भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी)

25 करोड़ की रकम घुमाकर 1,000 करोड़ का कर्ज दिखाने का आरोप,सेबी ने धेनु बिल्डकॉन पर कसा शिकंजा

मुंबई,20 अगस्त (युआईटीवी)- बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ने धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड से जुड़े कथित वित्तीय लेनदेन को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। सेबी का आरोप है कि कंपनी ने आपस में जुड़ी कई संस्थाओं के नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए महज 25 करोड़ रुपये की मूल राशि को अलग-अलग बैंक खातों के जरिए बार-बार घुमाया और इस तरह लगभग 1,000 करोड़ रुपये के असुरक्षित कर्ज का लेनदेन वास्तविक होने का आभास पैदा किया। नियामक के मुताबिक,प्रथम दृष्टया जाँच में सामने आए तथ्यों से संकेत मिलता है कि कथित कर्ज वास्तविक लेनदेन नहीं थे। इसी आधार पर सेबी ने मामले में अंतरिम आदेश जारी किया है।

सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्ष्णेय द्वारा पारित अंतरिम आदेश में इस कथित वित्तीय व्यवस्था का विस्तृत उल्लेख किया गया है। नियामक के अनुसार,पूरे मामले में सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन की भूमिका महत्वपूर्ण रही और उनके नियंत्रण, स्वामित्व या प्रबंधन से जुड़ी कई संस्थाएँ कथित नेटवर्क का हिस्सा थीं। सेबी ने बैंक खातों से हुए लेनदेन,कंपनियों के बीच संबंधों और उपलब्ध दस्तावेजों का विश्लेषण करने के बाद प्रथम दृष्टया यह निष्कर्ष निकाला है कि लेनदेन की वास्तविक प्रकृति संदिग्ध थी।

नियामक के अनुसार,वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान धेनु बिल्डकॉन को सात संस्थाओं से कथित तौर पर कुल 1,000 करोड़ रुपये का असुरक्षित कर्ज प्राप्त हुआ। इसके बाद दिसंबर 2025 में कंपनी ने इनमें से छह संस्थाओं के कथित 840 करोड़ रुपये के कर्ज को इक्विटी में बदलने के लिए प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट किया। यानी कंपनी की ओर से इन संस्थाओं को शेयर आवंटित किए गए और इस प्रक्रिया के जरिए कथित कर्ज को इक्विटी में परिवर्तित कर दिया गया।

हालाँकि,सेबी की जाँच में बैंक खातों से जुड़े फंड ट्रेल ने इस पूरे लेनदेन पर सवाल खड़े किए। नियामक के मुताबिक,जिन संस्थाओं के जरिए कथित 1,000 करोड़ रुपये की राशि धेनु बिल्डकॉन तक पहुँची,उनके बैंक खातों की जाँच में यह पाया गया कि रकम का बड़ा हिस्सा किसी नए या स्वतंत्र स्रोत से नहीं आया था। इसके बजाय 25 करोड़ रुपये की एक मूल राशि को नेटवर्क में शामिल अलग-अलग संस्थाओं के खातों के माध्यम से कई बार इधर-उधर भेजा गया।

सेबी के अनुसार,इसी रकम को अलग-अलग स्तरों पर बार-बार प्रसारित किए जाने से ऐसा प्रतीत हुआ कि कंपनी को 1,000 करोड़ रुपये का बड़ा असुरक्षित कर्ज मिला है। नियामक ने आरोप लगाया है कि कथित तौर पर 25 करोड़ रुपये की मूल राशि को कई चरणों में घुमाने के बाद अलग-अलग संस्थाओं से आने वाली बड़ी रकम का रूप दिया गया। इस तरह बैंकिंग लेनदेन की श्रृंखला तैयार की गई,जिसने पहली नजर में अलग-अलग कर्जदाताओं से कंपनी को धन मिलने का संकेत दिया।

जाँच में यह भी आरोप सामने आया कि शुरुआती 25 करोड़ रुपये की राशि का स्रोत भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं था। सेबी के अनुसार,यह रकम भी अन्य संबंधित संस्थाओं से जुड़े संदिग्ध फंड लेनदेन से प्राप्त हुई थी। इस कारण नियामक ने पूरे फंड ट्रेल को एक व्यापक नेटवर्क के संदर्भ में देखा और अलग-अलग खातों के बीच धन के प्रवाह का विश्लेषण किया।

सेबी ने कहा कि फंड ट्रेल की जाँच के आधार पर उसने प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला है कि धेनु बिल्डकॉन को दिए गए कथित कर्ज वास्तविक लेनदेन नहीं थे। अगर यह निष्कर्ष आगे की जाँच में कायम रहता है,तो इससे कंपनी की वित्तीय स्थिति और उसके द्वारा किए गए प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट की प्रकृति पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं।

नियामक ने विशेष रूप से दिसंबर 2025 में किए गए 840 करोड़ रुपये के प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट का भी उल्लेख किया है। सेबी का आरोप है कि जब मूल कर्ज की वास्तविकता ही संदिग्ध थी,तब उसके आधार पर कर्ज को इक्विटी में बदलने की प्रक्रिया भी वास्तविक वित्तीय लेनदेन के बिना की गई। इस तरह नियामक ने कथित वित्तीय व्यवस्था और उसके आधार पर किए गए शेयर आवंटन को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ माना है।

जाँच के दौरान सेबी ने धेनु बिल्डकॉन, कथित कर्जदाता संस्थाओं,प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट हासिल करने वाली संस्थाओं और कंपनी से धन प्राप्त करने वाली अन्य संस्थाओं के बीच कई समानताएँ भी दर्ज कीं। नियामक के अनुसार,इन संस्थाओं के बीच एक जैसे पते, समान निदेशक,समान अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता और एक ही बैंक शाखाओं से जुड़े संबंध पाए गए। इसके अतिरिक्त,कई संस्थाओं के बीच एक-दूसरे की शेयर हिस्सेदारी भी थी।

सेबी का कहना है कि इन समानताओं को केवल संयोग के तौर पर नहीं देखा जा सकता। नियामक के अनुसार,कथित नेटवर्क में शामिल कई संस्थाएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन के स्वामित्व,नियंत्रण या प्रबंधन में थीं। इस आधार पर सेबी ने इन कंपनियों के बीच संबंधों और उनके जरिए किए गए लेनदेन की वास्तविक स्वतंत्रता पर सवाल उठाया है।

जाँच में संस्थाओं की वास्तविक गतिविधियों को लेकर भी सवाल सामने आए। सेबी ने संबंधित संस्थाओं के पंजीकृत कार्यालयों का भौतिक निरीक्षण किया। नियामक के अनुसार,इस दौरान ऐसा प्रतीत हुआ कि कुछ संस्थाओं की वास्तविक भौतिक मौजूदगी और कारोबारी गतिविधियों का पर्याप्त आधार नहीं था। यानी कागजों पर मौजूद कंपनियों और उनके कथित कारोबार के बीच अंतर होने की आशंका जताई गई।

नियामक ने एक अलग मामले में की गई तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान बरामद चैट संदेशों और कॉल रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया है। सेबी के अनुसार,इन सामग्रियों से कथित नेटवर्क पर नियंत्रण और उससे जुड़ी गतिविधियों के संबंध में कुछ संकेत मिले। इन संचार रिकॉर्ड को फंड ट्रेल और कंपनियों के बीच पाए गए संबंधों के साथ मिलाकर देखा गया है।

सेबी के आदेश में कंपनी के बाजार मूल्यांकन में हुई तेज वृद्धि का भी उल्लेख किया गया है। नियामक के अनुसार,कथित लेनदेन उस समय हुए जब धेनु बिल्डकॉन के बाजार मूल्यांकन में नाटकीय वृद्धि दर्ज की गई थी। इससे नियामक ने यह भी जाँचने की कोशिश की है कि कथित वित्तीय लेनदेन और कंपनी के बाजार मूल्य में हुई वृद्धि के बीच कोई संबंध था या नहीं।

पूरे मामले में फंड के वास्तविक स्रोत और उसके अंतिम उपयोग को समझना सेबी की जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सामान्य तौर पर किसी कंपनी को दिए गए कर्ज में कर्जदाता की वित्तीय क्षमता,रकम का स्रोत और उसके बैंकिंग रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन यदि एक ही मूल राशि को कई संबंधित संस्थाओं के खातों से बार-बार गुजारकर बड़ी रकम के रूप में पेश किया जाता है,तो इससे लेनदेन की वास्तविकता और उद्देश्य पर सवाल खड़े हो सकते हैं। सेबी ने इसी तरह के पैटर्न की ओर संकेत किया है।

बाजार नियामक की कार्रवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के जरिए कंपनी की इक्विटी संरचना में बदलाव किया गया था। यदि किसी कथित कर्ज को वास्तविक वित्तीय लेनदेन के बिना इक्विटी में बदला जाता है, तो इससे कंपनी के शेयरधारकों,निवेशकों और बाजार में उपलब्ध वित्तीय जानकारी की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से सेबी ने मामले में कथित लेनदेन की परत-दर-परत जाँच की है।

हालाँकि,सेबी का यह अंतरिम आदेश प्रथम दृष्टया निष्कर्षों पर आधारित है। नियामक की ओर से लगाए गए आरोपों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। आगे की नियामकीय प्रक्रिया में संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले में अंतिम निर्णय लिया जाएगा। ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आता है।

फिलहाल सेबी की जाँच ने धेनु बिल्डकॉन से जुड़े कथित 1,000 करोड़ रुपये के कर्ज और 840 करोड़ रुपये के प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट को गंभीर नियामकीय जाँच के दायरे में ला दिया है। 25 करोड़ रुपये की मूल राशि को कथित तौर पर बार-बार घुमाकर बड़े कर्ज का स्वरूप देने का आरोप इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यदि नियामक के प्रथम दृष्टया निष्कर्ष आगे की जाँच में पुष्ट होते हैं,तो यह मामला संबंधित संस्थाओं के बीच वित्तीय संबंधों,कंपनी की वित्तीय रिपोर्टिंग और बाजार में लेनदेन की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। फिलहाल बाजार की नजर सेबी की आगे की कार्रवाई और संबंधित पक्षों के जवाब पर बनी हुई है।