काइलियन म्बाप्पे (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

काइलियन म्बाप्पे और पैराग्वे की सीनेटर के बीच विवाद गहराया,माफी की माँग के साथ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

नई दिल्ली,7 जुलाई (युआईटीवी)- फीफा विश्व कप के दौरान मैदान पर होने वाले मुकाबले जितने चर्चा में रहते हैं,कई बार उनसे जुड़े विवाद भी उतनी ही सुर्खियाँ बटोर लेते हैं। इस बार फ्रांस के स्टार फुटबॉलर काइलियन म्बाप्पे और पैराग्वे की सीनेटर सेलेस्टे अमरिला के बीच सोशल मीडिया पर शुरू हुआ विवाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। मामला अब केवल तीखी बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें माफी की माँग,जेंडर-आधारित हिंसा के आरोप और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी शामिल हो गई है। विवाद इतना बढ़ गया है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल महासंघ के अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो भी सार्वजनिक रूप से इस मामले पर प्रतिक्रिया दे चुके हैं।

यह पूरा विवाद फीफा विश्व कप के राउंड ऑफ 16 मुकाबले के बाद शुरू हुआ,जिसमें फ्रांस ने पैराग्वे को हराकर टूर्नामेंट से बाहर कर दिया। मैच के बाद पैराग्वे की लिबरल रेडिकल पार्टी से जुड़ी सीनेटर सेलेस्टे अमरिला ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट साझा की। बताया गया कि यह पोस्ट हार के बाद भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में लिखी गई थी और इसमें आपत्तिजनक तथा विवादित शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। बाद में यह पोस्ट तेजी से वायरल हो गई और इसकी चर्चा खेल जगत के साथ-साथ राजनीतिक हलकों में भी होने लगी।

सीनेटर अमरिला के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए फ्रांस के कप्तान और स्टार खिलाड़ी काइलियन म्बाप्पे ने भी सोशल मीडिया पर जवाब दिया। म्बाप्पे ने कहा कि अमरिला एक “घटिया महिला” हैं और अपने पद के योग्य नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह पैराग्वे का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं,क्योंकि पैराग्वे की टीम ने पूरे टूर्नामेंट में सम्मान और जज्बे के साथ खेल दिखाया है। म्बाप्पे का यह जवाब सामने आते ही विवाद और अधिक गहरा गया।

इसके बाद सेलेस्टे अमरिला ने एक खुला पत्र जारी किया,जिसे उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किया। इस पत्र में उन्होंने स्वीकार किया कि मैच हारने के बाद गुस्से में उन्होंने कुछ ऐसी बातें लिखीं,जिन पर बाद में उन्हें पछतावा हुआ। उन्होंने कहा कि उस समय भावनाएँ बहुत तीव्र थीं और वह अपने देश की हार से बेहद निराश थीं। अमरिला ने लिखा कि उन्होंने जो पोस्ट की थी,वह गुस्से में लिखी गई थी,लेकिन जब उन्हें महसूस हुआ कि वह उसी तरह का व्यवहार कर रही हैं,जिसकी वह स्वयं आलोचना करती हैं,तो उन्होंने तुरंत उसे हटा दिया।

अपने पत्र में अमरिला ने लिखा कि उनके भीतर स्वदेशी और स्पेनिश विरासत का मिला-जुला खून बहता है और अपने देश के खिलाड़ियों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान है। उन्होंने कहा कि उन्हें यह देखकर दुख हुआ कि पैराग्वे की टीम के खिलाड़ियों का मजाक उड़ाया जा रहा था,जबकि उन्होंने अंतिम सीटी तक पूरी ताकत और सम्मान के साथ मुकाबला किया। हालाँकि,उन्होंने यह भी माना कि गाली-गलौज भरे शब्दों का इस्तेमाल करना उचित नहीं था और इसी कारण उन्होंने अपनी पोस्ट हटा दी।

अमरिला ने यह भी स्वीकार किया कि अपमानजनक शब्द किसी भी व्यक्ति को आहत कर सकते हैं और वह समझती हैं कि उनकी टिप्पणी से म्बाप्पे को बुरा लगा होगा,लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि म्बाप्पे की प्रतिक्रिया ने उन्हें और अधिक आहत किया। उनके अनुसार,एक महिला और निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी गरिमा पर हमला किया गया है। उन्होंने म्बाप्पे द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह किसी महिला को “घटिया” या “अयोग्य” कहे,विशेषकर तब जब वह उसके बारे में व्यक्तिगत रूप से कुछ नहीं जानता हो।

अपने पत्र में सीनेटर ने स्पष्ट रूप से म्बाप्पे से सार्वजनिक माफी की माँग की। उन्होंने कहा कि जिस तरह उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए अपनी पोस्ट हटाई,उसी तरह म्बाप्पे को भी अपने बयान वापस लेने चाहिए। अमरिला ने कहा कि वह किसी भी प्रकार की हिंसा या अपमानजनक व्यवहार को स्वीकार नहीं करेंगी और यदि जरूरत पड़ी,तो कानूनी रास्ता अपनाने से भी पीछे नहीं हटेंगी।

अमरिला ने आगे लिखा कि वह पैराग्वे की जनता द्वारा चुनी गई सीनेटर हैं और इससे पहले भी राष्ट्रीय सांसद रह चुकी हैं। हजारों नागरिकों ने उन पर भरोसा जताकर उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से चुना है। ऐसे में किसी विदेशी खिलाड़ी द्वारा उनकी योग्यता और पद पर सवाल उठाना न केवल व्यक्तिगत अपमान है,बल्कि उन मतदाताओं का भी अपमान है जिन्होंने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना है।

सीनेटर ने म्बाप्पे पर जेंडर-आधारित हिंसा का आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी टिप्पणी एक महिला राजनीतिक प्रतिनिधि के खिलाफ हिंसक भाषा का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जब किसी महिला को केवल उसके लिंग के आधार पर नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है या उसकी प्रतिष्ठा पर हमला किया जाता है,तो यह जेंडर-आधारित हिंसा की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर उन्होंने कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी।

पत्र में उन्होंने म्बाप्पे से अपील की कि वह अपने बयान वापस लें,अपनी फ्रांसीसी नागरिकता और उससे जुड़े मूल्यों का सम्मान करें तथा सार्वजनिक रूप से माफी मांगें। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा नहीं किया गया,तो वह कानूनी विकल्पों पर विचार कर सकती हैं। इस बयान ने विवाद को और अधिक राजनीतिक और कानूनी आयाम दे दिया।

दूसरी ओर,इस पूरे मामले में म्बाप्पे को फ्रांस के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन मिला है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सोशल मीडिया पर एक संदेश साझा करते हुए म्बाप्पे के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि म्बाप्पे ने इस बार मैदान पर नहीं,बल्कि नस्लवाद के खिलाफ एक और महत्वपूर्ण गोल किया है। मैक्रों ने लिखा कि जब शब्द गलत होते हैं,तब सम्मान,गरिमा और भाईचारे जैसे मूल्य जवाब देते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से म्बाप्पे के साथ एकजुटता दिखाई और नस्लवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल महासंघ के अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो ने भी इस मामले में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सीनेटर अमरिला की उन टिप्पणियों की कड़ी निंदा की,जिन्हें नस्लभेदी माना गया। इन्फेंटिनो ने कहा कि पूरा फुटबॉल समुदाय और व्यापक समाज काइलियन म्बाप्पे के साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि नस्लवाद के खिलाफ लड़ाई केवल फुटबॉल की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की जिम्मेदारी है और इस बुराई को मिलकर समाप्त करना होगा।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है,जब खेल जगत में नस्लवाद,लैंगिक सम्मान और सोशल मीडिया पर जिम्मेदार व्यवहार जैसे मुद्दों पर लगातार बहस चल रही है। एक ओर खेल व्यक्तित्वों को अक्सर नस्लभेदी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है,वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल पर भी सवाल उठते रहे हैं। इस मामले ने दोनों मुद्दों को एक साथ सामने ला दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया के दौर में भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ अक्सर बड़े विवादों का रूप ले लेती हैं। खेल प्रतियोगिताओं के दौरान राष्ट्रीय भावनाएँ चरम पर होती हैं और हार-जीत के बाद कई बार खिलाड़ी,प्रशंसक और राजनीतिक हस्तियाँ भी आवेश में आकर ऐसे बयान दे देती हैं,जिनके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यही कारण है कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों से संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।

फिलहाल यह विवाद थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है। सीनेटर सेलेस्टे अमरिला अपनी माँग पर कायम हैं और उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह माफी चाहती हैं। वहीं म्बाप्पे की ओर से अब तक इस नए पत्र पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या दोनों पक्ष किसी समझौते पर पहुँचते हैं या मामला वास्तव में कानूनी कार्रवाई तक जाता है।

विश्व कप के रोमांच के बीच शुरू हुआ यह विवाद अब खेल,राजनीति,सामाजिक सम्मान, नस्लवाद और लैंगिक अधिकारों से जुड़े व्यापक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आगे यह मामला किस दिशा में बढ़ता है और क्या दोनों पक्ष संवाद के माध्यम से इस विवाद का समाधान निकाल पाते हैं या नहीं।