अमेरिका ने ग्रीनलैंड के साथ नए समझौते के ज़रिए आर्कटिक में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई

अमेरिका ने ग्रीनलैंड के साथ नए समझौते के ज़रिए आर्कटिक में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई

वाशिंगटन,23 सितंबर (युआईटीवी)- रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार,अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए वह दक्षिण में कोल्ड वॉर के समय के एक पुराने बेस पर वापस लौटेगा और द्वीप के पूर्वी तट पर एक और जगह पर अपनी मौजूदगी बनाएगा।

यह योजना अमेरिका,डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच सुरक्षा से जुड़ी एक नई व्यवस्था का हिस्सा है। उम्मीद है कि तीनों पक्ष मंगलवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान इस समझौते को औपचारिक रूप देंगे।

इसमें शामिल जगहों में से एक दक्षिणी ग्रीनलैंड में नारसारसुआक है। इस इलाके में कभी अमेरिकी सेना का ‘ब्लूई वेस्ट वन’ नाम का बेस हुआ करता था,जिसे 1950 के दशक में बंद कर दिया गया था। दूसरी जगह पूर्वी ग्रीनलैंड में मेस्टर्सविग है,जहाँ अभी डेनमार्क की स्पेशल फोर्स यूनिट ‘सिरियस डॉग स्लेज पेट्रोल’ काम करती है।

जब यह रिपोर्ट छपी थी,तब समझौते की सटीक शर्तें सार्वजनिक नहीं की गई थीं। बातचीत से जुड़े लोगों का कहना है कि समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर होने से पहले कुछ शर्तों में बदलाव किया जा सकता है।

यह प्रस्तावित सैन्य विस्तार ग्रीनलैंड को लेकर महीनों से चल रहे तनाव और रणनीतिक रूप से अहम इस आर्कटिक द्वीप पर अपनी भूमिका बढ़ाने में वॉशिंगटन की दिलचस्पी के बाद हो रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार ग्रीनलैंड पर ज़्यादा अमेरिकी नियंत्रण की इच्छा जताई है। उनके पहले के बयानों—जिनमें आर्थिक या सैन्य दबाव डालने की संभावना से इनकार न करने जैसी बातें शामिल थीं—की वजह से डेनमार्क और नाटो
के दूसरे सदस्यों के साथ तनाव बढ़ा था।

यह नया समझौता सुरक्षा के एक बड़े ढांचे के तहत पेश किया जा रहा है। डेनमार्क ने कहा है कि आर्कटिक की सुरक्षा नाटो से जुड़ी रहेगी,न कि यह सिर्फ़ वॉशिंगटन और कोपेनहेगन के बीच का कोई इंतज़ाम बनेगा।

ग्रीनलैंड,उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच एक अहम भौगोलिक स्थिति में है,जिससे यह आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक में गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। इसकी लोकेशन ने इस द्वीप को आर्कटिक की सुरक्षा और रक्षा से जुड़ी व्यापक चर्चाओं का एक अहम हिस्सा भी बना दिया है।

अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में पिटुफ़िक स्पेस बेस चलाता है। हालाँकि,शीत युद्ध के दौरान इस द्वीप पर अमेरिका की सैन्य मौजूदगी काफी ज़्यादा थी; उस समय वहाँ 17 ठिकाने थे और 10,000 से ज़्यादा सैनिक तैनात थे। आज,पिटुफ़िक ग्रीनलैंड में बचा हुआ एकमात्र स्थायी अमेरिकी सैन्य ठिकाना है,जहाँ लगभग 150 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।

अगर इस समझौते को बताई गई बातों के अनुसार लागू किया जाता है,तो यह मौजूदा व्यवस्था की तुलना में ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना की मौजूदगी का काफी विस्तार होगा।

हालाँकि,कई बातें—जैसे कि सैनिकों की संख्या, उपकरण और नारसारसुअक और मेस्टर्सविग में सौंपे जा सकने वाले खास सैन्य काम—तुरंत साफ नहीं हो पाईं।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों ने बताई गई व्यवस्था की सभी बातों की सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं की थी,जबकि व्हाइट हाउस ने भी समझौता फाइनल होने से पहले कोई खास जानकारी देने से इनकार कर दिया।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है,जब नाटो और इस इलाके में काम करने वाले दूसरे देशों के लिए आर्कटिक की सुरक्षा का महत्व बढ़ता जा रहा है। इसलिए,अंतिम समझौते और उसके लागू होने से ग्रीनलैंड में अमेरिका की भविष्य की भूमिका के बारे में और स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।