमेरिकी सहायता में संभावित बदलाव के बाद रक्षा जरूरतों को किस तरह पूरा किया जाए।

फिलहाल ट्रंप की घोषणा के बाद दोनों देशों के बीच सहायता समझौते के भविष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस फैसले को लागू करने के लिए क्या कदम उठाता है और इजरायल सरकार की ओर से इस पर क्या प्रतिक्रिया आती है। यदि सालाना सहायता वास्तव में बंद होती है,तो यह अमेरिका-इजरायल संबंधों में एक महत्वपूर्ण बदलाव होगा। हालाँकि,हथियारों की बिक्री और सुरक्षा सहयोग जारी रहने की बात से स्पष्ट है कि ट्रंप प्रशासन आर्थिक मदद में बदलाव के बावजूद दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी बनाए रखना चाहता है।

कुल मिलाकर,ट्रंप का यह ऐलान केवल इजरायल को दी जाने वाली करीब 4 अरब डॉलर की सालाना सहायता का मामला नहीं है। इसके पीछे अमेरिका की विदेश नीति,पश्चिम एशिया में रणनीतिक हित और घरेलू चुनावी राजनीति जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि साल के अंत तक अमेरिकी प्रशासन इस घोषणा को किस रूप में लागू करता है और इसका इजरायल की अर्थव्यवस्था तथा दोनों देशों के रक्षा संबंधों पर कितना असर पड़ता है।