संयुक्त राष्ट्र,21 अक्टूबर (युआईटीवी)- अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य गतिविधियों और हथियारों की तैनाती को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ रही है। इसी बीच भारत ने बाहरी अंतरिक्ष को हथियारों की होड़ से बचाने के लिए एक व्यापक,कानूनी रूप से बाध्यकारी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य संधि बनाने की वकालत की है। भारत का मानना है कि अंतरिक्ष में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए ऐसे वैश्विक नियम जरूरी हैं, जिन्हें सभी देश स्वीकार करें और जिनके पालन की पुष्टि भी की जा सके। राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने मंगलवार को इस मुद्दे पर भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि अंतरिक्ष में हथियारों से जुड़े खतरों पर किसी एक पहलू को चुनकर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके बजाय सभी संभावित जोखिमों, गलतफहमियों और सैन्य गतिविधियों से पैदा होने वाली चुनौतियों पर एक साथ विचार करना जरूरी है।
सुधा मूर्ति के अनुसार,भारत ऐसे अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज को प्राथमिकता देता है, जो कानूनी रूप से बाध्यकारी हो,सभी देशों के लिए स्वीकार्य हो और बहुपक्षीय बातचीत के जरिए तैयार किया गया हो। उन्होंने कहा कि बाहरी अंतरिक्ष की सुरक्षा और स्थिरता को बनाए रखने के लिए केवल राजनीतिक घोषणाएँ या स्वैच्छिक प्रतिबद्धताएँ पर्याप्त नहीं हैं। एक ऐसा साझा ढाँचा होना चाहिए,जो देशों के बीच भरोसा बढ़ाए और अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ को रोकने के लिए स्पष्ट आधार तैयार करे।
उन्होंने यह भी कहा कि अंतरिक्ष में सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते समय खतरों,गलत आकलन और बल प्रयोग की परिभाषा जैसे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय केवल कुछ चुनिंदा खतरों पर ध्यान देगा और अन्य जोखिमों को छोड़ देगा,तो इससे समस्या का समाधान होने के बजाय स्थिति और जटिल हो सकती है।
भारत ने अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने से संबंधित प्रस्तावित संधि पर बातचीत के लिए संयुक्त राष्ट्र के निरस्त्रीकरण सम्मेलन को उपयुक्त मंच बताया है। यह सम्मेलन जिनेवा में स्थित है और निरस्त्रीकरण तथा हथियार नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर बहुपक्षीय चर्चा के लिए स्थापित किया गया था।
सुधा मूर्ति ने कहा कि अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने के उपायों और उन्हें लागू करने के तरीकों को लेकर देशों के बीच अभी भी मतभेद मौजूद हैं। ऐसे में सभी पक्षों को बातचीत के लिए एक साझा मंच पर लाना जरूरी है। भारत बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने के लिए तैयार किए गए मसौदा समझौते को आगे की चर्चा का आधार मानता है।
भारत का रुख यह संकेत देता है कि अंतरिक्ष में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल कुछ देशों के बीच समझौता पर्याप्त नहीं होगा। इस दिशा में ऐसा ढाँचा जरूरी है,जिसमें विभिन्न देशों की चिंताओं और सुरक्षा हितों को ध्यान में रखा जाए। साथ ही,नियमों को इस तरह तैयार किया जाए कि उनका पालन करना संभव हो और सभी देशों के लिए समान मानक लागू हों।
अंतरिक्ष में सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करना इसलिए भी कठिन है,क्योंकि कई तकनीकों का इस्तेमाल नागरिक और सैन्य,दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। संचार उपग्रह,पृथ्वी की निगरानी करने वाली प्रणालियाँ,नेविगेशन उपकरण और अंतरिक्ष में इस्तेमाल होने वाली अन्य तकनीकें आम नागरिकों के साथ-साथ सेनाओं के लिए भी उपयोगी हैं।
सुधा मूर्ति ने कहा कि दोहरे उपयोग वाली अंतरिक्ष तकनीकें और उनसे जुड़ी संपत्तियाँ अब वास्तविकता बन चुकी हैं। ऐसे में यह तय करना आसान नहीं है कि किसी उपकरण या गतिविधि का उद्देश्य पूरी तरह नागरिक है या उसके सैन्य इस्तेमाल की भी संभावना है। यही स्थिति अंतर्राष्ट्रीय नियम बनाने की प्रक्रिया को जटिल बनाती है।
यदि कोई देश अंतरिक्ष में अपनी क्षमताओं का विस्तार करता है,तो दूसरे देश उसे अपनी सुरक्षा के लिए संभावित चुनौती के रूप में देख सकते हैं। इसके जवाब में वे भी अपनी सैन्य तैयारियां बढ़ा सकते हैं। इस तरह एक देश की सुरक्षा बढ़ाने के लिए उठाया गया कदम दूसरे देशों में आशंका पैदा कर सकता है और हथियारों की प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है।
भारत का कहना है कि ऐसे जोखिमों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। नियम बनाते समय अंतरिक्ष में मौजूद संपत्तियों की सुरक्षा, सैन्य गतिविधियों की पारदर्शिता और बल प्रयोग से जुड़े सवालों को एक साथ देखना जरूरी है।
अंतरिक्ष के सैन्य इस्तेमाल को लेकर बहस उस समय और तेज हुई,जब अमेरिकी वायु सेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने इस महीने की शुरुआत में कहा कि अमेरिका ने कक्षा में अंतरिक्ष नियंत्रण से जुड़े हथियार तैनात किए हैं। हालाँकि,उन्होंने इन हथियारों की प्रकृति और क्षमताओं के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी।
अमेरिका की इस स्वीकारोक्ति ने अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा को लेकर चल रही चर्चाओं को नया संदर्भ दिया है। अंतरिक्ष में तैनात सैन्य प्रणालियों का इस्तेमाल विरोधी देशों की क्षमताओं को सीमित करने,उपग्रहों को प्रभावित करने या अंतरिक्ष में अपने हितों की रक्षा करने के लिए किया जा सकता है। हालाँकि,किसी विशेष प्रणाली की वास्तविक भूमिका और क्षमता का आकलन उसके बारे में उपलब्ध तकनीकी जानकारी के आधार पर ही किया जा सकता है।
अंतरिक्ष में उपग्रहों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। संचार,मौसम की जानकारी, नेविगेशन, आपदा प्रबंधन और सैन्य संचालन जैसी गतिविधियां उपग्रहों पर निर्भर करती हैं। ऐसे में यदि किसी देश की अंतरिक्ष संपत्तियों को निशाना बनाया जाता है या उनकी कार्यक्षमता बाधित होती है,तो उसका असर केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। इससे नागरिक सेवाएँ और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे भी प्रभावित हो सकते हैं।
इसी वजह से भारत अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नियम तय करने की जरूरत पर जोर दे रहा है।
अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने के लिए चीन और रूस ने वर्ष 2008 में एक मसौदा संधि पेश की थी। इस प्रस्ताव का उद्देश्य बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय नियम स्थापित करना था। हालाँकि,इस मसौदे को लेकर प्रमुख देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई और अमेरिका ने इसका विरोध किया।
अमेरिका की ओर से इस प्रस्ताव पर कई आपत्तियाँ उठाई गई थीं। उसका कहना था कि मसौदे की भाषा स्पष्ट नहीं है और इसमें पृथ्वी पर तैनात ऐसे हथियारों से पैदा होने वाले खतरे को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया है,जिनका इस्तेमाल उपग्रहों को नष्ट करने या निष्क्रिय करने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा,अमेरिका ने प्रस्तावित व्यवस्था में सत्यापन की क्षमता को भी अपर्याप्त बताया था।
यह विवाद अंतरिक्ष में हथियार नियंत्रण से जुड़ी एक बुनियादी चुनौती को उजागर करता है। यदि कोई समझौता केवल अंतरिक्ष में तैनात हथियारों पर प्रतिबंध लगाता है,लेकिन पृथ्वी से संचालित उन प्रणालियों को शामिल नहीं करता जो अंतरिक्ष संपत्तियों को निशाना बना सकती हैं, तो उसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं। दूसरी ओर,किसी संधि के दायरे को बहुत व्यापक बनाने से उसके नियमों पर सहमति बनाना भी कठिन हो सकता है।
भारत की ओर से व्यापक और कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते पर जोर इसी व्यापक चुनौती के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हालाँकि,प्रस्तावित संधि के अंतिम स्वरूप पर सहमति बनाने के लिए देशों को परिभाषाओं,दायरे और सत्यापन व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा करनी होगी।
अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मतभेद केवल पारंपरिक या उपग्रह-रोधी प्रणालियों तक सीमित नहीं हैं। अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों की तैनाती को रोकना भी वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
वर्ष 2024 में अमेरिका और जापान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों की तैनाती रोकने से संबंधित एक प्रस्ताव पेश किया था। हालाँकि,रूस ने इस प्रस्ताव को वीटो कर दिया, जिसके कारण वह आगे नहीं बढ़ सका। इस घटनाक्रम से पता चलता है कि अंतरिक्ष में हथियारों के नियंत्रण पर देशों के बीच सहमति बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है।
अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों की तैनाती से जुड़े संभावित खतरे व्यापक हैं। ऐसी स्थिति में अंतरिक्ष आधारित सेवाओं, वैश्विक संचार और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा,अंतरिक्ष में किसी हथियार के इस्तेमाल या सैन्य कार्रवाई से पैदा होने वाली अनिश्चितता देशों के बीच तनाव बढ़ा सकती है।
भारत का दृष्टिकोण है कि अंतरिक्ष की सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग खतरों पर अलग-अलग तरीके से ध्यान देने के बजाय एक व्यापक ढाँचे के तहत बातचीत की जानी चाहिए। इससे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सभी संभावित जोखिमों को ध्यान में रखते हुए साझा नियम तैयार करने में मदद मिल सकती है।
सुधा मूर्ति ने स्पष्ट किया कि भारत अंतरिक्ष गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाने और देशों के बीच भरोसा मजबूत करने के लिए गैर-बाध्यकारी नियमों तथा उपायों का भी समर्थन करता है। हालाँकि,भारत के अनुसार,ऐसे उपाय कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज का स्थान नहीं ले सकते। उन्हें संधि के पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए।
पारदर्शिता और विश्वास-निर्माण के उपायों में देशों के बीच जानकारी साझा करना, अंतरिक्ष गतिविधियों के बारे में स्पष्टता बढ़ाना और गलतफहमी की आशंका कम करने के लिए संवाद कायम रखना शामिल हो सकता है। इससे अंतरिक्ष में किसी गतिविधि को लेकर पैदा होने वाले संदेह और तनाव को कम करने में सहायता मिल सकती है।
लेकिन भारत के रुख के अनुसार, इन उपायों के साथ ऐसा कानूनी ढाँचा भी होना चाहिए, जो सभी देशों पर समान रूप से लागू हो। भारत सार्वभौमिक और गैर-भेदभावपूर्ण व्यवस्था का पक्षधर है,ताकि नियम किसी खास देश या देशों के समूह के हितों तक सीमित न रहें।
कुल मिलाकर,भारत ने अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से व्यापक और बाध्यकारी संधि की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की है। चीन और रूस के पुराने प्रस्ताव पर अमेरिका की आपत्तियाँ तथा अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों से जुड़े प्रस्ताव पर रूस का वीटो यह दिखाते हैं कि इस विषय पर वैश्विक सहमति बनाना आसान नहीं है। इसके बावजूद भारत का मानना है कि अंतरिक्ष को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखने के लिए सभी देशों को बहुपक्षीय बातचीत के जरिए ऐसे नियम विकसित करने चाहिए,जो मौजूदा और भविष्य के खतरों को एक साथ संबोधित कर सकें।
