सुप्रीम कोर्ट

करूर भगदड़ मामले में डीएमके को सुप्रीम कोर्ट से झटका,टीवीके नेताओं पर रोक लगाने वाली याचिका वापस लेने की मिली अनुमति

नई दिल्ली,7 जुलाई (युआईटीवी)- करूर भगदड़ मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान द्रविड़ मुनेत्र कड़गम को बड़ा झटका लगा। सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया,जिसमें सत्तारूढ़ तमिलनाडु वेत्री कड़गम के नेताओं को मामले से जुड़े सार्वजनिक बयान देने से रोकने की माँग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि वह इस तरह की याचिका पर सुनवाई करने के पक्ष में नहीं है। इसके बाद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति माँगी,जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

यह मामला करूर भगदड़ कांड से जुड़ा है,जिसकी जाँच फिलहाल केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो कर रहा है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि तमिलनाडु वेत्री कड़गम के शीर्ष नेताओं द्वारा दिए जा रहे सार्वजनिक बयान जाँच को प्रभावित कर सकते हैं और इससे गवाहों पर भी असर पड़ने की आशंका है। पार्टी ने अदालत से आग्रह किया था कि जब तक अदालत की निगरानी में चल रही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की जाँच पूरी नहीं हो जाती,तब तक मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और मंत्री आधाव अर्जुना सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को इस मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से रोका जाए।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रारंभिक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस याचिका पर जोर न देना ही बेहतर होगा और न्यायालय इसे खारिज करने के पक्ष में है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने कहा कि उनकी पार्टी इस याचिका को वापस लेना चाहती है और कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्पों का उपयोग करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता अन्य वैधानिक और कानूनी उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को वापस लिया हुआ मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की,बल्कि केवल यह स्पष्ट किया कि वह इस प्रकार की माँग पर विचार करने के पक्ष में नहीं है।

यह याचिका द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के संगठन सचिव आर. एस. भारती की ओर से दायर की गई थी। उन्होंने करूर भगदड़ मामले में चल रही कार्यवाही में पक्षकार बनने की अनुमति भी माँगी थी। याचिका में यह भी अनुरोध किया गया था कि तमिलनाडु सरकार के मंत्री आधाव अर्जुना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। पार्टी का आरोप था कि मंत्री द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयान और पीड़ित परिवारों को सरकारी सहायता देने की प्रस्तावित प्रक्रिया जाँच की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है।

याचिका में विशेष रूप से 2 जुलाई को मंत्री आधाव अर्जुना द्वारा दिए गए एक भाषण का उल्लेख किया गया था। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का दावा था कि इस भाषण में मंत्री ने कथित रूप से कहा था कि “एक हिसाब बराबर करना है” और करूर हादसे के लिए पिछली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। पार्टी का कहना था कि इस तरह के बयान ऐसे समय में दिए जा रहे हैं,जब मामले की जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा की जा रही है। इसलिए इन टिप्पणियों से जाँच की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने अपनी याचिका में यह भी कहा था कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय करूर जाकर हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को सरकारी आर्थिक सहायता, अनुकंपा के आधार पर नौकरियां और अन्य राहत देने वाले हैं। पार्टी ने स्पष्ट किया कि उसे पीड़ित परिवारों को सहायता दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है,क्योंकि सरकार का यह दायित्व है कि वह पीड़ितों की मदद करे। हालाँकि,पार्टी ने यह तर्क दिया कि मृतकों के परिजन और घायल लोग इस मामले के महत्वपूर्ण गवाह भी हैं। ऐसे में जाँच पूरी होने से पहले मामले से जुड़े प्रमुख राजनीतिक नेताओं का उनसे प्रत्यक्ष संपर्क जाँच की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े कर सकता है।

याचिका में कहा गया था कि अदालत की निगरानी में चल रही जाँच के दौरान किसी भी प्रकार की राजनीतिक टिप्पणी या प्रत्यक्ष संपर्क से गवाह प्रभावित हो सकते हैं। इसी आधार पर अदालत से अनुरोध किया गया था कि वह अंतरिम आदेश जारी कर नेताओं को सार्वजनिक बयान देने और गवाहों से संपर्क करने से रोके।

करूर भगदड़ मामला तमिलनाडु की राजनीति का एक बेहद संवेदनशील विषय बना हुआ है। 27 सितंबर 2025 को करूर में तमिलनाडु वेत्री कड़गम की एक राजनीतिक रैली के दौरान अचानक भगदड़ मच गई थी। इस दर्दनाक हादसे में 41 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 142 लोग घायल हुए थे। घटना के बाद पूरे राज्य में शोक और आक्रोश का माहौल बन गया था। विपक्षी दलों ने प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियों का आरोप लगाया था,जबकि सरकार ने घटना की निष्पक्ष जाँच कराने का आश्वासन दिया था।

प्रारंभिक जाँच तमिलनाडु पुलिस द्वारा की जा रही थी,लेकिन बाद में मामले की गंभीरता और निष्पक्ष जाँच की माँग को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दी थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि जाँच स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से पूरी की जानी चाहिए,ताकि हादसे के वास्तविक कारणों और जिम्मेदार लोगों का पता लगाया जा सके।

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो फिलहाल इस मामले में विभिन्न पहलुओं की जाँच कर रहा है। जाँच एजेंसी रैली की सुरक्षा व्यवस्था,भीड़ नियंत्रण,प्रशासनिक तैयारियों,आयोजन से जुड़े निर्णयों और अधिकारियों की भूमिका सहित कई बिंदुओं पर साक्ष्य जुटा रही है। इसके अलावा प्रत्यक्षदर्शियों,घायलों और मृतकों के परिजनों के बयान भी दर्ज किए जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की याचिका पर विचार करने से इनकार करने के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि फिलहाल अदालत सार्वजनिक बयानों पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं है। हालाँकि,अदालत ने यह रास्ता खुला रखा है कि यदि याचिकाकर्ता चाहे तो कानून के तहत उपलब्ध अन्य मंचों या प्रक्रियाओं का सहारा ले सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि करूर भगदड़ मामला केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि यह तमिलनाडु की राजनीति का भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। एक ओर विपक्ष जाँच की निष्पक्षता और राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका जता रहा है,वहीं दूसरी ओर सरकार का कहना है कि वह पीड़ित परिवारों की सहायता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

फिलहाल इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की जाँच जारी है और सभी पक्षों की नजरें जाँच के निष्कर्षों पर टिकी हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद कानूनी लड़ाई का यह चरण भले ही समाप्त हो गया हो,लेकिन द्रविड़ मुनेत्र कड़गम द्वारा अन्य कानूनी विकल्प अपनाने की घोषणा से संकेत मिलते हैं कि करूर भगदड़ मामले को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद आने वाले समय में भी जारी रह सकता है।