वॉशिंगटन,19 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी आईसीसी के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने हेग स्थित इस अंतर्राष्ट्रीय अदालत के खिलाफ अपनी कार्रवाई को और आगे बढ़ाते हुए उसके अध्यक्ष और एक वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि दोनों अधिकारी ऐसे देशों के नागरिकों के खिलाफ आईसीसी की कार्रवाई में सीधे तौर पर शामिल रहे हैं, जिन्होंने अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है। अमेरिका ने इस कदम को अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा से जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि आईसीसी के खिलाफ यह अभियान यहीं खत्म नहीं होने वाला है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने मंगलवार को घोषणा की कि जापान की टोमोको अकाने,जो आईसीसी की अध्यक्ष हैं और सेनेगल के वरिष्ठ ट्रायल लॉयर अब्दुलाये सेये पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। यह कार्रवाई एक कार्यकारी आदेश के तहत की गई है,जिसके माध्यम से अमेरिकी प्रशासन को आईसीसी से जुड़े अधिकारियों और अदालत की गतिविधियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कदम उठाने का अधिकार मिला है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक,इन दोनों अधिकारियों पर कार्यकारी आदेश 14203 की धारा 1(ए)(2)(ए) के तहत कार्रवाई की गई है। इस कार्यकारी आदेश का शीर्षक “इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट पर प्रतिबंध लगाना” है।
मार्को रुबियो ने इन अधिकारियों पर आरोप लगाया कि वे आईसीसी की उन कार्रवाइयों में सीधे तौर पर शामिल रहे हैं, जिनके तहत ऐसे अधिकारियों की जाँच,गिरफ्तारी,हिरासत या अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई,जिनकी सरकारों ने आईसीसी के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि आईसीसी को उन देशों के नागरिकों पर अधिकार क्षेत्र नहीं थोपना चाहिए,जिन्होंने रोम संविधि को स्वीकार नहीं किया है या अदालत के अधिकार क्षेत्र को मान्यता नहीं दी है।
रुबियो ने अपने बयान में आईसीसी के खिलाफ बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने अदालत को भ्रष्ट और राजनीतिक रूप से प्रभावित संस्था बताते हुए आरोप लगाया कि उसने अपने अधिकारों का दुर्भावनापूर्ण तरीके से इस्तेमाल किया है और अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं से बाहर जाकर कार्रवाई की है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि उनका प्रशासन अमेरिकी संप्रभुता के खिलाफ आईसीसी के किसी भी कथित हमले को स्वीकार नहीं करेगा।
अमेरिकी प्रशासन की इस कार्रवाई को आईसीसी के साथ वॉशिंगटन के लंबे समय से चले आ रहे विवाद में एक और महत्वपूर्ण वृद्धि के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन पहले ही अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के खिलाफ कई कड़े कदम उठा चुका है। अब नए प्रतिबंधों के जरिए उसने यह संकेत दिया है कि अदालत की गतिविधियों को सीमित करने के लिए आगे भी प्रशासनिक,आर्थिक और कूटनीतिक उपाय किए जा सकते हैं।
रुबियो ने स्पष्ट किया कि मंगलवार को लगाए गए प्रतिबंध अंतिम कार्रवाई नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सरकार व्यापक स्तर पर एक अभियान चला रही है,जिसका उद्देश्य आईसीसी की उस क्षमता को कमजोर करना है जिसके जरिए वह अमेरिकी नागरिकों या उन देशों के नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है,जो अदालत के संस्थापक समझौते का हिस्सा नहीं हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री के अनुसार, यह अभियान केवल विदेश विभाग तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि पूरी अमेरिकी सरकार के स्तर पर चलाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता है कि दूसरे देश भी आईसीसी के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करें। वॉशिंगटन की अपील है कि वे देश अदालत को आर्थिक मदद देना और उसमें भागीदारी करना बंद करें,जिन्हें अमेरिकी प्रशासन राजनीतिक और गैर-जवाबदेह संस्था मानता है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि यदि कोई अदालत ऐसे देशों के नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई करती है,जिन्होंने उसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है, तो यह भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल बन सकती है।
आईसीसी को लेकर अमेरिका की सबसे बड़ी आपत्तियों में से एक उसका अधिकार क्षेत्र है। अमेरिका स्वयं रोम संविधि का पक्षकार नहीं है और लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि आईसीसी को अमेरिकी नागरिकों पर अधिकार क्षेत्र हासिल नहीं है। ट्रंप प्रशासन इसी आधार पर अदालत की उन गतिविधियों का विरोध कर रहा है,जिनका असर अमेरिकी नागरिकों या अमेरिका के साझेदार देशों के नागरिकों पर पड़ सकता है।
मार्को रुबियो ने कहा कि आईसीसी ने बार-बार ऐसे देशों के नागरिकों पर अपना अधिकार क्षेत्र लागू करने की कोशिश की है,जिन्होंने अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है या रोम संविधि को मंजूरी नहीं दी है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई अंतर्राष्ट्रीय कानून और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच गंभीर सवाल खड़े करती है।
ट्रंप प्रशासन की ओर से आईसीसी के खिलाफ उठाया गया यह कदम ऐसे समय आया है, जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अदालत की भूमिका और अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस पहले से तेज है। आईसीसी की स्थापना गंभीर अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को जवाबदेह ठहराने के उद्देश्य से की गई थी। अदालत का मुख्यालय नीदरलैंड्स के हेग में है और यह नरसंहार,मानवता के खिलाफ अपराध,युद्ध अपराध तथा आक्रामकता के अपराधों के आरोपी व्यक्तियों पर मुकदमा चलाती है।
अदालत का मूल सिद्धांत यह है कि जब किसी देश की राष्ट्रीय न्याय प्रणाली गंभीर अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के मामलों में कार्रवाई करने में असमर्थ हो या कार्रवाई करने की इच्छुक न हो, तब आईसीसी हस्तक्षेप कर सकता है। हालाँकि,अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर विभिन्न देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। कुछ देश इसे अंतर्राष्ट्रीय न्याय सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं,जबकि अमेरिका जैसे आलोचक इसके अधिकार क्षेत्र की सीमाओं और राष्ट्रीय संप्रभुता पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाते हैं।
रोम संविधि 2002 में प्रभावी हुआ था और इसी के आधार पर आईसीसी ने काम करना शुरू किया। इसका उद्देश्य किसी देश विशेष की अदालत का विकल्प बनना नहीं,बल्कि उन गंभीर अपराधों के मामलों में न्यायिक कार्रवाई करना है,जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय समुदाय सबसे गंभीर अपराधों की श्रेणी में रखता है। अदालत आम तौर पर व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, न कि सरकारों या पूरे देशों के खिलाफ।
अमेरिका का कहना है कि आईसीसी ने अपने मूल उद्देश्य से आगे बढ़कर ऐसे मामलों में भी अधिकार क्षेत्र का दावा किया है,जहाँ प्रभावित देशों ने अदालत की सदस्यता स्वीकार नहीं की है। ट्रंप प्रशासन के मुताबिक,इससे राष्ट्रीय संप्रभुता कमजोर होती है और दूसरे देशों के लिए भी ऐसा ही खतरा पैदा हो सकता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी चेतावनी दी कि अगर जरूरत पड़ी,तो ट्रंप प्रशासन आईसीसी के खिलाफ और कड़े कदम उठाएगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका का लक्ष्य अदालत की उस क्षमता को समाप्त करना है,जिसके माध्यम से वह अमेरिकी नागरिकों या गैर-सदस्य देशों के नागरिकों को निशाना बना सके। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अमेरिकी सरकार आईसीसी के खिलाफ अपने अभियान को तब तक जारी रखने के लिए तैयार है, जब तक अदालत अमेरिकी संप्रभुता के लिए खतरा पैदा करने में सक्षम नहीं रहती।
इस बयान से संकेत मिलता है कि आने वाले समय में अमेरिका और आईसीसी के बीच टकराव और बढ़ सकता है। यदि अमेरिकी प्रशासन दूसरे देशों को भी आईसीसी से दूरी बनाने के लिए प्रेरित करता है,तो इससे अदालत की वित्तीय और राजनीतिक स्थिति पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर,अदालत के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक संस्था की आवश्यकता है और राष्ट्रीय सीमाओं का हवाला देकर गंभीर अपराधों की जाँच को रोका नहीं जाना चाहिए।
आईसीसी के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई का असर केवल वॉशिंगटन और हेग के संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता। यह कदम अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था,राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की शक्तियों को लेकर व्यापक बहस को प्रभावित कर सकता है। खासकर उन देशों के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण है जो एक ओर अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था का समर्थन करते हैं और दूसरी ओर अपनी राष्ट्रीय न्यायिक संप्रभुता को लेकर संवेदनशील हैं।
अमेरिकी प्रशासन की ओर से लगाए गए नए प्रतिबंध यह दर्शाते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप सरकार आईसीसी के साथ अपने विवाद को केवल बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय ठोस प्रशासनिक और आर्थिक कार्रवाई के स्तर तक ले जा रही है। अध्यक्ष टोमोको अकाने और वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी अब्दुलाये सेये पर प्रतिबंध इसी नीति की नई कड़ी हैं।
फिलहाल,अमेरिका की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है कि वह आईसीसी को अमेरिकी नागरिकों और गैर-सदस्य देशों के नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार देने के पक्ष में नहीं है। वहीं,आईसीसी की स्थापना का उद्देश्य ही उन गंभीर अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के लिए जवाबदेही तय करना है,जिन पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच मूलभूत मतभेद बने रहने की संभावना है।
ट्रंप प्रशासन की ताजा कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की शक्तियों और किसी संप्रभु राष्ट्र के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले दिनों में अमेरिका द्वारा उठाए जाने वाले अगले कदम और दूसरे देशों की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि आईसीसी के खिलाफ वॉशिंगटन का अभियान किस हद तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डालता है।
