सुप्रीम कोर्ट

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में 16 अक्टूबर को सुनवाई,लंबित अपीलों के निपटारे पर होगा विचार

नई दिल्ली,9 अक्टूबर (युआईटीवी)- पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। मतदाता सूची में दोबारा नाम शामिल कराने के लिए अपील करने वाले लोगों की याचिकाओं पर अदालत 16 अक्टूबर को सुनवाई करेगी। याचिकाकर्ताओं ने माँग की है कि अपीलीय न्यायाधिकरणों को लंबित मामलों का जल्द निपटारा करने का निर्देश दिया जाए,ताकि पात्र मतदाता नवंबर में प्रस्तावित नगर निगम चुनावों में अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकें। मामले की अहमियत इसलिए भी बढ़ गई है,क्योंकि बड़ी संख्या में अपीलों पर अब तक फैसला नहीं हो पाया है।

सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि एसआईआर से जुड़े अपीलीय न्यायाधिकरणों के सामने बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। पेश किए गए विवरण के अनुसार,लंबित अपीलों की संख्या करीब 1.70 लाख बताई गई। वहीं,राज्य की ओर से यह भी जानकारी दी गई कि पिछले छह महीनों में लगभग 1.20 लाख मामलों का निपटारा किया जा सका है। नवंबर में नगर निगम चुनाव प्रस्तावित होने के कारण लंबित मामलों को जल्द सुलझाने की जरूरत पर जोर दिया गया। हालाँकि, लंबित मामलों और निपटाए गए मामलों के आँकड़ों को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं,जिनकी सटीक स्थिति आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट होगी।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मतदाता सूची से नाम हटने के कारण उन्हें आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान करने से वंचित होना पड़ सकता है। इसी आशंका को देखते हुए उन्होंने न्यायालय से अपीलों की सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध किया है। अदालत के समक्ष यह मुद्दा भी उठाया गया कि जब चुनाव की तारीख नजदीक हो, तब मतदाता सूची से संबंधित विवादों का समय पर समाधान करना क्यों जरूरी है। यदि किसी पात्र मतदाता की अपील का फैसला चुनाव से पहले नहीं हो पाता,तो उसके लिए मतदान का अवसर प्रभावित हो सकता है।

इस मामले में पश्चिम बंगाल के पांच मतदाताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण पेश हुए। याचिका में दावा किया गया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए, लेकिन उन्हें इस संबंध में कोई नोटिस नहीं दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि अपीलीय न्यायाधिकरणों को उनकी अपीलों पर जल्द निर्णय देना चाहिए,ताकि वे नवंबर में होने वाले कोलकाता और हावड़ा नगर निगम चुनावों में मतदान कर सकें।

याचिका का मुख्य उद्देश्य लंबित अपीलों के शीघ्र निपटारे के साथ पात्र मतदाताओं के मतदान के अधिकार की रक्षा करना है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज होना चुनाव में भाग लेने की बुनियादी शर्त है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति का नाम हटाने के फैसले को चुनौती दी गई है,तो उस अपील पर समय रहते निर्णय होना चाहिए। खासकर उन क्षेत्रों में,जहाँ निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं,मामलों के निपटारे में देरी से संबंधित मतदाताओं के लिए व्यावहारिक कठिनाई पैदा हो सकती है।

सुनवाई के दौरान मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए दायर अपीलों के नतीजों का भी उल्लेख किया गया। अदालत को बताया गया कि नाम जोड़ने से संबंधित एक लाख से अधिक अपीलों पर निर्णय हो चुका है और इनमें लगभग 93 प्रतिशत आवेदक पात्र पाए गए हैं। इस जानकारी के बाद यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि जिन लोगों को पात्र माना गया है,उनके नाम मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया कितनी तेजी से पूरी की जा सकती है। हालाँकि,पात्र पाए गए आवेदकों का अनुपात अपने आप में यह साबित नहीं करता कि हर मामले में नाम हटाने का फैसला गलत था। प्रत्येक अपील का निर्णय संबंधित तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर होना जरूरी है।

नवंबर में होने वाले नगर निगम चुनावों को ध्यान में रखते हुए अदालत इस बात पर विचार कर सकती है कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने वाली अपीलों को प्राथमिकता दी जाए या नहीं। खासकर कोलकाता और हावड़ा जैसे उन क्षेत्रों में,जहाँ चुनाव प्रस्तावित हैं, समय पर निर्णय लेने की आवश्यकता पर चर्चा हो सकती है। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पात्र मतदाताओं की अपीलों पर चुनाव से पहले विचार किया जा सके और प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न हो।

इसके अलावा,सुप्रीम कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जिन मतदाताओं की अपीलें अभी लंबित हैं, क्या उन्हें नगर निगम चुनावों में मतदान करने की अनुमति दी जा सकती है। इस विषय पर अंतिम स्थिति अदालत के निर्देशों और लागू चुनावी नियमों के आधार पर स्पष्ट होगी। केवल अपील लंबित होने से मतदान की अनुमति स्वतः मिल जाएगी, ऐसा मानना उचित नहीं होगा। इसके लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों और मतदाता सूची की स्थिति को ध्यान में रखना होगा।

पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर उठे इस विवाद ने मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिकों के मतदान के अधिकार के बीच संतुलन का सवाल फिर से सामने ला दिया है। एक ओर चुनाव प्रक्रिया के लिए मतदाता सूची का सही होना आवश्यक है,वहीं दूसरी ओर पात्र नागरिकों के नाम गलत तरीके से हटने की शिकायतों का समय पर समाधान भी जरूरी है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता, उचित प्रक्रिया और समयबद्ध सुनवाई की अहम भूमिका होती है।

अब 16 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें रहेंगी। अदालत लंबित अपीलों के जल्द निपटारे,चुनाव से पहले नाम शामिल करने की प्रक्रिया और अपीलकर्ताओं को मतदान का अवसर देने से जुड़े सवालों पर विचार कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से यह स्पष्ट होने में मदद मिल सकती है कि नवंबर में होने वाले नगर निगम चुनावों से पहले इन मामलों को किस तरह आगे बढ़ाया जाएगा।