पुणे,5 जून (युआईटीवी)- महाराष्ट्र के पुणे स्थित एक आईटी कंपनी के अचानक बंद हो जाने से सैकड़ों कर्मचारियों और इंटर्न के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। हिंजेवाड़ी आईटी हब में संचालित थिंकटेक इंडिया नामक कंपनी के कथित तौर पर बिना किसी पूर्व सूचना के संचालन बंद करने के बाद 700 से अधिक कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें न केवल नौकरी से हाथ धोना पड़ा,बल्कि कई महीनों का वेतन,स्टाइपेंड और कंपनी के पास जमा उनकी सुरक्षा राशि भी वापस नहीं मिली है। मामले ने अब कानूनी और आपराधिक जाँच का रूप ले लिया है और पुलिस ने कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हर्षल ठाकरे को गिरफ्तार कर लिया है।
जानकारी के अनुसार यह मामला तब सामने आया जब एक 25 वर्षीय इंटर्न ने कंपनी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में वेतन और अन्य भुगतानों से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए थे। प्रारंभिक जाँच के दौरान पुलिस को मामले में कई संदिग्ध तथ्य मिले,जिसके बाद जाँच का दायरा बढ़ाया गया। इसके बाद 30 से अधिक कर्मचारियों और इंटर्न ने भी पुलिस से संपर्क कर अपनी शिकायतें दर्ज कराईं। सभी शिकायतों में लगभग एक जैसी बातें सामने आईं, जिनमें वेतन न मिलने,स्टाइपेंड रोके जाने और कर्मचारियों से ली गई रकम वापस न करने के आरोप प्रमुख थे।
कर्मचारियों का कहना है कि कंपनी ने अप्रैल महीने में अचानक अपना संचालन बंद कर दिया। कई कर्मचारी रोज की तरह कार्यालय पहुँचे,तो उन्होंने पाया कि कार्यालय बंद है और वहाँ कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं है। कर्मचारियों ने जब कंपनी के अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया,तो उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। कुछ कर्मचारियों का दावा है कि कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के फोन भी बंद मिलने लगे और ईमेल का जवाब देना भी बंद कर दिया गया।
इस घटनाक्रम ने कर्मचारियों को गहरे संकट में डाल दिया। कई कर्मचारियों ने बताया कि वे पूरी तरह इस नौकरी पर निर्भर थे और अचानक कंपनी बंद होने से उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है। कई लोगों के सामने गृह ऋण,वाहन ऋण,बच्चों की पढ़ाई और अन्य घरेलू खर्चों को पूरा करने की चुनौती खड़ी हो गई है। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें कंपनी की वित्तीय स्थिति को लेकर पहले से कोई चेतावनी नहीं दी गई थी।
पुलिस जाँच में सामने आया है कि कंपनी ने कर्मचारियों और इंटर्न से लगभग 15 हजार रुपये की सुरक्षा जमा राशि ली थी। कंपनी का दावा था कि यह राशि आधिकारिक लैपटॉप, तकनीकी उपकरणों और अन्य संसाधनों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। हालाँकि,कर्मचारियों का आरोप है कि कंपनी बंद होने के बाद यह राशि भी वापस नहीं की गई। कई लोगों ने बताया कि नौकरी मिलने के उत्साह में उन्होंने यह रकम जमा कर दी थी,लेकिन अब उनके लिए इसे वापस पाना मुश्किल हो गया है।
कर्मचारियों के अनुसार शुरुआत में कंपनी का संचालन सामान्य दिखाई देता था। उन्हें समय पर वेतन और स्टाइपेंड मिलता था,जिससे कंपनी के प्रति उनका विश्वास मजबूत हुआ,लेकिन इस वर्ष जनवरी से स्थिति बदलने लगी। कर्मचारियों का आरोप है कि जनवरी के बाद वेतन भुगतान में देरी शुरू हुई और बाद में पूरी तरह बंद हो गया। जब कर्मचारियों ने अपने बकाया भुगतान की माँग की,तो उन्हें आश्वासन दिया जाता रहा कि जल्द ही भुगतान कर दिया जाएगा।
कुछ कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि कंपनी ने बकाया वेतन के बदले चेक जारी किए थे। हालाँकि,इनमें से कई चेक बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर बाउंस हो गए। इससे कर्मचारियों की चिंता और बढ़ गई तथा उन्हें कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति पर संदेह होने लगा। चेक बाउंस होने की घटनाओं ने कंपनी के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोपों को और मजबूत कर दिया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हर्षल ठाकरे को गिरफ्तार कर लिया है। इसके अलावा कंपनी के प्रशिक्षण एवं विकास विभाग के प्रमुख तथा मानव संसाधन प्रबंधक के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है। जाँच एजेंसियाँ यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कंपनी की वित्तीय स्थिति वास्तव में क्या थी और कर्मचारियों से ली गई राशि तथा अन्य भुगतानों का उपयोग किस प्रकार किया गया।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार मामले में वित्तीय अनियमितताओं की आशंका को देखते हुए कंपनी के बैंक खातों,वित्तीय रिकॉर्ड और लेन-देन से संबंधित दस्तावेजों की जाँच की जा रही है। जाँचकर्ता यह भी पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि क्या कंपनी ने जानबूझकर कर्मचारियों और इंटर्न को गुमराह किया या फिर वित्तीय संकट के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई। इसके लिए विभिन्न दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड का विश्लेषण किया जा रहा है।
आईटी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाएँ कर्मचारियों के विश्वास को प्रभावित करती हैं और रोजगार बाजार में अनिश्चितता पैदा करती हैं। विशेष रूप से युवा पेशेवरों और इंटर्न के लिए ऐसी घटनाएँ मानसिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण साबित होती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ काम करना चाहिए।
वहीं प्रभावित कर्मचारी अब अपने बकाया वेतन,स्टाइपेंड और सुरक्षा जमा राशि की वापसी की माँग कर रहे हैं। कई कर्मचारियों ने प्रशासन से अनुरोध किया है कि मामले की निष्पक्ष जाँच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और प्रभावित लोगों को न्याय दिलाया जाए।
फिलहाल पुलिस की जाँच जारी है और अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में मामले से जुड़े और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। इस बीच सैकड़ों कर्मचारी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि जाँच के बाद उन्हें उनका बकाया भुगतान मिल सकेगा। पुणे के आईटी क्षेत्र में सामने आया यह मामला अब रोजगार सुरक्षा,कॉरपोरेट जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।
