संयुक्त राष्ट्र,23 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक निल्सन ने ग्रीनलैंड की सुरक्षा और आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग को लेकर एक नए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में हुए इस समझौते के जरिए वर्ष 1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच हुए ग्रीनलैंड रक्षा समझौते में बदलाव और विस्तार किया गया है। नए समझौते में ग्रीनलैंड को भी सीधे तौर पर पक्ष बनाया गया है और अमेरिका की सैन्य पहुँच तथा सुरक्षा गतिविधियों के लिए कई नए प्रावधान शामिल किए गए हैं। समझौता आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में बदलती सुरक्षा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी मौजूदा पिटुफिक अंतरिक्ष सैन्य अड्डे की गतिविधियों को आधुनिक बनाने और विस्तार करने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा नार्सार्सुआक और मेस्टरस्विग में नए रक्षा क्षेत्रों की स्थापना का प्रावधान भी रखा गया है। इन क्षेत्रों से जुड़ी तकनीकी व्यवस्थाएं और अन्य विवरण तीनों पक्षों की आपसी सहमति से तय किए जाएँगे। समझौते में भविष्य में जरूरत पड़ने पर ग्रीनलैंड में अतिरिक्त रक्षा क्षेत्रों या सैन्य सुविधाओं को मजबूत करने की संभावना भी रखी गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते को लंबे समय से चल रही कोशिशों का परिणाम बताया। हस्ताक्षर कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि अमेरिका,डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच संबंध अब अधिक मजबूत और सुरक्षित होंगे। ट्रंप ने कहा कि इस समझौते पर लंबे समय से काम चल रहा था और आखिरकार इसे पूरा किया गया है। उन्होंने इसे यूरोप, अमेरिका और ग्रीनलैंड के लिए महत्वपूर्ण समझौता बताया। ट्रंप ने ग्रीनलैंड के लोगों के प्रति भी सकारात्मक रुख व्यक्त किया और कहा कि उन्हें ग्रीनलैंड के लोग पसंद हैं तथा वहां के प्रधानमंत्री उनका अच्छी तरह प्रतिनिधित्व करते हैं।
इस समझौते का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पिछले कुछ समय से ट्रंप ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति और अमेरिकी सुरक्षा के संदर्भ में इस क्षेत्र पर विशेष जोर देते रहे हैं। ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक के बीच स्थित है तथा अमेरिका, यूरोप और उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र के बीच रणनीतिक संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। नए समझौते में अमेरिका को ग्रीनलैंड के क्षेत्र में रक्षा संबंधी गतिविधियों के लिए व्यापक सैन्य पहुंच दी गई है। समझौते के अनुसार अमेरिकी सैन्य बलों, विमानों और सार्वजनिक जहाजों को निर्धारित रक्षा क्षेत्रों के बीच आवाजाही की सुविधा मिलेगी। कुछ परिस्थितियों में ग्रीनलैंड के अन्य क्षेत्रों, उसके क्षेत्रीय जल और हवाई क्षेत्र तक अमेरिकी सैन्य पहुँच का भी प्रावधान रखा गया है।
समझौते में अमेरिका की प्रस्तावित गोल्डन डोम रक्षा प्रणाली का भी उल्लेख है। आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार,अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य पहुंच का इस्तेमाल उत्तरी अटलांटिक संधि क्षेत्र,ग्रीनलैंड और अमेरिकी महाद्वीप की रक्षा के लिए करने की अनुमति होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य आर्कटिक में बदलती सुरक्षा परिस्थितियों के बीच तीनों पक्षों की साझा रक्षा क्षमता को मजबूत करना है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने समझौते को अमेरिका के साथ डेनमार्क के लंबे समय से चले आ रहे सुरक्षा सहयोग में महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि करीब 75 वर्ष पहले ग्रीनलैंड की रक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच समझौता हुआ था और अब उसे नए दौर की सुरक्षा जरूरतों के अनुरूप आगे बढ़ाया जा रहा है। फ्रेडरिकसेन के मुताबिक, नए समझौते से सुरक्षा और प्रतिरोध क्षमता मजबूत होगी तथा आर्कटिक क्षेत्र में संभावित विरोधी ताकतों के प्रभाव को रोकने में मदद मिलेगी। उन्होंने सहयोगी देशों के बीच एकजुटता को भी महत्वपूर्ण बताया और कहा कि मतभेदों के कारण गठबंधन कमजोर नहीं होना चाहिए।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने समझौते के संदर्भ में ग्रीनलैंड की स्थिति को भी रेखांकित किया। डेनमार्क सरकार के आधिकारिक बयान के अनुसार,समझौता डेनमार्क साम्राज्य की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता तथा ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करता है। इसका अर्थ यह है कि अमेरिका को सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों के लिए अतिरिक्त अधिकार मिलने के बावजूद समझौते में ग्रीनलैंड की संवैधानिक स्थिति को समाप्त करने या उसकी संप्रभुता अमेरिका को हस्तांतरित करने का प्रावधान नहीं है।
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक निल्सन ने समझौते को वर्ष 2026 की परिस्थितियों के अनुरूप 1951 के रक्षा समझौते को अपडेट करने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि नए समझौते के तहत ग्रीनलैंड उन फैसलों में सीधे तौर पर शामिल रहेगा,जिनका उसके क्षेत्र और वहाँ रहने वाले लोगों पर असर पड़ता है। निल्सन ने इस बात पर जोर दिया कि यह केवल ग्रीनलैंड के बारे में अमेरिका और डेनमार्क के बीच किया गया समझौता नहीं है, बल्कि ग्रीनलैंड को भी इसमें एक पक्ष के रूप में शामिल किया गया है।
निल्सन ने ग्रीनलैंड के लोगों के अधिकारों, आजीविका और विकास से जुड़े हितों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा में अमेरिका के साथ सहयोग का लंबा इतिहास रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्ध के दौरान भी ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण रही थी। नए समझौते के जरिए ग्रीनलैंड ने अमेरिका और पश्चिमी गठबंधन के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई है। निल्सन ने कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका का मित्र रहा है और आगे भी रहेगा तथा पश्चिमी गठबंधन के साथ उसका जुड़ाव जारी रहेगा।
नए समझौते की एक अहम विशेषता इसका स्थायी स्वरूप है। आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया है कि समझौते की कोई निर्धारित समाप्ति तिथि नहीं होगी और इसमें बदलाव आपसी सहमति से ही किया जा सकेगा। दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि यदि भविष्य में ग्रीनलैंड आत्मनिर्णय के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए स्वतंत्र देश बनता है,तो डेनमार्क और ग्रीनलैंड यह सुनिश्चित करेंगे कि स्वतंत्र ग्रीनलैंड नाटो में बना रहे और समझौते से जुड़े अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्वीकार करे।
समझौते में ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और रक्षा क्षेत्रों के अलावा निवेश से जुड़े सुरक्षा पहलुओं का भी उल्लेख है। ग्रीनलैंड और डेनमार्क के अधिकारी अमेरिकी सुरक्षा हितों के साथ तालमेल रखते हुए निवेश से जुड़े मामलों पर विचार करेंगे। साथ ही, ग्रीनलैंड में रक्षा क्षेत्रों के निर्माण,रखरखाव और उनसे जुड़ी सेवाओं के लिए जहां संभव हो, ग्रीनलैंड की स्थानीय कंपनियों और संसाधनों को अनुबंध देने की बात भी समझौते में शामिल है। इससे सुरक्षा सहयोग के साथ स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
ग्रीनलैंड में पहले से मौजूद अमेरिकी सैन्य उपस्थिति की कानूनी और रणनीतिक नींव 1951 के रक्षा समझौते से जुड़ी है। उस समय अमेरिका और डेनमार्क के बीच हुए समझौते ने ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के लिए आधार तैयार किया था। बाद में वर्ष 2004 के इगलिकु समझौते के जरिए मौजूदा व्यवस्था में बदलाव किए गए। अब 2026 का नया समझौता इन्हीं पुराने समझौतों को संशोधित और विस्तारित करते हुए ग्रीनलैंड को सीधे पक्षकार बनाता है।
नए समझौते में भविष्य में अतिरिक्त अमेरिकी रक्षा क्षेत्रों की संभावना भी खुली रखी गई है। यदि किसी पक्ष को उत्तरी अटलांटिक संधि क्षेत्र,ग्रीनलैंड या अमेरिकी महाद्वीप की सुरक्षा के लिए नए रक्षा क्षेत्र की आवश्यकता महसूस होती है, तो प्रस्ताव के जरिए उसके स्थान, आकार और गतिविधियों का विवरण रखा जा सकता है। इसके बाद तीनों पक्षों के बीच बातचीत होगी। यदि निर्धारित अवधि में सहमति नहीं बनती है,तो मामला उच्च स्तर के अधिकारियों और फिर मंत्रिस्तरीय स्तर की बातचीत तक ले जाने का प्रावधान है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के विस्तार के लिए एक निर्धारित परामर्श प्रक्रिया रखी गई है।
अमेरिका और डेनमार्क के बीच ग्रीनलैंड को लेकर पिछले कुछ समय में राजनीतिक तनाव भी रहा है। ट्रंप ने पहले ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लाने की इच्छा जताई थी और इसे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा था। इस वजह से डेनमार्क और ग्रीनलैंड में संप्रभुता तथा आत्मनिर्णय को लेकर चिंता सामने आई थी। नए समझौते से सुरक्षा सहयोग को औपचारिक रूप से विस्तार मिला है,लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड की ओर से स्पष्ट किया गया है कि इससे उनकी संप्रभुता और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार पर असर नहीं पड़ेगा।
हस्ताक्षर कार्यक्रम के दौरान ट्रंप से एक पत्रकार ने पूछा कि क्या ग्रीनलैंड के मालिकाना हक को लेकर अमेरिका की पुरानी माँग अब समाप्त हो गई है। ट्रंप ने इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने केवल ग्रीनलैंड के लोगों के प्रति अपने लगाव की बात कही और वहाँ के प्रधानमंत्री के नेतृत्व की सराहना की। यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई,जब नए समझौते ने सुरक्षा सहयोग को लेकर अमेरिका की भूमिका को विस्तार दिया है,लेकिन औपचारिक रूप से ग्रीनलैंड की संप्रभुता डेनमार्क साम्राज्य के पास ही बनी हुई है।
आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच इस समझौते का महत्व व्यापक है। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों,समुद्री मार्गों,संसाधनों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अमेरिका, रूस तथा अन्य देशों की दिलचस्पी बढ़ी है। ऐसे में अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने अपनी साझा सुरक्षा व्यवस्था को नए ढाँचे में आगे बढ़ाने का फैसला किया है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने जहाँ नाटो और पश्चिमी गठबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, वहीं अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य गतिविधियों और रक्षा ढाँचे के विस्तार के लिए अधिक स्पष्ट अधिकार मिले हैं।
समझौते के लागू होने के लिए डेनमार्क और ग्रीनलैंड में आवश्यक संसदीय प्रक्रियाएं पूरी होना जरूरी है। आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक,राष्ट्रीय संसदीय प्रक्रियाएँ पूरी होने के बाद राजनयिक सूचना के जरिए इसके लागू होने की प्रक्रिया पूरी होगी। यानी हस्ताक्षर के बाद भी समझौते के प्रभावी होने के लिए संबंधित संवैधानिक और संसदीय औपचारिकताओं का पालन किया जाएगा।
कुल मिलाकर, 2026 का यह समझौता ग्रीनलैंड की सुरक्षा व्यवस्था में अमेरिका की भूमिका को विस्तार देता है और 1951 की पुरानी रक्षा व्यवस्था को नए सुरक्षा वातावरण के अनुरूप संशोधित करता है। इसके तहत पिटुफिक में अमेरिकी गतिविधियों के विस्तार, नार्सार्सुआक और मेस्टरस्विग में रक्षा क्षेत्रों तथा भविष्य में अतिरिक्त सैन्य सुविधाओं की संभावना को जगह दी गई है। वहीं डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने संप्रभुता,क्षेत्रीय अखंडता और आत्मनिर्णय के अधिकार को समझौते का हिस्सा बनाए रखा है। ऐसे में यह समझौता एक तरफ आर्कटिक में अमेरिका और उसके सहयोगियों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है,तो दूसरी तरफ ग्रीनलैंड की संवैधानिक स्थिति और उसके लोगों के अधिकारों को लेकर तय किए गए प्रावधानों को भी स्पष्ट करता है।
