कुआलालंपुर,2 जून (युआईटीवी)- डिजिटल दुनिया में बच्चों की बढ़ती भागीदारी और उससे जुड़े खतरों को देखते हुए मलेशिया ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। देश की सरकार ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस फैसले को बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें इंटरनेट पर मौजूद हानिकारक सामग्री से बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। मलेशिया का यह कदम ऐसे समय में आया है,जब दुनिया भर में सोशल मीडिया के बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य,व्यवहार और सामाजिक विकास पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर गंभीर बहस चल रही है।
मलेशिया के संचार नियामक ने सोमवार को इस नई व्यवस्था की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उपयोगकर्ताओं की उम्र की सख्त जाँच करनी होगी। इसके तहत फेसबुक,इंस्टाग्राम,टिकटॉक और यूट्यूब जैसे लोकप्रिय डिजिटल मंचों को यह सुनिश्चित करना होगा कि 16 वर्ष से कम आयु के बच्चे बिना उचित अनुमति और सत्यापन के अकाउंट न बना सकें। सरकार का मानना है कि इससे बच्चों को अनुचित सामग्री,साइबर बुलिंग,ऑनलाइन शोषण और अन्य डिजिटल खतरों से बचाने में मदद मिलेगी।
नए नियमों के अनुसार सोशल मीडिया कंपनियों को उपयोगकर्ताओं की आयु सत्यापित करने के लिए सरकारी पहचान दस्तावेजों का उपयोग करना होगा। यह व्यवस्था सोमवार से प्रभावी हो चुकी है और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को इसका पालन अनिवार्य रूप से करना होगा। मलेशियाई कम्युनिकेशंस एंड मल्टीमीडिया कमीशन ने चेतावनी दी है कि नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर भारी आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। आयोग के अनुसार नियमों का पालन न करने वाले प्लेटफॉर्म्स को 10 मिलियन रिंगिट तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है,जो भारतीय मुद्रा में एक बड़ी राशि के बराबर है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य बच्चों को इंटरनेट या तकनीक से पूरी तरह दूर करना नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि इंटरनेट आज शिक्षा,जानकारी और संचार का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है,इसलिए बच्चों को डिजिटल दुनिया से अलग करना व्यावहारिक नहीं होगा। इसके बजाय सरकार सुरक्षित और जिम्मेदार इंटरनेट उपयोग को बढ़ावा देना चाहती है। नए नियमों का मकसद सोशल मीडिया कंपनियों,अभिभावकों और संरक्षकों की जिम्मेदारी तय करना है,ताकि बच्चों को सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में सोशल मीडिया का प्रभाव बच्चों और किशोरों पर तेजी से बढ़ा है। कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग से बच्चों में तनाव,अवसाद,आत्मविश्वास की कमी और ध्यान केंद्रित करने की समस्याएँ बढ़ सकती हैं। इसके अलावा ऑनलाइन उत्पीड़न,फर्जी जानकारी और अनुचित सामग्री तक पहुँच भी बच्चों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। इसी कारण दुनिया के कई देश अब सोशल मीडिया कंपनियों के लिए सख्त नियम बनाने पर विचार कर रहे हैं।
मलेशिया का यह निर्णय दक्षिण-पूर्व एशिया में डिजिटल नियमन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। क्षेत्र के अन्य देशों में भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। सरकारों का मानना है कि तकनीकी कंपनियों को केवल लाभ कमाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए,बल्कि उन्हें अपने मंचों पर सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करने की भी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
मौजूदा सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को भी इस नई व्यवस्था के दायरे में लाया जाएगा। हालाँकि,इसके लिए सरकार ने चरणबद्ध प्रक्रिया अपनाने का फैसला किया है। सोशल मीडिया कंपनियों को छह महीने का समय दिया गया है,ताकि वे अपने मौजूदा उपयोगकर्ताओं की आयु सत्यापन प्रक्रिया पूरी कर सकें। इस दौरान कंपनियों को आवश्यक तकनीकी बदलाव करने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी खाताधारकों की पहचान निर्धारित नियमों के अनुसार सत्यापित की जाए।
मलेशिया में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और हानिकारक सामग्री में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। सरकार के अनुसार कई बार ऐसे डिजिटल मंचों का उपयोग गलत सूचनाएँ फैलाने,सामाजिक तनाव पैदा करने और भड़काऊ सामग्री प्रसारित करने के लिए किया गया है। इसी कारण प्रशासन ने ऑनलाइन सामग्री के नियमन को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है।
सरकार विशेष रूप से उन सामग्रियों पर नजर रख रही है,जो नस्लीय या धार्मिक तनाव को बढ़ावा देती हैं। बहुजातीय और बहुधार्मिक समाज वाले मलेशिया में सामाजिक सौहार्द बनाए रखना सरकार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल मंचों पर फैलने वाली भड़काऊ सामग्री समाज में विभाजन पैदा कर सकती है और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। इसलिए ऐसे कंटेंट के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि मलेशिया का यह कदम वैश्विक स्तर पर चल रही उस बहस का हिस्सा है,जिसमें यह तय करने की कोशिश की जा रही है कि बच्चों और किशोरों को डिजिटल दुनिया में किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए। तकनीक और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ सरकारों के सामने यह चुनौती भी बढ़ी है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऑनलाइन सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें।
मलेशिया के इस फैसले पर आने वाले समय में दुनिया भर की नजर रहेगी। यदि यह मॉडल सफल साबित होता है तो अन्य देश भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए इसी तरह के नियम लागू करने पर विचार कर सकते हैं। फिलहाल यह कदम इस बात का संकेत है कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकारें अब पहले से कहीं अधिक गंभीर होती जा रही हैं और तकनीकी कंपनियों से भी अधिक जवाबदेही की अपेक्षा की जा रही है।
