समय रैना (तस्वीर क्रेडिट@realankitkumarr)

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: दिव्यांगों पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में समय रैना समेत सभी पर तीन-तीन लाख का जुर्माना

नई दिल्ली,15 जुलाई (युआईटीवी)- विवादित कॉमेडी शो ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ से जुड़े दिव्यांगों का मजाक उड़ाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए समय रैना, रणवीर इलाहाबादिया और शो में शामिल अन्य कॉमेडियन एवं अतिथि कलाकारों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी वर्ग,विशेषकर दिव्यांग व्यक्तियों की गरिमा से खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि समय रैना ने अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया और उसके समक्ष गलत तथ्य प्रस्तुत किए। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने समय रैना सहित विवादित कार्यक्रम में शामिल सभी संबंधित लोगों पर तीन-तीन लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जुर्माने की राशि दो सप्ताह के भीतर जमा करानी होगी। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर यह राशि जमा नहीं की गई,तो संबंधित लोगों के खिलाफ आगे की कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि समाज में लोकप्रिय सार्वजनिक हस्तियों की जिम्मेदारी सामान्य लोगों से कहीं अधिक होती है और उन्हें अपने शब्दों तथा व्यवहार के प्रभाव का पूरा ध्यान रखना चाहिए।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने समय रैना और अन्य कलाकारों से यह भी पूछा कि विवाद सामने आने के बाद उन्होंने अपने भीतर सुधार लाने के लिए क्या प्रयास किए हैं। अदालत का मानना था कि केवल सफाई देना पर्याप्त नहीं है,बल्कि यह भी जरूरी है कि ऐसे मामलों में जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए सकारात्मक कदम उठाए जाएँ,ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

सुनवाई के दौरान क्योर एसएमए फाउंडेशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने अदालत के समक्ष कई महत्वपूर्ण तथ्य रखे। उन्होंने बताया कि समय रैना ने पहले अदालत को यह भरोसा दिलाया था कि उन्होंने दिव्यांग व्यक्तियों के हित में कुछ कार्यक्रम आयोजित किए हैं और संबंधित संस्था से संपर्क करेंगे,लेकिन अदालत के निर्देश के बावजूद उन्होंने संस्था से कोई संपर्क नहीं किया। फाउंडेशन की ओर से यह भी कहा गया कि अब तक समय रैना की तरफ से इस पूरे मामले में कोई औपचारिक माफी भी नहीं माँगी गई है।

क्योर एसएमए फाउंडेशन ने अदालत के समक्ष यह आरोप भी दोहराया कि समय रैना ने अपने एक स्टैंडअप कार्यक्रम के दौरान स्पाइनल मस्क्यूलर एट्रॉफी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित एक नवजात बच्चे का मजाक उड़ाया था। संस्था के अनुसार,यह बच्चा दृष्टिबाधित था और उसके इलाज के लिए लगभग सोलह करोड़ रुपये मूल्य के इंजेक्शन की आवश्यकता थी। संस्था का कहना है कि इस तरह की बीमारी से जूझ रहे बच्चों और उनके परिवारों का मजाक उड़ाना न केवल अमानवीय है,बल्कि इससे उन परिवारों की भावनाओं को भी गहरी ठेस पहुँचती है,जो पहले से ही कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।

अदालत के समक्ष उस कथित प्रस्तुति का भी उल्लेख किया गया,जिसमें समय रैना ने चैरिटी और इलाज के खर्च को लेकर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दर्शकों के बीच बैठी एक महिला से काल्पनिक प्रश्न पूछते हुए ऐसी टिप्पणियाँ की थीं,जिन्हें फाउंडेशन ने अत्यंत असंवेदनशील और अपमानजनक बताया। संस्था का कहना था कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ समाज में दिव्यांगों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के प्रति संवेदनशीलता को कमजोर करती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भी चिंता जताई कि मनोरंजन और हास्य के नाम पर किसी व्यक्ति की बीमारी,शारीरिक स्थिति या दिव्यांगता को हँसी का विषय बनाना समाज में गलत संदेश देता है। न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुत सामग्री का व्यापक प्रभाव होता है और ऐसे कार्यक्रमों को तैयार करने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि उनके शब्द लाखों लोगों तक पहुँचते हैं। ऐसे में संवेदनशील विषयों पर विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि लोकप्रिय डिजिटल मंचों और सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली सामग्री को लेकर जिम्मेदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अधिकार है,लेकिन यह अधिकार किसी व्यक्ति या समुदाय की गरिमा को ठेस पहुँचाने की अनुमति नहीं देता। समाज के कमजोर और संवेदनशील वर्गों के सम्मान की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक और सार्वजनिक व्यक्तित्व का दायित्व है।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर डिजिटल मनोरंजन और ऑनलाइन कॉमेडी की सीमाओं को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि हास्य और व्यंग्य की आड़ में किसी की व्यक्तिगत परिस्थितियों, बीमारी या दिव्यांगता का मजाक किस सीमा तक स्वीकार किया जा सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक प्रभाव रखने वाले कलाकारों और कंटेंट निर्माताओं को अपने सामाजिक दायित्वों को समझना होगा। किसी भी प्रकार की रचनात्मक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि वह दूसरों की गरिमा और सम्मान को आहत करने का माध्यम बन जाए।

इस मामले में लगाए गए आर्थिक दंड को भी अदालत ने केवल दंडात्मक कार्रवाई के रूप में नहीं,बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाने वाले कदम के रूप में देखा है। न्यायालय का मानना है कि लोकप्रिय हस्तियों को अपने व्यवहार और प्रस्तुतियों के माध्यम से समाज में संवेदनशीलता,सम्मान और समावेशिता का संदेश देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी और जुर्माने के आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दिव्यांग व्यक्तियों या गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के प्रति अपमानजनक टिप्पणी को न्यायपालिका हल्के में नहीं लेगी। अदालत का यह फैसला न केवल इस मामले से जुड़े लोगों के लिए चेतावनी है,बल्कि डिजिटल मंचों पर सामग्री तैयार करने वाले सभी कलाकारों,कॉमेडियन और प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि मनोरंजन की सीमा वहीं तक है,जहाँ तक किसी व्यक्ति की गरिमा और सम्मान सुरक्षित रह सके।