नई दिल्ली,21 सितंबर (युआईटीवी)- आवारा कुत्तों और मवेशियों से जुड़े मामले में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। प्राधिकरण ने देशभर में आवारा मवेशियों के लिए शेल्टर होम बनाने से जुड़े निर्देश पर चिंता जताते हुए एक याचिका दाखिल की है। एनएचएआई का कहना है कि यदि उसे पूरे देश में आवारा मवेशियों के लिए शेल्टर होम बनाने की जिम्मेदारी दी जाती है,तो इस काम पर करीब सात हजार करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। प्राधिकरण ने इस जिम्मेदारी को स्थानीय जिला प्रशासन को सौंपने का सुझाव दिया है।
एनएचएआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया। उन्होंने अदालत को बताया कि यह मामला आवारा कुत्तों और मवेशियों से संबंधित है तथा एनएचएआई की ओर से इस संबंध में याचिका दाखिल की गई है। उन्होंने कहा कि प्राधिकरण को देशभर में आवारा मवेशियों के लिए शेल्टर होम बनाने का निर्देश दिया गया है। इसके लिए अनुमानित खर्च लगभग सात हजार करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है।
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत के सामने एनएचएआई का पक्ष रखते हुए कहा कि देशभर में शेल्टर होम बनाने का काम स्थानीय जिला स्तर के प्रशासन को करना चाहिए। उनका तर्क था कि राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण और रखरखाव से जुड़ी जिम्मेदारियाँ निभाने वाला प्राधिकरण पूरे देश में इस तरह के शेल्टर होम बनाने का काम नहीं कर सकता। एनएचएआई ने अपनी याचिका में इसी आधार पर अदालत से निर्देशों में बदलाव पर विचार करने का अनुरोध किया है।
मामले को सुनने के लिए एनएचएआई ने विशेष पीठ के गठन की माँग भी की है। प्राधिकरण ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ,न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति संजय कुमार की विशेष पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई किए जाने का अनुरोध किया। एनएचएआई की ओर से मामले का उल्लेख किए जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के लिए विशेष पीठ के गठन का निर्देश दिया।
यह मामला देशभर में राजमार्गों पर आवारा मवेशियों और अन्य जानवरों की मौजूदगी से जुड़े सुरक्षा संबंधी सवालों से भी जुड़ा है। राष्ट्रीय राजमार्गों और अन्य प्रमुख सड़कों पर घूमने वाले मवेशियों के कारण वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा बना रहता है। विशेष रूप से रात के समय सड़क पर अचानक सामने आने वाले पशु गंभीर हादसों का कारण बन सकते हैं। इसी समस्या को देखते हुए सड़क से आवारा पशुओं को हटाने और उनके लिए उचित व्यवस्था करने को लेकर न्यायपालिका में मामला पहुँचा है।
इससे पहले नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, एनएचएआई और अन्य संबंधित एजेंसियों को राजमार्गों से आवारा मवेशियों और अन्य जानवरों को हटाने के निर्देश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा था कि सड़कों से हटाए गए पशुओं को ऐसे शेल्टर में रखा जाए, जहाँ उनकी उचित देखभाल सुनिश्चित की जा सके। इस व्यवस्था का उद्देश्य एक ओर सड़क सुरक्षा से जुड़े जोखिम को कम करना और दूसरी ओर आवारा पशुओं के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना था।
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले पर सुनवाई शुरू की थी। सुनवाई के दौरान आवारा पशुओं के कारण आम लोगों की सुरक्षा,सड़क दुर्घटनाओं और पशुओं की देखभाल से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया गया। इसी व्यापक संदर्भ में राजमार्गों से आवारा मवेशियों और जानवरों को हटाने तथा उन्हें सुरक्षित स्थानों पर रखने के निर्देश दिए गए थे।
अब एनएचएआई की नई याचिका में शेल्टर होम बनाने की जिम्मेदारी और उससे जुड़े वित्तीय बोझ का मुद्दा उठाया गया है। प्राधिकरण का कहना है कि पूरे देश में ऐसी व्यवस्था तैयार करने के लिए भारी खर्च की आवश्यकता होगी। ऐसे में उसने जिला स्तर के प्रशासन को शेल्टर होम तैयार करने की जिम्मेदारी देने का सुझाव दिया है। विशेष पीठ इस मामले में एनएचएआई की दलीलों और मौजूदा निर्देशों के बीच तालमेल से जुड़े पहलुओं पर सुनवाई करेगी।
