तेहरान,31 जुलाई (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव गहराता नजर आ रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच कई दिनों की अपेक्षाकृत शांति के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। इसी बीच ईरानी सेना ने दावा किया है कि उसने दक्षिणी बहरीन स्थित शेख ईसा एयर बेस पर मौजूद अमेरिकी सैन्य सुविधाओं और संपत्तियों को ड्रोन हमलों के जरिए निशाना बनाया है। ईरानी सेना का कहना है कि इस कार्रवाई में अमेरिकी सेना के पावर जनरेटर,नेविगेशन सिस्टम,कार्यालयों और बैकअप इमारतों को लक्ष्य बनाया गया। है,हालाँकि,इस दावे पर अमेरिका या बहरीन की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
ईरानी सेना ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर जारी बयान में कहा कि यह हमला क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के जवाब में किया गया। सेना के अनुसार, हमले का उद्देश्य उन सैन्य संसाधनों को नुकसान पहुँचाना था,जिनका उपयोग अमेरिकी सेना क्षेत्र में अपने अभियानों के लिए करती है। ईरान का कहना है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार रखता है।
इससे पहले ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड कॉर्प्स ने भी दावा किया था कि उसने बुधवार रात अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करते हुए कुवैत के अली अल सलेम एयर बेस और जॉर्डन के अल-अजराक एयर बेस पर अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। संगठन के अनुसार,यह कार्रवाई हाल ही में ईरानी ठिकानों पर हुए अमेरिकी हमलों के जवाब में की गई। ईरान का आरोप है कि अमेरिका लगातार क्षेत्र में उसकी सैन्य और रणनीतिक क्षमताओं को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है,जिसका जवाब देना उसके लिए आवश्यक हो गया है।
हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव का यह नया दौर कई दिनों तक चली शांति के बाद फिर से शुरू हुआ है। इससे पहले दोनों देशों के बीच लगातार जवाबी हमले हुए थे,जिनसे पूरे खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ गई थी। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की अपील के बाद कुछ समय के लिए हमलों में कमी आई थी,लेकिन अब ताजा घटनाओं ने एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
अमेरिका ने इससे पहले ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर चरणबद्ध हमले किए थे। अमेरिकी प्रशासन का कहना था कि ये अभियान होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों पर हुए कथित ईरानी हमलों के जवाब में चलाए गए थे। अमेरिका का दावा था कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को सीमित करना था,जिनका उपयोग अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों को धमकाने के लिए किया जा सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है और यहाँ किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर डाल सकता है।
अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने भी क्षेत्र में स्थित कई अमेरिकी सैन्य अड्डों और प्रतिष्ठानों को मिसाइलों तथा ड्रोन के जरिए निशाना बनाया था। ईरानी अधिकारियों का कहना था कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा के अधिकार के तहत की गई। दोनों देशों के बीच लगातार जारी इन जवाबी हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया को एक बार फिर अस्थिर स्थिति में पहुँचा दिया है, जहाँ किसी भी छोटी घटना के बड़े सैन्य संघर्ष में बदलने की आशंका बनी रहती है।
सैन्य मोर्चे के साथ-साथ कूटनीतिक स्तर पर भी ईरान सक्रिय दिखाई दे रहा है। ईरान के विदेश मंत्रालय के अनुसार,विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने गुरुवार को बुल्गारिया और साइप्रस के विदेश मंत्रियों से अलग-अलग बातचीत कर उनसे आग्रह किया कि वे अपने-अपने देशों में मौजूद सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान के लिए न होने दें। ईरान का कहना है कि यदि किसी तीसरे देश की जमीन या सैन्य सुविधाओं का उपयोग उसके खिलाफ हमलों के लिए किया जाता है तो उसे अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत गंभीर मामला माना जाएगा।
बुल्गारिया की विदेश मंत्री वेलिस्लावा पेट्रोवा के साथ हुई बातचीत में अराघची ने आरोप लगाया कि बेजमर एयर बेस पर अमेरिकी टैंकर विमानों की तैनाती ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य अभियानों में सहयोग के समान है। उन्होंने कहा कि यह कदम बुल्गारिया की संसदीय मंजूरी,अंतर्राष्ट्रीय कानून और दोनों देशों के बीच मित्रतापूर्ण संबंधों की भावना के विपरीत है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 3314 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई देश अपने क्षेत्र का उपयोग किसी तीसरे देश पर हमले के लिए करने देता है तो उसे भी उस आक्रामक कार्रवाई का भागीदार माना जा सकता है।
बुल्गारिया की विदेश मंत्री ने ईरान को आश्वस्त करते हुए कहा कि उनका देश ईरान के खिलाफ किसी भी युद्ध में शामिल होने का इच्छुक नहीं है। उन्होंने कहा कि बुल्गारिया क्षेत्र में तनाव कम करने और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन करता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उनका देश किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहता है जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़े।
इसी प्रकार साइप्रस के विदेश मंत्री कॉन्स्टेंटिनोस कोम्बोस के साथ हुई बातचीत में भी अराघची ने विदेशी सैन्य अड्डों के उपयोग का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि साइप्रस में मौजूद विदेशी सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी प्रकार की आक्रामक कार्रवाई के लिए नहीं होना चाहिए। इसके जवाब में साइप्रस के विदेश मंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने इस विषय पर ब्रिटेन से संपर्क किया है,ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि साइप्रस स्थित ब्रिटिश सैन्य अड्डों का उपयोग किसी भी देश के खिलाफ सैन्य अभियान के लिए न किया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की यह कूटनीतिक पहल इस बात का संकेत है कि वह सैन्य जवाबी कार्रवाई के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाने की भी कोशिश कर रहा है। वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की गतिविधियों पर भी पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। यदि दोनों पक्षों के बीच तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार,समुद्री व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की सबसे बड़ी प्राथमिकता यही होगी कि दोनों पक्ष संयम बरतें और विवाद का समाधान कूटनीतिक बातचीत के माध्यम से निकालने की दिशा में आगे बढ़ें।
