संयुक्त राष्ट्र,1 जनवरी (युआईटीवी)- दुनिया की सबसे बड़ी और प्रभावशाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था माने जाने वाले संयुक्त राष्ट्र के सामने इस समय अस्तित्व और कार्यकुशलता,दोनों से जुड़ी गंभीर चुनौतियाँ खड़ी होती दिखाई दे रही हैं। वर्ष 2026 की शुरुआत ऐसे दौर में हो रही है,जब संयुक्त राष्ट्र को न केवल अपने नियमित बजट में कटौती करनी पड़ी है,बल्कि बड़ी संख्या में नौकरियों में भी छंटनी करनी पड़ रही है। संगठन ने 3.45 अरब डॉलर के बजट के साथ नए साल में प्रवेश किया है,जो पिछले साल की तुलना में लगभग 7.25 प्रतिशत कम है। इसके साथ ही 19 प्रतिशत नौकरियों में कमी का निर्णय यह संकेत देता है कि आर्थिक दबाव अब उस स्तर तक पहुँच चुका है,जहाँ संस्थागत ढाँचे को भी पुनर्गठित करना अनिवार्य हो गया है।
महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के प्रस्ताव के आधार पर महासभा ने जिस बजट को मंजूरी दी है,वह शुरुआत में सुझाए गए 3.238 अरब डॉलर के अनुमान से थोड़ा अधिक जरूर है,लेकिन फिर भी यह कटौती का बोझ कम नहीं करता। यह बजट मुख्यतः संयुक्त राष्ट्र के प्रशासनिक कार्यों के संचालन के लिए है। शांति मिशनों,विशेष कार्यक्रमों और यूनेस्को,विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अलग-अलग संस्थाओं के बजट का निर्धारण अलग से किया जाता है। इसके बावजूद नियमित बजट में आई यह गिरावट,भविष्य के लिए कई तरह के सवाल खड़े करती है—क्या संसाधनों में कटौती के साथ संस्था अपने वैश्विक दायित्वों को समान प्रभाव के साथ निभा पाएगी या फिर निर्णय लेने और कार्यक्रम चलाने की उसकी क्षमता प्रभावित होगी?
बजट पर सहमति बनाना आसान नहीं था। 193 सदस्य देशों के बीच लंबी चर्चाओं और विचार-विमर्श के बाद जो दस्तावेज सामने आया,उसे संयुक्त राष्ट्र प्रशासन के लिए एक “असाधारण उपलब्धि” बताया गया। सहायक महासचिव चंद्रमौली रामनाथन ने स्पष्ट कहा कि इस समझौते को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए,क्योंकि सभी देशों की आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताएँ अलग-अलग हैं। फिर भी, यह सच्चाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि कटौती का असर सीधा मानव संसाधन पर पड़ने जा रहा है। संगठन के भीतर 2,900 पद खत्म किए जाने की तैयारी हो चुकी है,जबकि लगभग 1,000 कर्मचारी स्वेच्छा से सेवा छोड़ने पर सहमत हो चुके हैं। इससे कार्यबल में कमी आएगी और कई विभागों को नई संरचना में काम करना पड़ेगा।
भारत,जो संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट में 1.016 प्रतिशत का योगदान देता है,इस प्रक्रिया का एक जिम्मेदार साझेदार बना हुआ है। किसी देश की हिस्सेदारी सकल राष्ट्रीय आय,जनसंख्या और अन्य आर्थिक मानकों के आधार पर तय होती है। बजट के अंतिम रूप देने से पहले जब दो संशोधन प्रस्ताव आए—पहला रूस की ओर से,जो सीरिया में मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच से जुड़ा था और दूसरा क्यूबा का,जो नागरिकों की सुरक्षा से संबंधित महासचिव के सलाहकार की भूमिका पर केंद्रित था,भारत ने इन दोनों प्रस्तावों पर मतदान से दूरी बनाए रखी। यह निर्णय भारत के संतुलित कूटनीतिक रुख का संकेत देता है,जहाँ वह विवादित या संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों पर सतर्कता से अपनी स्थिति तय करता है।
संयुक्त राष्ट्र के वित्तीय संकट की कहानी केवल अंदरूनी कटौतियों तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका बड़ा कारण सदस्य देशों द्वारा समय पर योगदान न देना भी है। एक दिसंबर तक बकाया राशि 1.586 अरब डॉलर तक पहुँच गई थी,जिसमें 2024 के 709 मिलियन डॉलर और 2025 के 877 मिलियन डॉलर शामिल थे। यह बकाया राशि संगठन की योजनाओं और नियमित गतिविधियों पर अनिश्चितता का साया डालती है। इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र बार-बार देशों से अपील कर रहा है कि वे अपने योगदान को समय पर जमा करें,ताकि वैश्विक कार्यक्रमों और मानवीय अभियानों का संचालन बाधित न हो।
इस पूरे परिदृश्य में अमेरिका की भूमिका स्वाभाविक रूप से चर्चा के केंद्र में है। संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट में 22 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ वह सबसे बड़ा योगदानकर्ता है,जबकि चीन 20 प्रतिशत योगदान के साथ दूसरे स्थान पर है,लेकिन अमेरिकी राजनीति और प्रशासनिक प्राथमिकताओं में आए बदलावों का सीधा असर संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय स्थिति पर दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के आलोचक रहे हैं और उन्होंने 2025 के लिए स्वीकृत राशि अब तक जारी नहीं की। इससे संगठन की आर्थिक कमजोरी और गहराई। अब ट्रंप ने अगले साल के बजट में अमेरिका के योगदान को घटाकर 610 मिलियन डॉलर करने का प्रस्ताव दिया है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है,तो संयुक्त राष्ट्र की राजकोषीय स्थिति और अधिक नाजुक हो सकती है। परिणामस्वरूप,अभी जो बजट सर्वसम्मति से पारित हुआ है,वह लंबे समय तक टिक पाएगा या नहीं,इस पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का मूल उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति,सहयोग और विकास के साझा एजेंडे को आगे बढ़ाना था। समय के साथ उसकी भूमिका और दायित्व दोनों बढ़े हैं—मानवीय सहायता,शरणार्थी संकट,जलवायु परिवर्तन,स्वास्थ्य सुरक्षा,डिजिटल शासन और मानवाधिकार जैसे नए विषयों ने एजेंडा को और जटिल बना दिया है,लेकिन इन बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच यदि वित्तीय संसाधन घटने लगें,तो प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन अपरिहार्य हो जाता है। कटौती का सीधा असर कार्यक्रमों की गति,विशेषज्ञता के विकास और जमीनी स्तर पर काम करने वाली टीमों पर पड़ सकता है। यह भी संभव है कि कई ऐसी पहलें,जो लंबे समय के लाभ के लिए चल रही थीं,उन्हें अस्थायी रूप से रोकना पड़े या उनका दायरा सीमित कर दिया जाए।
वर्तमान संकट से यह भी स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के लिए वित्तीय स्वायत्तता और स्थिरता का प्रश्न पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। जब सदस्य देश अपनी घरेलू आर्थिक चुनौतियों के बीच अंतर्राष्ट्रीय योगदान को कम प्राथमिकता देते हैं,तो वैश्विक मंचों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ में यह चिंता इसलिए और गहरी हो जाती है,क्योंकि उसकी भूमिका केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है—वह युद्धग्रस्त क्षेत्रों में राहत पहुँचाने,शांति स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाने और विकासशील देशों में बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने में भी सक्रिय रहता है।
फिर भी, बजट पर सहमति और संस्थागत पुनर्गठन के निर्णय को केवल नकारात्मक रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है,जहाँ संगठन अपने कामकाज को अधिक पारदर्शी,कुशल और परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। संसाधनों की कमी अक्सर संस्थाओं को प्राथमिकताएँ तय करने और बेकार खर्च कम करने के लिए प्रेरित करती है। यदि संयुक्त राष्ट्र इस संकट को एक सुधार प्रक्रिया में बदलने में सफल होता है,तो संभव है कि भविष्य में वह और अधिक सक्षम तथा उत्तरदायी संस्था के रूप में उभरे।
हालाँकि,इसके लिए सदस्य देशों का भरोसा और सहयोग आवश्यक है। केवल बजट के दस्तावेज पारित कर देने भर से समस्या का समाधान नहीं होगा। समय पर फंडिंग, स्पष्ट जवाबदेही और राजनीतिक इच्छाशक्ति—तीनों का संतुलित मेल ही वैश्विक संस्था को मजबूत बनाए रख सकता है। आज जब दुनिया अनेक संघर्षों,आर्थिक अस्थिरताओं और मानवीय संकटों से जूझ रही है,तब संयुक्त राष्ट्र का कमजोर पड़ना न सिर्फ संगठन के लिए,बल्कि पूरे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय है।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि घटे हुए बजट और सीमित संसाधनों के साथ संयुक्त राष्ट्र अपने कार्यक्रमों को किस तरह आगे बढ़ाता है। क्या सदस्य देश बकाया राशि समय पर जमा कर संस्था को राहत देंगे या फिर योगदान में कटौती का सिलसिला और तेज होगा? क्या अमेरिका अपने रुख में नरमी लाएगा या फिर वित्तीय दबाव को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करेगा? इन सभी सवालों के बीच एक सच्चाई साफ है—यह दौर संयुक्त राष्ट्र के लिए एक बड़ी परीक्षा का समय है। इस परीक्षा में उसकी सफलता या विफलता,दोनों का असर आने वाले वर्षों में वैश्विक शासन की दिशा और स्वरूप पर गहरा पड़ने वाला है।
