प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (तस्वीर क्रेडिट@SonOfBharat7)

ईरान परमाणु विवाद पर नेतन्याहू का बड़ा बयान,ट्रंप की कूटनीति का किया समर्थन;अमेरिकी सैन्य सहायता पर निर्भरता घटाने के संकेत

वाशिंगटन,13 जुलाई (युआईटीवी)- इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच महत्वपूर्ण बयान देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक पहल का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ परमाणु मुद्दे पर समझौते की हर संभावना को आजमाना चाहते हैं,लेकिन यदि तेहरान अपने वादों से पीछे हटता है या समझौते का उल्लंघन करता है तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई करने से भी पीछे नहीं हटेगा। नेतन्याहू ने साथ ही यह भी संकेत दिया कि इजरायल भविष्य में अपनी रक्षा क्षमताओं को इतना मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है कि वह धीरे-धीरे अमेरिकी सैन्य सहायता पर अपनी निर्भरता को समाप्त कर सके।

अमेरिकी समाचार चैनल के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ को दिए गए साक्षात्कार में नेतन्याहू ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में कूटनीति को अवसर दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप की प्राथमिकता बातचीत के माध्यम से ऐसा समझौता करना है,जिससे ईरान का परमाणु कार्यक्रम नियंत्रित रहे और क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता है,तो अमेरिका आवश्यक होने पर सैन्य शक्ति का उपयोग करने के लिए भी तैयार है।

नेतन्याहू ने कहा कि उनका मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप हर संभव शांतिपूर्ण विकल्प को अपनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सैन्य टकराव से पहले बातचीत और समझौते के सभी रास्तों को आजमाना उचित है,लेकिन यदि ईरान समझौते का उल्लंघन करता है या अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है,तो अमेरिका के पास कड़ा कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। उन्होंने कहा कि इसी कारण ट्रंप को अपनी कूटनीतिक पहल को आगे बढ़ाने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

इसी कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को लेकर कई महत्वपूर्ण दावे किए। ट्रंप ने कहा कि ईरान एक समय ऐसे समझौते पर सहमत हो गया था जिसे उन्होंने अमेरिका के लिए अत्यंत लाभकारी बताया। उनके अनुसार,उस समझौते में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम से संबंधित गतिविधियों को पूरी तरह छोड़ने की सहमति जताई थी। ट्रंप ने दावा किया कि समझौते की दिशा में सकारात्मक प्रगति हो रही थी,लेकिन बाद में ईरानी प्रतिनिधि बातचीत छोड़कर चले गए।

ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि वार्ता समाप्त होने के लगभग एक घंटे के भीतर ईरान ने एक जहाज पर ड्रोन हमला कर दिया। उन्होंने कहा कि इस घटना ने वार्ता की दिशा बदल दी और यह स्पष्ट कर दिया कि ईरान की ओर से भरोसा बनाए रखना आसान नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी पुष्टि की कि होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री यातायात के लिए खुला रहा और अमेरिका ने रातभर ईरान के खिलाफ नए सैन्य अभियान भी चलाए।

इन बयानों के बीच प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिका और इजरायल के बीच लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक साझेदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने मिलकर ऐसे कदम उठाए हैं,जिनसे ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम से उत्पन्न तत्काल खतरे को काफी हद तक पीछे धकेला गया है। उनके अनुसार,यह खतरा केवल इजरायल तक सीमित नहीं था,बल्कि पूरे पश्चिमी विश्व और स्वयं अमेरिका की सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती था।

नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अमेरिका का आभारी है कि उसने कठिन समय में उसके साथ मिलकर काम किया और क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाने में सहयोग दिया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संयुक्त प्रयासों ने ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने और उन्हें प्रभावी ढंग से तैनात करने की दिशा में आगे बढ़ने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

हालाँकि,इस सहयोग की सराहना करते हुए भी नेतन्याहू ने भविष्य के लिए एक नई रणनीतिक सोच का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि इजरायल अब अपनी सैन्य क्षमता और रक्षा उद्योग को इस स्तर तक विकसित कर चुका है कि आने वाले वर्षों में वह अमेरिकी सैन्य सहायता पर अपनी निर्भरता धीरे-धीरे कम कर सकता है। उनके अनुसार, देश का लक्ष्य आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था स्थापित करना है,जिससे भविष्य में बाहरी सहायता की आवश्यकता न्यूनतम रह जाए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के बीच वर्षों से रक्षा सहयोग के कई महत्वपूर्ण समझौते होते रहे हैं और इनसे इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था को काफी मजबूती मिली है,लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं और इजरायल अपनी तकनीकी क्षमता, रक्षा उत्पादन और सैन्य संसाधनों को लगातार मजबूत कर रहा है। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसा समय भी आ सकता है,जब अमेरिकी सैन्य सहायता की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो जाए।

नेतन्याहू ने अपने साक्षात्कार में दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ग्राहम हमेशा इजरायल की बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए अधिक अमेरिकी सहायता की वकालत करते थे। उनके अनुसार, ग्राहम का मानना था कि इजरायल की सुरक्षा केवल इजरायल के हित में नहीं,बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सामूहिक सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।

प्रधानमंत्री ने ग्राहम के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वह अमेरिकी सीनेट में इजरायल के सबसे मजबूत समर्थकों में शामिल थे। उन्होंने कहा कि ग्राहम ने अपने राजनीतिक जीवन में हमेशा दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने का प्रयास किया और रक्षा सहयोग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मध्य पूर्व में हाल के दिनों में बढ़ते तनाव,ईरान के परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और क्षेत्र में लगातार हो रही सैन्य गतिविधियों के बीच नेतन्याहू और ट्रंप के ये बयान विशेष महत्व रखते हैं। एक ओर दोनों नेताओं ने कूटनीतिक समाधान की संभावना को खुला रखने की बात कही है,वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया है कि यदि ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता है,तो सैन्य विकल्प भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

विश्लेषकों का मानना है कि इजरायल द्वारा अमेरिकी सैन्य सहायता पर निर्भरता कम करने की बात उसके रक्षा क्षेत्र में बढ़ती आत्मनिर्भरता का संकेत है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि इजरायल भविष्य में अपनी सुरक्षा रणनीति को और अधिक स्वतंत्र रूप से संचालित करना चाहता है। दूसरी ओर,अमेरिका और इजरायल के बीच मजबूत रणनीतिक साझेदारी आगे भी क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनी रहने की संभावना है।

फिलहाल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कूटनीतिक प्रयासों और सैन्य तैयारियों का समानांतर सिलसिला जारी है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या बातचीत के जरिए स्थायी समाधान निकल पाएगा या फिर क्षेत्र में बढ़ता तनाव किसी बड़े सैन्य टकराव का रूप लेगा। ऐसे समय में अमेरिका और इजरायल के शीर्ष नेतृत्व के ये बयान आने वाले दिनों की रणनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।