संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका और क्यूबा के बीच तीखी बहस,माइक वॉल्ट्ज और ब्रूनो रोड्रिगेज आमने-सामने (तस्वीर क्रेडिट@monitoreamos)

संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका और क्यूबा के बीच तीखी बहस,माइक वॉल्ट्ज और ब्रूनो रोड्रिगेज आमने-सामने; प्रतिबंधों पर बुधवार को मतदान

न्यूयॉर्क,28 अक्टूबर (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका और क्यूबा के बीच लंबे समय से जारी तनाव मंगलवार को उस समय खुलकर सामने आ गया, जब दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच तीखी जुबानी भिड़ंत हो गई। क्यूबा पर लगाए गए अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर चल रही चर्चा के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधि माइक वॉल्ट्ज और क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज पारिला आमने-सामने आ गए। बहस इतनी बढ़ गई कि महासभा के अध्यक्ष खलीलुर रहमान को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने प्रतिनिधियों से शांति बनाए रखने और सदन की कार्यवाही को नियमों के अनुसार चलने देने की अपील की। हालात को नियंत्रित करने के लिए कुछ समय के लिए बैठक स्थगित भी करनी पड़ी।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है,जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्यूबा के खिलाफ अमेरिका की ओर से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करने की माँग वाले प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है। इस प्रस्ताव पर बुधवार को मतदान होना है। चर्चा के दौरान कई देशों ने अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध करते हुए कहा कि इनका असर क्यूबा की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के जीवन पर पड़ रहा है। वहीं,अमेरिकी प्रतिनिधि ने क्यूबा की सरकार की नीतियों और उसके नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए प्रतिबंधों के खिलाफ प्रस्ताव का समर्थन नहीं करने की अपील की।

महासभा में तनाव उस समय बढ़ा, जब माइक वॉल्ट्ज क्यूबा की सरकार की आलोचना कर रहे थे। उनके संबोधन के दौरान क्यूबा के प्रतिनिधिमंडल ने अपनी मेजें थपथपानी शुरू कर दीं और शोर मचाकर विरोध जताया। देखते ही देखते क्यूबा के कुछ प्रतिनिधि अपनी सीटों से उठकर मंच की ओर बढ़ने लगे। इससे सदन में अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो गई और बहस का केंद्र आर्थिक प्रतिबंधों से हटकर दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच टकराव बन गया।

वॉल्ट्ज ने अपने भाषण में क्यूबा की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि देश की सत्ता में बैठे लोग आम नागरिकों की जरूरतों की कीमत पर अपने हितों को प्राथमिकता देते हैं। अमेरिकी प्रतिनिधि ने क्यूबा के नेतृत्व की कथित संपत्ति और विलासितापूर्ण जीवनशैली का उल्लेख करते हुए कहा कि सदस्य देशों को अमेरिकी प्रतिबंधों की निंदा करने वाले प्रस्ताव का समर्थन नहीं करना चाहिए।

उनके भाषण का उद्देश्य क्यूबा की सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह समझाना था कि प्रतिबंधों को समाप्त करने की माँग पर विचार करते समय क्यूबा के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। हालाँकि, उनके आरोपों पर क्यूबा के प्रतिनिधिमंडल ने तीखी आपत्ति जताई। क्यूबा की ओर से विरोध बढ़ने के साथ ही सदन में तनावपूर्ण माहौल बन गया।

क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज पारिला ने वॉल्ट्ज के संबोधन के दौरान कई बार हस्तक्षेप करने की कोशिश की। उन्होंने सदन की प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने के लिए ‘पॉइंट ऑफ ऑर्डर’ उठाने की मांग की। इस दौरान दोनों प्रतिनिधियों के बीच तनाव साफ दिखाई देने लगा। वॉल्ट्ज मंच से बोल रहे थे,जबकि रोड्रिगेज और क्यूबा के अन्य प्रतिनिधि मंच के सामने नीचे की ओर मौजूद थे।

स्थिति को संभालने के लिए महासभा के अध्यक्ष खलीलुर रहमान ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने प्रतिनिधियों से कार्यवाही में सहयोग करने और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने का आग्रह किया। रहमान ने कहा कि यदि प्रतिनिधि सदन के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने में मदद करेंगे,तो उन्हें नियमानुसार अपनी बात रखने का अवसर दिया जाएगा।

लेकिन उनकी अपील के बावजूद माहौल पूरी तरह शांत नहीं हुआ। वॉल्ट्ज ने रोड्रिगेज की ओर देखते हुए ऊँची आवाज में कहा, “पीछे हट जाओ! यह हवाना नहीं है।” इस टिप्पणी से विवाद और बढ़ गया। क्यूबा के विदेश मंत्री और उनके प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी प्रतिनिधि के रुख पर विरोध जताया,जबकि सदन के अध्यक्ष लगातार सभी पक्षों से अपनी सीटों पर लौटने की अपील करते रहे।

रहमान ने कई बार प्रतिनिधियों को बैठने के लिए कहा। जब स्थिति सामान्य नहीं हुई,तो उन्होंने बैठक को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी जिम्मेदारी महासभा की प्रक्रिया के नियमों को निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से लागू करना है। अध्यक्ष के इस कदम का उद्देश्य सदन में व्यवस्था बहाल करना और आगे की चर्चा को निर्धारित नियमों के अनुसार जारी रखना था।

कुछ ही मिनटों के अंतराल के बाद महासभा की कार्यवाही फिर शुरू हुई। इस बार ब्रूनो रोड्रिगेज को ‘पॉइंट ऑफ ऑर्डर’ के तहत अपनी बात रखने का अवसर मिला। उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वॉल्ट्ज सरासर झूठ बोल रहे हैं। रोड्रिगेज ने आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रतिनिधि क्यूबा की जनता और उसकी सरकार की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं।

क्यूबा के विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में अमेरिकी प्रतिनिधि की टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई। उनके बोलने के दौरान क्यूबा के प्रतिनिधिमंडल ने मेजें थपथपाकर विरोध जारी रखा। सदन में शोर और असहमति का माहौल बना रहा। विवाद उस समय फिर बढ़ गया,जब रोड्रिगेज वॉल्ट्ज के मंच के करीब पहुँच गए और उन्हें झूठा करार दिया।

इस पर अमेरिकी प्रतिनिधि ने क्यूबा के विदेश मंत्री को पीछे हटने के लिए कहा। दोनों पक्षों के बीच बढ़ती तनातनी को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और सदन में व्यवस्था बहाल करने की कोशिश की। इस पूरे घटनाक्रम ने आर्थिक प्रतिबंधों पर केंद्रित चर्चा को एक राजनीतिक टकराव में बदल दिया।

बैठक के दोबारा आगे बढ़ने पर वॉल्ट्ज ने दावा किया कि रोड्रिगेज ने कैमरों और राजनयिकों के सामने उन्हें चुप कराने की कोशिश की थी। उन्होंने इस घटना का उल्लेख करते हुए क्यूबा की राजनीतिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। अमेरिकी प्रतिनिधि ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति क्यूबा की सरकार के कथित कठोर रवैये के बीच खुलकर बोलने का साहस करता है,तो उसके साथ क्या हो सकता है,इस पर विचार किया जाना चाहिए। इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने क्यूबा में राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अपने आरोप दोहराए।

अपने संबोधन के दौरान माइक वॉल्ट्ज ने कुछ तस्वीरें भी दिखाईं। उनके मुताबिक,इन तस्वीरों में कास्त्रो करीब 40 हजार डॉलर कीमत वाली दो रोलेक्स घड़ियाँ पहने हुए दिखाई दे रहे हैं। वॉल्ट्ज ने इन तस्वीरों का इस्तेमाल क्यूबा के नेतृत्व की कथित संपन्नता और विलासितापूर्ण जीवनशैली पर सवाल उठाने के लिए किया।

हालाँकि,उपलब्ध विवरण से यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता कि तस्वीरों में किस कास्त्रो की बात की जा रही थी। संभावना जताई गई कि अमेरिकी प्रतिनिधि का इशारा क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो की ओर था। राउल कास्त्रो,क्यूबा की क्रांति के प्रमुख नेता फिदेल कास्त्रो के भाई हैं और देश के राजनीतिक इतिहास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

वॉल्ट्ज ने तस्वीरों के जरिए यह तर्क रखने की कोशिश की कि क्यूबा के नेतृत्व और आम जनता की आर्थिक परिस्थितियों के बीच अंतर है। दूसरी ओर,क्यूबा के प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी प्रतिनिधि के आरोपों को झूठा और अपमानजनक बताया। इस प्रकार,बहस केवल प्रतिबंधों के आर्थिक प्रभाव तक सीमित नहीं रही,बल्कि दोनों देशों की राजनीतिक व्यवस्था,नेतृत्व और नागरिकों की स्थिति पर आरोप-प्रत्यारोप तक पहुँच गई।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में जिस प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है,उसमें क्यूबा पर लगाए गए अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करने की माँग की गई है। इस प्रस्ताव पर बुधवार को मतदान होना है। क्यूबा लंबे समय से इन प्रतिबंधों को अपनी अर्थव्यवस्था के विकास और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए बड़ी बाधा बताता रहा है। वहीं,अमेरिका अपनी नीतियों का बचाव करते हुए क्यूबा की सरकार और उसके शासन के तौर-तरीकों पर सवाल उठाता रहा है।

हाल के महीनों में क्यूबा पर आर्थिक दबाव और बढ़ने की बात सामने आई है। खास तौर पर तेल की आपूर्ति को लेकर लगाई गई रोक ने दोनों देशों के बीच विवाद को और गहरा किया है। ऊर्जा आपूर्ति किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में तेल की उपलब्धता प्रभावित होने से परिवहन,बिजली उत्पादन और अन्य आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका रहती है। क्यूबा पर लगाए गए प्रतिबंधों के व्यापक प्रभाव को लेकर भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर चिंता जताई जाती रही है।

महासभा में चर्चा के दौरान बोलने वाले अधिकांश देशों ने वाशिंगटन की प्रतिबंध नीति का विरोध किया और क्यूबा के प्रति समर्थन व्यक्त किया। कई प्रतिनिधियों ने जोर दिया कि आर्थिक प्रतिबंधों का असर केवल सरकार तक सीमित नहीं रहता,बल्कि आम नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरतों को भी प्रभावित कर सकता है। हालाँकि,प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका और क्यूबा के बीच मतभेद लंबे समय से बने हुए हैं और दोनों पक्ष इस मुद्दे को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन की ओर से बोलते हुए युगांडा के स्थायी प्रतिनिधि एडोनिया अयेबारे ने अमेरिकी सरकार के हालिया कदमों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उनके समूह को इस वर्ष अमेरिका की ओर से उठाए गए उन कदमों को लेकर गहरी चिंता है,जिनसे प्रतिबंधों को अत्यधिक कठोर स्तर तक बढ़ा दिया गया है।

अयेबारे ने क्यूबा के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई से जुड़ी आशंकाओं का भी उल्लेख किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से क्यूबा पर हमले की योजना बनाए जाने को लेकर फैल रही अटकलों के बीच उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा से अपील की कि वह क्यूबा के खिलाफ सैन्य आक्रामकता को रोकने के प्रयास करे। उन्होंने कहा कि क्यूबा गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक सदस्य है और क्षेत्र में शांति बनाए रखना जरूरी है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन की इस टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि क्यूबा का मुद्दा केवल अमेरिका के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। आर्थिक प्रतिबंधों और संभावित सैन्य तनाव को लेकर अन्य देशों की चिंताएँ भी इस बहस में शामिल हो गई हैं। हालांकि, सैन्य कार्रवाई को लेकर जताई गई आशंका और उसके संबंध में लगाए गए दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है। महासभा में उठाई गई चिंता अपने आप में किसी सैन्य योजना की पुष्टि नहीं करती।

आसियान की ओर से बोलते हुए सिंगापुर के स्थायी प्रतिनिधि बुरहान गफूर ने भी अमेरिकी प्रतिबंधों के मानवीय प्रभाव पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उनका संगठन क्यूबा के लोगों पर इन प्रतिबंधों के असर को लेकर विशेष रूप से चिंतित है। उन्होंने खास तौर पर भोजन,दवाओं और अन्य आवश्यक वस्तुओं तक लोगों की पहुँच का उल्लेख किया।

गफूर की टिप्पणी ने चर्चा को आम नागरिकों की जरूरतों की ओर केंद्रित किया। प्रतिबंधों के समर्थक आम तौर पर इन्हें किसी सरकार पर दबाव बनाने का माध्यम बताते हैं,जबकि आलोचकों का कहना है कि इनके कारण आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसी अंतर के चलते क्यूबा पर अमेरिकी प्रतिबंधों का मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार बहस का विषय बना हुआ है।

महासभा में बुधवार को होने वाला मतदान इस विवाद के अगले महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा रहा है। मतदान के दौरान सदस्य देशों का रुख यह दिखाएगा कि अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की मौजूदा स्थिति क्या है। हालाँकि,महासभा में प्रस्ताव पर समर्थन और अमेरिका की अपनी नीति में बदलाव दो अलग-अलग बातें हैं। प्रस्ताव का परिणाम अपने आप में प्रतिबंधों के तत्काल समाप्त होने की गारंटी नहीं होगा।

मंगलवार की तीखी बहस ने यह जरूर उजागर कर दिया कि अमेरिका और क्यूबा के बीच आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर मतभेद अब भी गहरे हैं। एक ओर अमेरिका क्यूबा की सरकार पर भ्रष्टाचार और राजनीतिक कठोरता के आरोप लगा रहा है,तो दूसरी ओर क्यूबा इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रतिबंधों को अपनी जनता के खिलाफ नुकसानदायक कदम बता रहा है। महासभा में हुई नोकझोंक के बीच अब सबकी निगाहें बुधवार के मतदान पर टिकी हैं,जहाँ सदस्य देशों को इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर अपना रुख स्पष्ट करना होगा।