सौरव दास और आशुतोष रांका (तस्वीर क्रेडिट@politics_vibes)

सीजेपी नेताओं की हिरासत पर दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी,कहा- पहले एसईएम कोर्ट के फैसले का करें इंतजार

नई दिल्ली,21 अक्टूबर (युआईटीवी)- दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत को लेकर कानूनी विवाद तेज हो गया है। बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने दोनों नेताओं की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। इस याचिका में विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी,जिसके तहत दोनों की न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ाकर 21 अक्टूबर तक कर दी गई थी। बुधवार को हिरासत की अवधि समाप्त होने के बीच हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पहले संबंधित अदालत में अपनी बात रखने की सलाह दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मामला उसी दिन विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है,तो सीधे हाई कोर्ट आने की जरूरत पर विचार किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दोनों नेताओं के वकील से कहा कि पहले दोपहर दो बजे विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में होने वाली कार्यवाही और वहाँ से आने वाले आदेश का इंतजार किया जाए। इसके बाद ही कानून के तहत उपलब्ध दूसरे विकल्पों पर विचार करना उचित होगा। अदालत ने यह भी कहा कि यदि शाम चार बजे तक संबंधित अदालत का फैसला याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आ जाता है,तो विवाद समाप्त हो सकता है। हालाँकि,यदि फैसला उनके अनुकूल नहीं आता है, तो वे पहले सक्षम पुनरीक्षण अदालत का रुख कर सकते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सौरव दास और आशुतोष रांका के वकील को सुझाव दिया कि वे फिलहाल अपनी याचिका वापस लेकर विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में होने वाली सुनवाई का इंतजार कर सकते हैं। अदालत का मानना था कि जब संबंधित मामले पर निचली अदालत में सुनवाई होनी है,तो पहले वहाँ की कार्यवाही पूरी होने देना उचित होगा। इसके बाद जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे कदम उठाए जा सकते हैं।

दोनों नेताओं ने हाई कोर्ट में तत्काल सुनवाई की माँग करते हुए याचिका दायर की थी। उनकी ओर से विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाई गई थी। याचिकाकर्ताओं की हिरासत की निर्धारित अवधि बुधवार को समाप्त हो रही थी,इसलिए मामले में तत्काल हस्तक्षेप की माँग की गई। हालाँकि, हाई कोर्ट ने तत्काल राहत पर विचार करने से पहले संबंधित अदालत की सुनवाई और आदेश की प्रतीक्षा करने की बात कही।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दोनों नेताओं के आचरण और बॉन्ड की शर्तों को लेकर भी कई सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो अधिकारियों द्वारा उसके लिए कड़ी शर्तें निर्धारित करने को अपने आप में गैरकानूनी नहीं माना जा सकता। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने बॉन्ड की शर्तें तोड़ी हैं और ऐसे में यह सवाल उठता है कि अधिकारियों को अधिक सख्त शर्तें रखने से कैसे रोका जा सकता है।

अदालत ने टिप्पणी की कि प्रतिबंधित या निर्धारित शर्तों वाले स्थान पर जाने से पहले अनुमति लेना जरूरी है। उसके अनुसार,संबंधित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने मात्र से उस आदेश पर रोक नहीं लग जाती। जब तक सक्षम अदालत से रोक का आदेश नहीं मिलता,तब तक लागू निर्देशों और शर्तों का पालन करना आवश्यक होता है।

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति विरोध-प्रदर्शन के दौरान सबसे आगे रहता है और बैरिकेड तोड़ता है,तो उसके व्यवहार का असर दूसरे लोगों पर भी पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में बड़ी संख्या में अन्य प्रदर्शनकारियों के भी बैरिकेड पार करने या पुलिस के निर्देशों का उल्लंघन करने की आशंका पैदा होती है। अदालत ने इस पहलू को कानून-व्यवस्था और अधिकारियों की जिम्मेदारी से जोड़कर देखा।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि किसी प्रदर्शन में शामिल सभी लोगों पर आयोजकों का पूरा नियंत्रण हो, यह जरूरी नहीं है। कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जिनके व्यवहार को नियंत्रित करना मुश्किल हो। हाई कोर्ट ने इस संदर्भ में कहा कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी ऐसी परिस्थितियां देखने को मिली हैं,जहाँ विरोध-प्रदर्शनों के दौरान स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।

अदालत ने सवाल किया कि यदि कोई व्यक्ति दूसरी बार बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है,तो क्या संबंधित अधिकारी उसके लिए अधिक कठोर शर्तें निर्धारित करने के हकदार नहीं हैं? इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने संकेत दिया कि बॉन्ड की शर्तों का पालन और उनका बार-बार उल्लंघन,दोनों ही मामले में महत्वपूर्ण पहलू हैं। हालाँकि, याचिका पर अंतिम राहत का प्रश्न संबंधित अदालतों में होने वाली आगे की कार्यवाही और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर तय होना है।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सीजेपी के विरोध-प्रदर्शनों और संगठन की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जुलाई में हुए पहले विरोध-प्रदर्शन के समय संगठन वही था,लेकिन उस समय उठाया गया मुद्दा अलग था। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि संगठन की प्रकृति क्या है,उसके सदस्य कौन हैं और उसका मुख्य उद्देश्य क्या है।

अदालत ने टिप्पणी की कि जब किसी संगठन से जुड़े लोगों के मुद्दे लगातार बदलते रहते हैं,तो उसके उद्देश्य और गतिविधियों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। उसने पूछा कि संगठन की पहचान क्या है और वह किस मकसद से काम कर रहा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों नेताओं की उम्र भी पूछी और इसके बाद टिप्पणी की कि सौरव दास और आशुतोष रांका दोनों ही जेन-जी यानी नई युवा पीढ़ी की श्रेणी में नहीं आते।

अदालत की इन टिप्पणियों का संदर्भ विरोध-प्रदर्शनों के तरीके,संगठन की भूमिका और कानूनी शर्तों के पालन से जुड़ा था। सुनवाई में यह बात भी सामने आई कि किसी प्रदर्शन के उद्देश्य के साथ-साथ उसे आयोजित करने और उसमें शामिल होने वालों के आचरण का भी कानूनी आकलन किया जा सकता है।

इससे पहले विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ा दी थी। अदालत ने उनके व्यवहार पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इससे कानून के प्रति सम्मान की कमी दिखाई देती है। साथ ही,यह भी टिप्पणी की गई थी कि दोनों प्रतिबंधित क्षेत्रों में विरोध-प्रदर्शन करने के आदी प्रतीत होते हैं।

संबंधित अदालत ने जांच के बाद दोनों नेताओं की ओर से प्रस्तुत जमानत को भी अमान्य करार दिया था। इसके पीछे पहचान संबंधी दस्तावेजों में विसंगतियों और जमानत देने वाले व्यक्तियों की ओर से पर्याप्त जानकारी नहीं दिए जाने का उल्लेख किया गया। अदालत के अनुसार,जमानत देने वाले लोग उन व्यक्तियों के बारे में बुनियादी जानकारी भी नहीं दे पाए,जिनकी जिम्मेदारी उन्होंने ली थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए जमानत की वैधता पर सवाल उठाए गए थे।

इसी आदेश के बाद दोनों नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तत्काल सुनवाई की माँग की। उनकी याचिका का मुख्य उद्देश्य हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देना था। हालाँकि,हाई कोर्ट ने पहले संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत की सुनवाई पूरी होने देने और उसके आदेश के बाद उचित कानूनी विकल्प अपनाने की सलाह दी।

इस पूरे मामले की शुरुआत 13 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शन से हुई थी। उस दिन निजी परिसर के रास्ते प्रवेश करने और पुलिसकर्मियों को उनकी ड्यूटी करने से रोकने के आरोप में कुल 14 लोगों को हिरासत में लिया गया था। हिरासत में लिए गए लोगों में सीजेपी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका के अलावा पार्टी सदस्य अजिंक्य शिंदे भी शामिल थे।

सीजेपी के सदस्य मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारेबाजी भी की थी। इसी घटनाक्रम के बाद पुलिस कार्रवाई हुई और संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई।

मामले में एक प्रमुख पहलू यह भी है कि प्रदर्शनकारियों की ओर से उठाए गए मुद्दे और विरोध करने के तरीके को अलग-अलग कानूनी दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। किसी चुनावी प्रक्रिया को लेकर असहमति जताना और विरोध-प्रदर्शन करना अपने आप में अलग विषय है,जबकि निर्धारित शर्तों का उल्लंघन करने,प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने या पुलिस के काम में बाधा डालने के आरोपों का मूल्यांकन संबंधित कानूनों के तहत किया जाता है।

फिलहाल सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर आगे की कानूनी प्रक्रिया का केंद्र विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत का आदेश बना हुआ है। दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ किया कि पहले वहाँ की सुनवाई का परिणाम सामने आना चाहिए। यदि दोनों नेताओं को राहत नहीं मिलती है,तो वे सक्षम पुनरीक्षण अदालत में चुनौती देने सहित कानून के तहत उपलब्ध विकल्प अपना सकते हैं। इस तरह मामले में अगला कदम संबंधित अदालत के आदेश और उसके बाद याचिकाकर्ताओं द्वारा अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।