एआईएडीएमके में नेतृत्व संकट गहराया (तस्वीर क्रेडिट@Mamtasulaniya)

एआईएडीएमके में नेतृत्व संकट गहराया,ई. पलानीस्वामी और एस.पी. वेलुमणि के बीच विधानसभा तक पहुँची शक्ति की लड़ाई

चेन्नई,12 मई (युआईटीवी)- तमिलनाडु की राजनीति में मंगलवार का दिन बेहद महत्वपूर्ण बन गया,जब राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान खुलकर विधानसभा तक पहुँच गई। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी तथा एस.पी. वेलुमणि के बीच नेतृत्व को लेकर संघर्ष अब सार्वजनिक रूप ले चुका है। दोनों नेताओं ने खुद को विधानसभा में एआईएडीएमके विधायक दल का वास्तविक नेता बताते हुए दावा पेश किया है,जिससे पार्टी के भीतर बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है।

सोमवार को विधानसभा की कार्यवाही के दौरान यह विवाद अचानक सामने आया। सूत्रों के अनुसार,ई. पलानीस्वामी और एस.पी. वेलुमणि दोनों अलग-अलग प्रोटेम स्पीकर करुप्पैया से मिले और दावा किया कि उनके पास पार्टी विधायकों का बहुमत समर्थन मौजूद है। दोनों नेताओं ने विधानसभा में पार्टी का नेतृत्व करने और आधिकारिक रूप से एआईएडीएमके विधायक दल का नेता माने जाने की माँग की। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है कि विधानसभा में एआईएडीएमके का आधिकारिक नेता किसे माना जाएगा। इसके साथ ही पार्टी व्हिप नियुक्त करने,सदन में पार्टी की रणनीति तय करने और विधायकों को निर्देश देने का अधिकार किसके पास होगा,इसे लेकर भी गंभीर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह केवल नेतृत्व का विवाद नहीं है,बल्कि पार्टी के भविष्य और संगठनात्मक नियंत्रण की लड़ाई भी बन चुका है।

चेन्नई के राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चाएँ तेज हो गई हैं। संवैधानिक विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्पीकर का फैसला आने वाले समय में एआईएडीएमके की दिशा तय कर सकता है। उनका कहना है कि यदि विवाद लंबा खिंचता है,तो इससे पार्टी की एकता और विपक्ष की राजनीति दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में चुनाव के बाद विधायक दल की बैठक आयोजित की जाती है,जिसमें विधायकों द्वारा अपने नेता का चयन किया जाता है। इसके बाद पार्टी की ओर से चुने गए नेता की जानकारी स्पीकर को दी जाती है। आमतौर पर पार्टी के महासचिव या शीर्ष नेतृत्व की सिफारिश को विधायक औपचारिक प्रस्ताव के माध्यम से मंजूरी देते हैं और उसी के आधार पर विधानसभा में विधायक दल के नेता को मान्यता मिलती है।

लेकिन एआईएडीएमके में मौजूदा स्थिति काफी जटिल मानी जा रही है,क्योंकि पार्टी नेतृत्व और विधायकों के समर्थन को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। ई. पलानीस्वामी और एस.पी. वेलुमणि दोनों अपने-अपने समर्थक विधायकों के आधार पर दावा कर रहे हैं कि असली समर्थन उनके पास है। ऐसे में यह तय करना आसान नहीं होगा कि पार्टी का वैध नेतृत्व किसके हाथ में है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की परिस्थितियों में स्पीकर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें यह तय करना होता है कि विधानसभा के भीतर किस गुट को “असली राजनीतिक पार्टी” माना जाए। इस फैसले में केवल संगठनात्मक दावे ही नहीं,बल्कि विधायकों की वास्तविक संख्या भी अहम भूमिका निभाती है।

विशेषज्ञों ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के महाराष्ट्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया है। इन फैसलों में अदालत ने कहा था कि किसी राजनीतिक दल की वास्तविक पहचान तय करने में संगठनात्मक ढाँचा और विधायकों का समर्थन दोनों महत्वपूर्ण कारक होते हैं। हालाँकि,विधानसभा के भीतर बहुमत का आँकड़ा अक्सर निर्णायक माना जाता है।

बताया जा रहा है कि एआईएडीएमके के कुल 47 विधायकों में से यदि दो-तिहाई यानी कम से कम 32 विधायक किसी एक गुट के समर्थन में खड़े हो जाते हैं,तो वह गुट खुद को असली पार्टी घोषित करने की स्थिति में आ सकता है। ऐसी स्थिति में दल-बदल कानून के तहत भी उन्हें कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। यही कारण है कि दोनों गुट लगातार विधायकों को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में पार्टी संगठन,जिला इकाइयों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच भी इसका असर देखने को मिल सकता है। एआईएडीएमके लंबे समय से तमिलनाडु की राजनीति में एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति रही है,लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर अस्थिरता लगातार बढ़ती गई है।

जयललिता के निधन के बाद पार्टी कई बार आंतरिक संघर्षों का सामना कर चुकी है। पहले ओ. पन्नीरसेल्वम और ई. पलानीस्वामी के बीच नेतृत्व को लेकर संघर्ष देखने को मिला था और अब एस.पी. वेलुमणि का नाम नए शक्ति केंद्र के रूप में सामने आ रहा है। इससे यह साफ संकेत मिल रहा है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके भी इस घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि विपक्ष में चल रही इस अंदरूनी लड़ाई से डीएमके को राजनीतिक फायदा मिल सकता है। यदि एआईएडीएमके में विवाद और गहराता है,तो विपक्ष की एकजुटता कमजोर पड़ सकती है,जिसका असर आने वाले चुनावों में दिखाई दे सकता है।

फिलहाल एआईएडीएमके के दोनों गुट अपने-अपने दावों को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता खुलकर किसी एक पक्ष में आने से बच रहे हैं,क्योंकि उन्हें डर है कि जल्दबाजी में लिया गया फैसला उनके राजनीतिक भविष्य को प्रभावित कर सकता है।

अब सबकी नजर विधानसभा स्पीकर के फैसले पर टिकी हुई है। उनका निर्णय यह तय करेगा कि विधानसभा में एआईएडीएमके का आधिकारिक नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा और पार्टी का भविष्य किस दिशा में आगे बढ़ेगा। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि आने वाले कुछ दिन तमिलनाडु की राजनीति के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकते हैं।