तेहरान,20 जुलाई (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष के बीच अमेरिका द्वारा ईरान के दारखोविन परमाणु ऊर्जा संयंत्र को निशाना बनाए जाने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और अधिक गहरा गया है। ईरान ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि दारखोविन परमाणु ऊर्जा संयंत्र पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए विकसित किया जा रहा था और इस प्रकार के नागरिक परमाणु परियोजना पर हमला किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस कार्रवाई ने क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक परमाणु सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ईरानी अधिकारियों के अनुसार,28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य अभियान के बाद यह पहला अवसर है जब किसी निर्माणाधीन परमाणु ऊर्जा संयंत्र को सीधे निशाना बनाया गया है। हालाँकि,राहत की बात यह रही कि यह संयंत्र अभी निर्माणाधीन था और इसमें किसी प्रकार की परमाणु सामग्री मौजूद नहीं थी। इसी कारण हमले के बावजूद किसी तरह का विकिरण या रेडियोधर्मी रिसाव नहीं हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संयंत्र पूरी तरह चालू होता और उसमें परमाणु ईंधन मौजूद होता तो स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो सकती थी।
दारखोविन परमाणु ऊर्जा संयंत्र ईरान की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इस परियोजना का निर्माण वर्ष 2022 में शुरू हुआ था और इसे वर्ष 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। ईरान की योजना इस संयंत्र के माध्यम से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ बिजली उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करने की थी। यही कारण है कि इस परियोजना पर हुए हमले को ईरान केवल सैन्य कार्रवाई नहीं,बल्कि उसकी दीर्घकालिक विकास योजनाओं पर सीधा हमला मान रहा है।
पिछले कुछ दिनों में अमेरिकी सैन्य अभियान लगातार तेज हुआ है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि पिछले सप्ताह अमेरिका ने बुशहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र के आसपास के क्षेत्रों को भी निशाना बनाया था। इसके अलावा सोमवार को भी विभिन्न स्थानों पर हवाई हमलों की खबरें सामने आईं। संघर्ष की शुरुआत से अब तक अमेरिका ने ईरान के कई परमाणु अनुसंधान केंद्रों,रिएक्टरों और अन्य रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई की है।
विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2026 में किसी परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर यह पहला प्रत्यक्ष हमला माना जा रहा है। इससे पहले जून 2025 में अमेरिका ने नतांज,फोर्दो और इस्फहान स्थित ईरानी परमाणु सुविधाओं पर हमले किए थे। हालाँकि,वे हमले मुख्य रूप से परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी सुविधाओं पर केंद्रित थे,जबकि दारखोविन पर हमला एक निर्माणाधीन परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर सीधी सैन्य कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। इसी कारण इस घटना को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीरता से देखा जा रहा है।
ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन ने रविवार को जारी बयान में दावा किया कि अमेरिकी सेना ने दक्षिण-पश्चिमी प्रांत खुजेस्तान में स्थित दारखोविन परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर कई मिसाइलें और रॉकेट दागे। संगठन ने कहा कि इस हमले में परियोजना के कुछ हिस्सों को नुकसान पहुँचा है, हालाँकि,विस्तृत आकलन अभी जारी है। संगठन ने अमेरिकी कार्रवाई को “गुंडागर्दी” करार देते हुए कहा कि यह अंतर्राष्ट्रीय कानून और परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा से जुड़े वैश्विक सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।
ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस घटना पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। उनके अनुसार यदि शांतिपूर्ण परमाणु परियोजनाओं पर इस प्रकार के हमले सामान्य बन गए,तो भविष्य में वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि ईरान अपने वैध अधिकारों और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।
इसी बीच ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जवाब देना जारी रखेगा। सोमवार को ईरानी अधिकारियों ने कहा कि जब तक अमेरिका की ओर से हवाई हमले जारी रहेंगे,तब तक ईरान भी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाता रहेगा। अधिकारियों के अनुसार यह नीति देश की सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है और आत्मरक्षा के अधिकार के तहत अपनाई जा रही है। उनका कहना है कि ईरान किसी भी हमले का जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा।
दक्षिणी ईरान के बुशहर शहर में भी कई स्थानों पर हमले होने की सूचना मिली है। स्थानीय प्रशासन ने बताया कि प्रभावित क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया जा रहा है और नुकसान का वास्तविक आकलन अभी जारी है। मेहर समाचार एजेंसी के अनुसार संबंधित प्रांत के गवर्नर ने कहा है कि फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि हमलों का दायरा कितना व्यापक है। राहत एवं बचाव दल प्रभावित इलाकों में पहुंच चुके हैं और क्षति का विस्तृत मूल्यांकन किया जा रहा है।
हालाँकि,अभी तक किसी बड़े मानवीय नुकसान या रेडियोधर्मी खतरे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन लगातार हो रहे हमलों ने स्थानीय लोगों में चिंता का माहौल पैदा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु प्रतिष्ठानों के आसपास होने वाली सैन्य कार्रवाई हमेशा गंभीर जोखिम लेकर आती है और किसी भी छोटी चूक के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटनाक्रम पर करीबी नजर रखी जा रही है। वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और अन्य संवेदनशील परमाणु ढांचों पर हमले बढ़ते हैं,तो इससे न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा प्रभावित होगी,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे। कई देशों ने पहले भी इस प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की अपील की है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता यह सैन्य टकराव अब केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रह गया है। इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता,वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने की आशंका बढ़ती जा रही है। दारखोविन परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हुआ हमला इस संघर्ष का नया और बेहद संवेदनशील अध्याय माना जा रहा है। आने वाले दिनों में दोनों देशों की सैन्य और कूटनीतिक रणनीति यह तय करेगी कि यह तनाव किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या क्षेत्र में शांति स्थापित करने की कोई संभावना बन पाती है।
