संयुक्त राष्ट्र,20 अगस्त (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और प्रतिबंध व्यवस्था को लेकर भारत ने एक बार फिर पाकिस्तान की भूमिका पर परोक्ष रूप से सवाल उठाए हैं। भारत ने कहा है कि सुरक्षा परिषद द्वारा किसी संगठन या व्यक्ति को आतंकवादी सूची में शामिल करने अथवा सूची से हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी,निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए। इसका इस्तेमाल संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने,आतंकवादियों को वैधता देने या पर्याप्त प्रमाण के बिना किसी संस्था को आतंकवादी घोषित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। भारत ने सुरक्षा परिषद की मौजूदा कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया और कहा कि आतंकवाद से संबंधित सहायक समितियों के कामकाज में लंबे समय से जारी गतिरोध को तत्काल दूर किया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रभारी योजना पटेल ने बुधवार को स्थानीय समयानुसार सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर आयोजित खुली बहस के दौरान भारत का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता अपने साथ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ लेकर आती है और इसका इस्तेमाल किसी देश के संकीर्ण राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों को सूचीबद्ध करने तथा उन्हें प्रतिबंध सूची से हटाने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता लाने की आवश्यकता बताई।
योजना पटेल ने अपने संबोधन में कहा कि सुरक्षा परिषद में किसी देश की मौजूदगी का इस्तेमाल आतंकवादियों को सूची से हटाकर उन्हें वैधता प्रदान करने के लिए नहीं होना चाहिए। इसी तरह,केवल राजनीतिक विचारों के आधार पर,बिना किसी वस्तुनिष्ठ मानदंड और पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य के किसी संस्था को आतंकवादी संगठन घोषित करना भी उचित नहीं है। भारत का यह बयान ऐसे समय आया है,जब आतंकवादी संगठनों और उनके नेताओं को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल करने तथा सूची से हटाने की प्रक्रियाओं को लेकर सुरक्षा परिषद में लगातार राजनीतिक मतभेद देखने को मिलते रहे हैं।
भारत की टिप्पणी को पाकिस्तान की आतंकवाद संबंधी नीतियों की परोक्ष आलोचना के तौर पर देखा जा रहा है। पाकिस्तान इस समय सुरक्षा परिषद का निर्वाचित सदस्य है और आतंकवाद से जुड़े प्रतिबंध तंत्र में उसकी भूमिका को लेकर भारत पहले भी चिंता जताता रहा है। भारत का आरोप रहा है कि पाकिस्तान की धरती से संचालित या वहाँ शरण पाने वाले आतंकवादी संगठनों और उनके नेताओं के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक अड़चनें पैदा होती रही हैं।
आतंकवादी संगठनों को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल करने की प्रक्रिया लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का संवेदनशील मुद्दा रही है। भारत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया है कि किसी संगठन या व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करते समय स्पष्ट प्रमाण और एक समान मानदंड अपनाए जाने चाहिए। भारत का मानना है कि यदि प्रतिबंध व्यवस्था राजनीतिक सौदेबाजी का माध्यम बनती है,तो इससे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई कमजोर होती है और संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है।
इस संदर्भ में पाकिस्तान और चीन की भूमिका भी चर्चा में रही है। इस वर्ष पाकिस्तान और चीन ने बलूच लिबरेशन आर्मी और मजीद ब्रिगेड को संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले आतंकवादी संगठनों के रूप में सूचीबद्ध कराने का प्रयास किया था। हालांकि, अमेरिका,फ्रांस और ब्रिटेन के विरोध के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सका। भारत ने इन घटनाक्रमों पर सीधे किसी देश का नाम लिए बिना यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि प्रतिबंध प्रक्रिया में राजनीतिक हितों के बजाय प्रमाण और स्थापित मानदंडों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
दूसरी ओर,भारत ने चीन पर भी अतीत में आतंकवादियों को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने की प्रक्रिया में अड़चन डालने का आरोप लगाया है। जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े साजिद मीर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के प्रयासों में चीन ने वर्षों तक तकनीकी रोक लगाई थी। बाद में इन मामलों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई आगे बढ़ी। भारत के लिए ये उदाहरण इस बात को रेखांकित करते हैं कि सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध व्यवस्था को राजनीतिक हितों से मुक्त रखना कितना जरूरी है।
योजना पटेल ने सुरक्षा परिषद की सहायक समितियों की स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आतंकवाद और प्रतिबंधों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों को देखने वाली समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति में लंबे समय से देरी हो रही है। उनके अनुसार,आठ महीने बीत जाने के बावजूद सुरक्षा परिषद आतंकवाद-रोधी और प्रतिबंध संबंधी अपनी कई सहायक समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति नहीं कर सकी है। इससे इन निकायों के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
भारत के अनुसार,अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर सुरक्षा परिषद के भीतर आम सहमति नहीं बन पाने के कारण यह गतिरोध कायम है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान प्रतिबंध समिति का नेतृत्व करने की इच्छा रखता है,लेकिन परिषद के भीतर इसको लेकर सहमति नहीं बन पाई है। भारत ने किसी देश को सीधे जिम्मेदार ठहराने के बजाय यह कहा कि समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति में लगातार हो रही देरी से आतंकवाद और प्रतिबंधों से जुड़े महत्वपूर्ण काम प्रभावित हो रहे हैं।
योजना पटेल ने कहा कि हाल के समय में इन सहायक निकायों का कामकाज अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया है और इसका प्रमुख कारण अध्यक्षों की नियुक्ति में देरी है। भारत ने सुरक्षा परिषद से इस गतिरोध को जल्द समाप्त करने और समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। भारत ने इसके लिए स्पष्ट,अंतिम और गैर-परक्राम्य समयसीमा निर्धारित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
भारत के इस रुख को जापान का भी समर्थन मिलता दिखाई दिया। संयुक्त राष्ट्र में जापान के उप-स्थायी प्रतिनिधि मिकानागी तोमोहिरो ने भी सहायक समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति में हो रही देरी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जापान संतुलित,पारदर्शी,प्रभावी और समावेशी परामर्श के जरिए बिना और देरी के सहमति बनाने का आग्रह करता है। इससे संकेत मिलता है कि सुरक्षा परिषद के कई सदस्य इन महत्वपूर्ण संस्थागत पदों पर नियुक्ति में लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को खत्म करना चाहते हैं।
भारत ने केवल आतंकवाद और प्रतिबंध समितियों तक अपनी चिंता सीमित नहीं रखी। योजना पटेल ने संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना अभियानों की कार्यप्रणाली में मौजूद खामियों का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद के फैसलों और उन देशों की वास्तविक परिस्थितियों के बीच कई बार अंतर दिखाई देता है,जो शांति स्थापना अभियानों के लिए सैनिक और पुलिसकर्मी उपलब्ध कराते हैं।
भारत ने विशेष रूप से उन देशों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत बताई,जो संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना मिशनों में सैनिक और पुलिसकर्मी भेजते हैं। योजना पटेल ने कहा कि शांति स्थापना अभियानों में योगदान देने वाले देश केवल सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों तक सीमित नहीं हैं। इसलिए उन्हें भी शांति स्थापना से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों,विशेषकर मिशनों के जनादेश और संसाधनों से संबंधित फैसलों की प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र की शांति स्थापना व्यवस्था में योगदान देने वाले देशों की भूमिका बढ़ाने की माँग करता रहा है। भारत दुनिया के प्रमुख शांति सैनिक योगदान देने वाले देशों में शामिल रहा है। ऐसे में नई दिल्ली का मानना है कि जिन देशों के सैनिक और पुलिसकर्मी जमीन पर जोखिम उठाकर संयुक्त राष्ट्र के मिशनों को सफल बनाने में योगदान देते हैं,उनकी आवाज मिशनों के जनादेश और संसाधनों से जुड़े फैसलों में भी सुनी जानी चाहिए।
योजना पटेल ने सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना को भी कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि परिषद की वर्तमान संरचना दूसरे विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों का परिणाम है और आज की वैश्विक वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती। दूसरे विश्व युद्ध को समाप्त हुए लगभग 80 वर्ष हो चुके हैं और इस दौरान दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की मूल संरचना में व्यापक बदलाव नहीं हुआ है।
भारत ने एक बार फिर सुरक्षा परिषद में सुधार की अपनी पुरानी माँग दोहराई। नई दिल्ली स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सदस्यता के विस्तार की वकालत करता रहा है। भारत का तर्क है कि आज की दुनिया में एशिया,अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों का वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में महत्व बढ़ा है,लेकिन सुरक्षा परिषद की संरचना में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
भारत का मानना है कि सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण,लोकतांत्रिक और प्रभावी बनाने के लिए व्यापक सुधार जरूरी हैं। योजना पटेल ने कहा कि सुधार की प्रक्रिया केवल औपचारिक चर्चाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए पाठ-आधारित वार्ताओं की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और उसमें स्पष्ट लक्ष्य तथा समयसीमा तय करने की जरूरत बताई।
सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए अंतर-सरकारी वार्ताओं की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है,लेकिन इसमें अब तक कोई निर्णायक प्रगति नहीं हो सकी है। भारत का आरोप है कि कुछ देश प्रक्रियागत उपायों का इस्तेमाल करके सुधार संबंधी वार्ता को आगे बढ़ने से रोकते रहे हैं। भारत ने विशेष रूप से पाकिस्तान सहित कुछ देशों के एक छोटे समूह पर इस प्रक्रिया को बाधित करने का आरोप लगाया है। इस समूह की अगुवाई इटली द्वारा किए जाने की बात भारत की ओर से कही गई है।
भारत का कहना है कि सुधार प्रक्रिया को केवल प्रक्रियात्मक मुद्दों में उलझाने के बजाय वास्तविक वार्ता की दिशा में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। नई दिल्ली के अनुसार,यदि संयुक्त राष्ट्र को मौजूदा वैश्विक चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटना है,तो उसकी सबसे शक्तिशाली संस्था को वर्तमान वैश्विक शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के अनुरूप बनाना होगा।
आतंकवाद के मुद्दे पर भारत ने सुरक्षा परिषद से अधिक जवाबदेही और निष्पक्षता की माँग ऐसे समय की है,जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आतंकवादी गतिविधियाँ लगातार सुरक्षा के लिए चुनौती बनी हुई हैं। भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे मानदंड नहीं होने चाहिए। किसी आतंकवादी संगठन या व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई उसकी पहचान,राजनीतिक संबद्धता या किसी देश के साथ संबंधों के आधार पर नहीं,बल्कि उसके आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के प्रमाण के आधार पर होनी चाहिए।
भारत की ताजा टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध व्यवस्था को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त और प्रमाण-आधारित बनाया जाए। आतंकवादियों को सूची में शामिल करने या सूची से बाहर करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता आने से न केवल व्यवस्था की विश्वसनीयता बढ़ेगी,बल्कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग को भी मजबूती मिलेगी।
सुरक्षा परिषद में भारत ने संस्थागत सुधार,आतंकवाद-रोधी तंत्र की प्रभावशीलता और शांति स्थापना अभियानों में योगदान देने वाले देशों की भागीदारी जैसे मुद्दों को एक साथ उठाकर यह संकेत दिया है कि संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली में व्यापक बदलाव की जरूरत है। भारत के अनुसार,केवल नई चुनौतियों पर बयान जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं और प्रक्रियाओं में भी सुधार करना होगा,जिनके जरिए अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले लिए जाते हैं।
ऐसे में आतंकवादी संगठनों की सूची तैयार करने से लेकर प्रतिबंधों को लागू करने,शांति स्थापना मिशनों के लिए संसाधन उपलब्ध कराने और सुरक्षा परिषद की सदस्यता के विस्तार तक,भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल रखे हैं। नई दिल्ली का स्पष्ट संदेश है कि वैश्विक सुरक्षा से जुड़े फैसले कुछ देशों के संकीर्ण राजनीतिक हितों के आधार पर नहीं,बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया,वस्तुनिष्ठ मानदंड और पर्याप्त प्रमाण के आधार पर लिए जाने चाहिए।
भारत के इस रुख का केंद्र आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की विश्वसनीयता और सुरक्षा परिषद की संस्थागत क्षमता को मजबूत करना है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुरक्षा परिषद अपने सहायक निकायों के अध्यक्षों की नियुक्ति से जुड़े गतिरोध को कितनी जल्दी समाप्त करती है और आतंकवादियों की सूची से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाती है। साथ ही,संयुक्त राष्ट्र में सुधार की माँग को लेकर चल रही अंतर-सरकारी वार्ताएँ आगे बढ़ती हैं या नहीं,यह भी वैश्विक शासन व्यवस्था के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा।
