वाशिंगटन,12 मई (युआईटीवी)- अमेरिका में माइग्रेशन का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के ग्लोबल माइग्रेशन फ्रेमवर्क के खिलाफ अपना सख्त रुख दोहराते हुए साफ कर दिया है कि वह किसी भी ऐसी अंतर्राष्ट्रीय प्रक्रिया का समर्थन नहीं करेगी,जो अमेरिका की इमिग्रेशन नीति पर उसकी संप्रभुता को प्रभावित करे। इसी बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बड़े पैमाने पर प्रवास को अमेरिका के सामाजिक ढाँचे और भविष्य के लिए गंभीर खतरा बताया है। ट्रंप प्रशासन के इस रुख ने अमेरिका में माइग्रेशन को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
अमेरिकी विदेश विभाग ने सोमवार को इस मुद्दे पर एक तीखा बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय माइग्रेशन रिव्यू फोरम में हिस्सा नहीं लिया और 8 मई को जारी प्रोग्रेस डिक्लेरेशन का समर्थन भी नहीं करेगा। अमेरिकी सरकार ने स्पष्ट किया कि वह संयुक्त राष्ट्र के उन प्रयासों से सहमत नहीं है,जिनके जरिए वैश्विक स्तर पर माइग्रेशन को बढ़ावा देने और उसे आसान बनाने की कोशिश की जा रही है।
विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि बड़े पैमाने पर प्रवास को अमेरिका में आने देना एक गंभीर गलती थी। उनके अनुसार इसका असर केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है,बल्कि इससे अमेरिका की सामाजिक एकता और नागरिकों के भविष्य पर भी खतरा पैदा हुआ है। रुबियो ने कहा कि अमेरिका को अपनी सीमाओं और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाने होंगे।
अमेरिकी विदेश विभाग ने बयान में कहा कि अमेरिका ने लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के ग्लोबल माइग्रेशन फ्रेमवर्क का विरोध किया है। विभाग ने आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़े संगठनों ने पश्चिमी देशों,खासकर अमेरिका में बड़े पैमाने पर प्रवास को बढ़ावा देने की कोशिश की। बयान में कहा गया कि अमेरिका ने लगातार उन प्रयासों पर एतराज जताया है,जिनका उद्देश्य “रिप्लेसमेंट इमिग्रेशन” को समर्थन देना और आसान बनाना था।
ट्रंप प्रशासन ने अपने बयान में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वर्ष 2017 के उस फैसले का भी उल्लेख किया,जिसमें उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के ग्लोबल कॉम्पैक्ट फॉर माइग्रेशन को खारिज कर दिया था। उस समय ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया था कि अमेरिका अपनी इमिग्रेशन नीति पर किसी भी बाहरी प्रभाव को स्वीकार नहीं करेगा। अब सरकार का कहना है कि पिछले वर्षों की परिस्थितियों ने यह साबित कर दिया है कि उस समय लिया गया फैसला सही था।
अमेरिकी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और उनके सहयोगी संगठनों पर भी गंभीर आरोप लगाए। बयान में कहा गया कि इन संगठनों की नीतियों और गतिविधियों ने अमेरिका में बड़े पैमाने पर माइग्रेशन को बढ़ावा दिया,जिसके परिणामस्वरूप सीमा पर अपराध और अव्यवस्था बढ़ी। सरकार ने दावा किया कि अमेरिकी नागरिकों ने बड़े शहरों में आपातकाल जैसी स्थिति देखी,जहाँ लाखों डॉलर टैक्सपेयर्स के पैसे प्रवासियों के लिए होटल,हवाई टिकट,मोबाइल फोन और नकद सहायता पर खर्च किए गए।
विदेश विभाग के बयान में कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी इन पहलों ने न केवल अमेरिका की सीमाओं को कमजोर किया,बल्कि अमेरिकी संसाधनों पर भी भारी दबाव डाला। बयान के अनुसार अमेरिका की मेहनतकश जनता को कम नौकरियों,महँगे घरों और सामाजिक सेवाओं के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। सरकार ने आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र ने इन समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया।
अमेरिकी प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि वह माइग्रेशन को “मैनेज” करने की अवधारणा से सहमत नहीं है। बयान में कहा गया कि अमेरिका का उद्देश्य केवल प्रवास को नियंत्रित करना नहीं,बल्कि “रीमाइग्रेशन” को बढ़ावा देना है। इस बयान को ट्रंप प्रशासन की बेहद सख्त इमिग्रेशन नीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार अब अवैध प्रवासियों की वापसी और सीमा नियंत्रण को लेकर और कठोर कदम उठा सकती है।
अमेरिकी विदेश विभाग ने यह भी दोहराया कि अमेरिका किसी भी ऐसे अंतर्राष्ट्रीय समझौते या प्रक्रिया का समर्थन नहीं करेगा,जो अमेरिकी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और राष्ट्रीय संप्रभुता को सीमित करे। बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पूरा ध्यान अमेरिकी नागरिकों के हितों की रक्षा पर है,न कि वैश्विक संस्थाओं या विदेशी एजेंडों पर।
सरकार ने आरोप लगाया कि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठन ऐसी गाइडलाइंस और मानक लागू करना चाहते हैं,जो अमेरिका को अपनी इमिग्रेशन नीति स्वतंत्र रूप से तय करने से रोक सकते हैं। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिका की सीमाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले केवल अमेरिकी जनता और उसकी निर्वाचित सरकार द्वारा लिए जाने चाहिए।
यह पूरा विवाद संयुक्त राष्ट्र के “ग्लोबल कॉम्पैक्ट फॉर सेफ,ऑर्डरली एंड रेगुलर माइग्रेशन” से जुड़ा है,जिसे वर्ष 2018 में अपनाया गया था। इस समझौते का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर माइग्रेशन से जुड़े मुद्दों पर सहयोग बढ़ाना और सुरक्षित तथा व्यवस्थित प्रवास को प्रोत्साहित करना था। हालाँकि,यह समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है,लेकिन कई रूढ़िवादी सरकारों ने इसकी आलोचना की है। आलोचकों का कहना है कि इससे राष्ट्रीय संप्रभुता और सीमा नियंत्रण कमजोर हो सकते हैं।
अमेरिका में माइग्रेशन लंबे समय से राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने राजनीतिक अभियान के दौरान सीमा सुरक्षा और अवैध प्रवास को सबसे बड़े मुद्दों में शामिल किया था। उन्होंने मैक्सिको सीमा पर दीवार निर्माण,अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई और सख्त वीजा नीतियों को अपनी सरकार की प्राथमिकताओं में रखा था।
अब एक बार फिर ट्रंप प्रशासन का यह सख्त रुख ऐसे समय सामने आया है,जब अमेरिका में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म होता जा रहा है। रिपब्लिकन पार्टी लगातार यह दावा कर रही है कि बड़े पैमाने पर प्रवास से अमेरिकी अर्थव्यवस्था,सामाजिक ढाँचे और राष्ट्रीय सुरक्षा पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। वहीं डेमोक्रेटिक नेताओं और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि प्रवासियों के साथ मानवीय व्यवहार और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह रुख वैश्विक स्तर पर भी असर डाल सकता है। संयुक्त राष्ट्र के माइग्रेशन फ्रेमवर्क का उद्देश्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना था,लेकिन अमेरिका जैसे बड़े और प्रभावशाली देश के विरोध से इस पहल को झटका लग सकता है। साथ ही यह बहस भी तेज हो सकती है कि वैश्विक माइग्रेशन संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
फिलहाल ट्रंप प्रशासन के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका आने वाले समय में माइग्रेशन नीति को लेकर और अधिक सख्त रुख अपनाने वाला है। सीमा सुरक्षा,राष्ट्रीय हित और अमेरिकी नागरिकों की प्राथमिकताओं को केंद्र में रखकर सरकार आगे की रणनीति तय कर रही है। ऐसे में आने वाले महीनों में अमेरिका की इमिग्रेशन नीति और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसके रुख पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
