नई दिल्ली,4 फरवरी (युआईटीवी)- बॉलीवुड अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने अपनी छवि,नाम और पहचान के कथित दुरुपयोग को लेकर एक अहम कानूनी लड़ाई की शुरुआत कर दी है। अभिनेता ने अपने पर्सनैलिटी राइट्स यानी व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विवेक ओबेरॉय की ओर से उनकी वकील सना रईस खान ने अदालत में याचिका दाखिल की है,जिसमें आरोप लगाया गया है कि कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स,वेबसाइट्स और ऑनलाइन माध्यमों पर अभिनेता की अनुमति के बिना उनके नाम,तस्वीर,आवाज और पहचान से जुड़े अन्य तत्वों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह मामला न केवल एक सेलेब्रिटी के अधिकारों से जुड़ा है,बल्कि डिजिटल युग में निजता और गरिमा की रक्षा से जुड़े व्यापक सवाल भी खड़े करता है।
याचिका में विवेक ओबेरॉय ने अदालत को बताया है कि उनके व्यक्तित्व का इस्तेमाल कई बार व्यावसायिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किया गया है। ऐसे मामलों में न तो उनसे अनुमति ली गई और न ही यह देखा गया कि इस तरह के उपयोग से उनकी सार्वजनिक छवि पर क्या असर पड़ेगा। अभिनेता का कहना है कि इस अनधिकृत इस्तेमाल से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा है और यह उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि एक सार्वजनिक व्यक्ति होने का मतलब यह नहीं है कि कोई भी उनकी पहचान का मनमाना उपयोग कर सके।
विवेक ओबेरॉय ने अपनी याचिका में इस बात पर जोर दिया है कि नाम,चेहरा,आवाज और व्यक्तित्व से जुड़े अन्य तत्व किसी भी व्यक्ति की पहचान का मूल हिस्सा होते हैं। भले ही वह व्यक्ति फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा हो या किसी अन्य सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय हो,लेकिन उसकी पहचान पर पहला और कानूनी अधिकार उसी का होता है। अभिनेता का तर्क है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दौर में उनकी लोकप्रियता का फायदा उठाकर कई संस्थाएँ और व्यक्ति अनुचित लाभ कमा रहे हैं,जो कानून के खिलाफ है।
याचिका में आधुनिक तकनीकों,खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। विवेक ओबेरॉय ने कहा है कि आज के समय में किसी भी सेलेब्रिटी की तस्वीर या आवाज को तकनीक के जरिए इस तरह से बदला जा सकता है कि वह असली लगे। इस तरह के कंटेंट का इस्तेमाल न केवल विज्ञापनों और प्रमोशनल गतिविधियों में किया जा रहा है,बल्कि कई बार इसे भ्रामक और आपत्तिजनक संदर्भों में भी पेश किया जाता है। अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई,तो इससे आर्थिक नुकसान के साथ-साथ सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।
अभिनेता ने अदालत को यह भी स्पष्ट किया है कि उनकी यह कानूनी पहल रचनात्मक अभिव्यक्ति या पत्रकारिता की स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं है। विवेक ओबेरॉय का कहना है कि वह अभिव्यक्ति की आज़ादी का सम्मान करते हैं और मीडिया की भूमिका को भी समझते हैं। उनकी माँग केवल इतनी है कि विज्ञापन,प्रमोशन,डिजिटल कंटेंट या किसी भी व्यावसायिक गतिविधि में उनकी छवि या पहचान का इस्तेमाल करने से पहले उनकी स्पष्ट और लिखित सहमति ली जाए। बिना अनुमति इस तरह का उपयोग न केवल अनैतिक है,बल्कि कानूनन भी गलत है।
विवेक ओबेरॉय की वकील सना रईस खान ने अदालत के समक्ष दलील दी कि पर्सनैलिटी राइट्स भारतीय कानून के तहत व्यक्ति की गरिमा,निजता और आत्मसम्मान से गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि किसी सेलेब्रिटी की लोकप्रियता का गलत फायदा उठाकर मुनाफा कमाना न सिर्फ नैतिक रूप से अनुचित है, बल्कि यह कानूनी उल्लंघन भी है। वकील ने यह भी कहा कि अगर अदालतें ऐसे मामलों में सख्त और स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं देतीं,तो भविष्य में इस तरह के विवाद और अधिक बढ़ सकते हैं,खासकर तब जब डिजिटल तकनीकें तेजी से विकसित हो रही हैं।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है,जब भारत में पर्सनैलिटी राइट्स को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है। हाल के वर्षों में कई जाने-माने कलाकार,खिलाड़ी और सार्वजनिक हस्तियाँ अपनी छवि और पहचान के अनधिकृत इस्तेमाल के खिलाफ अदालत का रुख कर चुकी हैं। सोशल मीडिया,डिजिटल विज्ञापनों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। कई बार किसी सेलेब्रिटी की तस्वीर या नाम का इस्तेमाल ऐसे उत्पादों या सेवाओं के प्रचार में किया जाता है,जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं होता,लेकिन आम लोग यह मान लेते हैं कि उस व्यक्ति ने उस ब्रांड या संदेश का समर्थन किया है।
विवेक ओबेरॉय का यह कदम न केवल उनके व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा से जुड़ा है,बल्कि यह डिजिटल युग में कानून की भूमिका पर भी सवाल उठाता है। अगर अदालत इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करती है,तो इससे न सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री,बल्कि अन्य क्षेत्रों से जुड़े सार्वजनिक व्यक्तियों को भी राहत मिल सकती है। यह मामला इस बात की भी याद दिलाता है कि तकनीक के विकास के साथ-साथ कानून और समाज को भी नए खतरों के प्रति सतर्क रहना होगा।
अब सबकी निगाहें दिल्ली हाई कोर्ट पर टिकी हैं,जहाँ इस याचिका पर सुनवाई के दौरान यह तय होगा कि पर्सनैलिटी राइट्स की सीमा क्या होगी और डिजिटल दुनिया में किसी व्यक्ति की पहचान की रक्षा कैसे की जाएगी। विवेक ओबेरॉय की यह पहल आने वाले समय में ऐसे कई मामलों के लिए मिसाल बन सकती है।
